Sunday, April 22, 2018

1857 की क्रांति और वीर कुंवर सिंह : अवधेश प्रधान

हमलोग छात्र जीवन में इतिहास में पढ़ते थे कि 1857 की क्रांति इसलिए असफल हुई क्योंकि इसमें कोई संगठन नहीं था और इसकी कोई योजना नहीं थी। मंगल पांडेय नाम के एकआदमी ने समय से पहले ही विद्रोह कर दिया इसलिए अंग्रेजों को मालूम हो गया, उन्होंने कुचल दिया। अलग-अलग तारीखों में बगावतें हुईं, जिससे लोगों ने समझा कि कोई संगठन या योजना नहीं थी। नए अध्ययनों के अनुसार ये अलग-अलग तारीखें ही बतलाती है कि इनमें एक योजना थी।

मेरठ चूंकि दिल्ली के सबसे करीब है इसलिए सबसे पहले वहां विद्रोह हुआ। उसके बाद पटना, आरा ने जुलाई तक समय लिया। कुंवर सिह हिचकिचाहट में या मजबूरी में इस लड़ाई में कूद पड़े, अंग्रेज इस बात को नहीं मानते। यद्यपि कुंवर सिंह काफी कर्ज में डूब गए थे। अंग्रेज मानते थे कि जमींदारी चलानी उन्हें नहीं आती थी, इसलिए उनकी नजर में वे भोले-भाले थे। लेकिन उनके तार बाकायदा पटना और भारत भर के विद्रोहियों से जुड़े हुए थे। उन्होंने पटना की यात्राएं भी की थीं। लगातार समाचारों का आदान-प्रदान और प्रचार का काम चल रहा था। सेठ जुल्फिकार मोहम्मद के परिवार से तीन पत्र बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने दिए वे कुंवर सिंह के मुहर से दिए गए पत्र हैं। के.के. दत्त ने अपनी पुस्तक में उन्हें प्रामाणिक ठहराया है। सबसे प्रामाणिक किताब उन्हीं की है- ‘द लाइफ आॅफ कुंवर सिंह एंड अमर सिंह’। इस तरह के पत्र भी बतलाते हैं कि कुंवर सिंह के तार विद्रोहियों से जुड़े हुए थे। तभी तो दानापुर की बगावती फौजों ने दिल्ली के मुगल बादशाह का जयकारा करने के बाद अपना सेनापति घोषित किया कुंवर सिंह को। उसके बाद उन्होंने आरा की ओर कूच किया। अगर योजना नहीं थी तो क्या कोई एक दिन में दिल्ली के बादशाह का जयकारा लगाता है? रामविलास शर्मा ने 1957 में जो अपनी पुस्तक पूरी की, तब तक तमाम बुद्धिजीवी इसको फ्रीडम मूवमेंट मानने को ही तैयार नहीं थे। उस पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सभी बगावती फौजों का मुगल बादशाह को केंद्रीय नेतृत्व के रूप में स्वीकार करना यह बतलाता है कि यह एक राष्ट्रीय योजना के तहत किया गया विद्रोह था। कोई इन योजनाओं की कमियों और तारीखों के अंतराल की समीक्षा कर सकता है, लेकिन यह तो तय है कि इस दौर में हर अंचल से कुछ बड़े नायक उभर कर सामने आए और वे छोटी जमीनों से उभरे। जो बड़ी-बड़ी रियासतें थीं, वे तो अंग्रेजों के साथ थीं।

अंग्रेजों ने भी भांपा कि 10 मई की बगावत के बाद कुंवर सिंह दम साधे तीन महीने तक प्रतीक्षा करते रहे। एक बड़े नेता की तरह वे इंतजार करते रहे थे समय का। इसके पीछे बड़े रणनीतिक योद्धा का दिमाग कर रहा था। थे वे निपढ़ निरक्षर, एकाउंटेन्सी नहीं जानते थे। बिजनेस करना नहीं जानते थे। लेकिन बाकी जो-जो वे जानते थे वह देखने लायक है। असल में 25 जुलाई को जब विद्रोह हुआ तो नदी में बाढ़ आई हुई थी और गरमी भी बेतहाशा थी। यह समय पूरी योजना के साथ चुना गया था। कुछ लोगों ने कहा है कि अंग्रेज बड़े अनुशासित थे, पढ़े-लिखे योद्धा थे, 150-150 साल की लड़ाई और कई देशों की लड़ाई का अनुभव उनके पास था! लेकिन कैप्टन डनवर मना करने के बावजूद चल पड़ा रात में ही। दूसरी ओर जगह-जगह बागीचों और बालू के ढूहों में बगावती फौजें तैनात की गई थीं। आंकड़े दिए हैं के.के. दत्त और दूसरे इतिहासकारों ने कि सुबह होने तक अंग्रेजी फौज का बहुत छोटा हिस्सा ही भागने में कामयाब हो पाया था। खुद कैप्टन डनवर मारा गया उसमें। बहरहाल, देखें तो लड़ाई बराबरी की नहीं थी। क्योंकि अंग्रेजों के पास तोपें थीं। वैसे जगदीशपुर में प्रमाण मिले हैं कि कुंवर सिंह ने कुछ छोटे कारखाने कायम किए थे हथियार बनाने के लिए। 

एक बहुत भद्दा आरोप लगता है कि कुंवर सिंह के साथ सिर्फ राजपूत थे। पोस्टमार्डनिज्म के असर में आजकल स्वाधीनता संग्राम की तरह-तरह की व्याख्याएं हो रही हैं, खोज-खोज कर जातियां निकाली जा रही हैं। कुंवर सिंह राजपूत समुदाय में पैदा हुए थे, इसलिए यह आरोप लगाना कि उनके साथ केवल राजपूत थे, इतिहास के साथ अन्याय है। उन्होंने नेताओं का चयन जिस तरह किया उससे पता चलता है कि उनके भीतर एक राष्ट्रीय और सांगठनिक प्रतिभा काम कर रही थी। मैकू मल्लाह जल सेना के प्रधान थे और इसीलिए अंगे्रेजों ने उन्हें बाद में मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने इब्राहिम खान को बिहिया डिवीजन, मैंगर सिंह को गहमर तथा रंजीत यादव को चौंगाई डिवीजन का प्रधान बनाया था। जिस तरह उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और तमाम दलित-पिछड़े समुदायों के अपने सहयोगियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष किया, वह गौरतलब है। उनकी सांगठनिक प्रतिभा की तुलना सिर्फ अकबर से की जा सकती है। बेशक अंग्रेजों के पास तोपखाना था, आधुनिक हथियार था, बहुत बड़ी ताकत थी और लगातार कुमुक पहुंच रही थी, लेकिन कुंवर सिंह ने भी जबर्दस्त तैयारी की थी। उन्होंने अपने फौज को खिलाने के लिए 6 माह की रसद जमा कर रखी थी, जिसे बाद में जगदीशपुर छोड़ते वक्त उन्होंने जला दिया। 

जगदीशपुर छोड़ने के बाद उनको अपनी रणनीतिक प्रतिभा दिखाने का असली मौका मिला। कुंवर सिंह जब जगदीशपुर से बाहर निकले तो पूरे भारत का नेता बनकर निकले। उन्होंने बड़ी योजना पर काम करना शुरू किया। सासाराम, जमानिया, गाजीपुर और मिर्जापुर की पहाड़ियों से होते हुए वे रीवां पहुंचे। रीवां में उनकी रिश्तेदारी थी। मगर उनके रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। रीवां से उन्होंने बांदा की ओर रुख किया। वहां एक बड़ी योजना बनी कि तात्यां टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की सम्मिलित शक्ति अंग्रेजों पर हमला करेंगी। कुंवर सिंह के फैजाबाद, अयोध्या जाने के भी प्रमाण मिलते हैं। जिधर-जिधर से उनकी फौज गुजरी उधर-उधर बगावत की लहर फैलती गई। बुंदेलखंड के नागौर, जबलपुर, सागर आदि इलाकों पर भी इस ऐतिहासिक अभियान का प्रभाव पड़ा। खासकर लोकगीतों में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, अतरौलिया और मंदौरी की लड़ाई का जबर्दस्त जिक्र मिलता है। आजमगढ़ की लड़ाई का क्या जज्बा था, इसका अनुमान इससे मिल सकता है कि एक खास चौकी पर जब अंग्रेजों ने कब्जा किया तो पाया कि घर के अंदर तीन-तीन फीट तक लाशों का अंबार लगा है यानी हिंदुस्तानी सिपाहियों ने तोपों के गोलों के आगे उड़ जाना स्वीकार किया, लेकिन भागे नहीं। आजमगढ़ पर बाकायदा उन्होंने विजय हासिल की और कुछ दिन तक शासन किया। वहां हरेकृष्ण सिंह के नेतृत्व मे कुछ टुकड़ियों को छोड़कर वे बलिया की सीमा पर नगरा पहुंचे और फिर नगरा से सिकंदरपुर होते हुए अपने ननिहाल सहतवार पहुंचे। एकाएक दोआबा का वह क्षेत्र बगावती ज्वार की चपेट में आ गया। स्थानीय ताकतें किस तरह संगठित हुईं इसकी मिसाल सहतवार की एक घटना से मिलती है। वहां अरहर के खेत में छिपे किसानों ने, जिन्हें किसी छापामार लड़ाई का अनुभव नहीं था, न कोई प्रशिक्षण था, भाला-गड़ासा जैसे देहाती हथियारों से अंग्रेजों की एक पूरी टुकड़ी को खत्म कर दिया। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि अगर आजमगढ़ से सीधे उन्होंने बनारस पर हमला बोल दिया होता, तो पूरा पूर्वांचल उनके कब्जे में होता और यह बहुत बड़ी घटना होती। लेकिन वे फिर से जगदीशपुर को अपने कब्जे में लेना चाहते थे, शायद लोगों को यह संदेश देना चाहते थे कि हम हारे नहीं हैं। बहरहाल, जिस तरह अंग्रेजी राज के नाक के नीचे से इतना लंबा ऐतिहासिक अभियान चलाते और अपनी फौजों को सुरक्षित रखते हुए वे वापस आए वह मामूली रणनीतिक प्रतिभा का कमाल नहीं है। बगैर अपार जनसमर्थन के यह संभव नहीं था। 

1857 की लड़ाई में एक से बढ़कर एक योद्धा थे, लेकिन इतना लंबा मार्च किसी ने नहीं किया। जब कुंवर सिंह ने देखा कि चारों ओर घेराबंदी है, तो अफवाह उड़ा दिया कि वे बलिया में हाथियों के जरिए गंगा पार करेंगे। अंग्रेजों ने अपनी ज्यादातर ताकत बलिया पर लगा दी और रातोंरात शिवपुर घाट से मल्लाहों के सहयोग से नावों के जरिए उनकी पूरी सेना पार हो गई। अंग्रेज आखिर में पहुंचे और उन पर हमला किया जिसमें वे जख्मी हो गए, अपने बाजू को काटना पड़ा। लेकिन उनकी फौज ने ली ग्रांट को जबर्दस्त शिकस्त देते हुए दुबारा 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर पर अपना विजय पताका फहरा दिया। ली ग्रांट इस लड़ाई में मारा गया। अंग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कुंवर सिंह तो 26 अप्रैल तक ही जीवित रह पाए, मगर उसके बाद भी अमर सिंह के नेतृत्व में लड़ाई जारी रही। मार्क्स और एंगेल्स ने कुँवर सिंह और अमर सिंह की छापामार लड़ाइयों पर बहुत लंबी-लंबी टिप्पणियां लिखी हैं। अमर सिंह की छापामार लड़ाइयों से परेशान होकर अंग्रेजों ने आरा से जगदीशपुर तक का सारा जंगल कटवा दिया। अंग्रेज अमर सिंह को बेहद खतरनाक समझते थे। छापामार लड़ाइयों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि जिस लुगार्ड के हाथ में नया नेतृत्व आया था, उसने इस्तीफा दे दिया। साल भर की लड़ाई में अंग्रेजों के दो सेनानायक मारे गए और एक ने इस्तीफा दे दिया। हमारे योद्धा अंत-अंत तक डटे रहे। वे फांसी पर झूल गए या मारे गए, पर पीछे नहीं हटे।

जो लोग कहते हैं कि लड़ाई योजनाबद्ध नहीं थी या विद्रोही पिछड़ी चेतना के लोग थे या ये अनुशासनहीन भीड़ के नेता थे या कि इनमें कोई राजनीतिक प्रतिभा नहीं थी, उनकी सारी व्याख्याएं ओछी साबित होती हैं। वास्तव में सारी सीमाओं के बावजूद एक सीमित शक्ति के भरोसे एक राष्ट्रीय नेतृत्व कैसे विकसित होता है, इसकी व्याख्या हम जरूर कर सकते हैं। मुख्य बात यह है कि कुंवर सिंह और अमर सिंह केवल जगदीशपुर, केवल आरा या बिहार के नहीं थे। वे पूरे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों में हैं। उन्हें इसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। 

1857 असफल हो गया। लेकिन वह एक ‘भव्य असफलता’ है। इस असफलता में एक ट्रैजिक सौंदर्य है, जो बराबर प्रेरणा देता है। इस प्रेरणा में ही विजय निहित है। अंग्रेज जो लोकतंत्र और न्याय के प्रहरी बनते हैं जितना क्रूर व्यवहार कैदियों और क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने किया, उसकी इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलती। एक-एक पेड़ उनके अत्याचार का साक्षी है, जिन पर लोगों को फांसी दी गई। एक नया भारत जो उभर रहा था अंग्रेजों ने उसे पीछे धकेलने का काम किया। सामंतवाद जो खत्म हो रहा था, उसे हरा-भरा करने और उसकी जड़ों में पानी देने का काम अंग्रेजी राज ने किया। उसने हिंदू-मुसलमानों को एक नहीं रहने दिया। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगे हुए। 1857 के बाद जो साहित्य आया, उसमें क्रांति की अनुगूंज इसलिए कम मिलती है कि मध्यवर्ग अंग्रेजों से प्रतिरोध के लिए तैयार नहीं था। लोकगीत ही उस क्रांति के सच्चे दर्पण हैं। इन लोकगीतों में वीर कुंवर सिंह और अमर सिंह की गाथा को बड़े प्यार से जगह दी गई है। 

(1857 की 150 वीं वर्षगांठ और 23 अप्रैल 2007 को विजयोत्सव के मौके पर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा में दिए गए व्याख्यान का संक्षिप्त और संपादित अंश)

Sunday, December 18, 2016

का. विनोद मिश्र स्मृति दिवस पर नोटबंदी के खिलाफ जनप्रतिरोध का ऐलान

मजदूर-किसानों, छात्र-नौजवानों, महिलाओं, बच्चे-बूढ़ों के मुंह का निवाला छीन रही मोदी सरकार :  का. स्वदेश
क्रांतिकारी विपक्ष के निर्माण का का. विनोद मिश्र का नारा नए सिरे से प्रासंगिक हो उठा है 

18 दिसंबर को भाकपा-माले के पूर्व महासचिव का. विनोद मिश्र की अठारहवीं बरसी के अवसर पर भाकपा-माले भोजपुर जिला कार्यालय समेत तमाम प्रखंड मुुख्यालयों पर ‘संकल्प दिवस’ मनाया गया, साथ ही पंचायतों में पार्टी सदस्यों और आम जनता की बैठकें की गई, जिनमें मोदी सरकार द्वारा पैदा की गई आर्थिक आपातकाल की दशा और कारपोरेट फासीवाद के खिलाफ ताकतवर जनप्रतिरोध खड़ा करने का संकल्प लिया गया।

इस अवसर पर सहार में भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य का. स्वदेश भट्टाचार्य ने कहा कि देश में आपातकाल जैसा माहौल पैदा हो गया है, मोदी सरकार ने नोटबंदी के फैसले से मजदूर-किसानों, छात्र-नौजवानों, महिलाओं, बच्चे-बूढ़ों के मुंह का निवाला छीनने का काम किया है। इसके खिलाफ भाकपा-माले कार्यकर्ता मोदी हटाओ, रोटी बचाओ नारे के साथ ‘पोल खोल हल्ला बोल’ अभियान चलाएंगे और जनता को गोलबंद करेंगे। 23 दिसंबर को नोटबंदी के खिलाफ सहार प्रखंड पर भाकपा-माले की ओर से आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन किया जाएगा। सहार में माले की वरिष्ठ महिला नेता का. मीरा जी, भोजपुर जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह, प्रखंड सचिव का. रमेश जी, इनौस के राज्य अध्यक्ष मनोज मंजिल, सहार प्रखंड के प्रमुख मदन जी, रामदत्त जी, लाल जी, आइसा नेता संदीप कुमार भी मौजूद थे। 

भोजपुर जिला कार्यालय में आयोजित ‘संकल्प सभा’ को संबोधित करते हुए समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि सत्तर के दशक में भोजपुर में भीषण शासकवर्गीय दमन के दौरान कई महत्वपूर्ण कामरेडों की शहादत की राख से का. विनोद मिश्र ने अपने नेतृत्व में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन को न केवल पुनर्जीवित किया, बल्कि उसका पूरे देश में विस्तार किया। पूंजीवादी लूट, भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी में संलिप्त शासकवर्गीय पक्ष-विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ उन्होंने जनसंघर्षों और गरीब-मेहनतकश जनता की ताकत पर आधारित एक जनराजनीतिक पार्टी का निर्माण किया। आज इस देश की हालत यह है कि कल तक जो किसान, मजदूर और छोटे व्यवसायी क्रमशः भूमि अधिग्रहरण, श्रमविरोधी कानूनों और एफडीआई का विरोध कर रहे थे, उन्हें नोटबंदी के जरिए मोदी सरकार ने बुरी तरह तबाह कर दिया है। नौजवानों के रोजगार की इस सरकार को कोई चिंता नहीं है। यह सारे चुनावी वायदों से मुकर गई है। यह स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है कि नोटबंदी इस कारपोरेटपरस्त सरकार द्वारा जनता पर किया गया सीधा हमला है। लोग कतारों में अपना ही पैसा निकालने की कोशिश में मर रहे हैं। मरने वाले सिर्फ गरीब-मजदूर-महिला ही नहीं, नौजवान और फौजी भी हैं, वहीं भाजपा-कांग्रेस दोनों पार्टियों में चंदे मंे जमा पुराने नोट को काला धन न मानने को लेकर सहमति बन गई है। जब विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां दिखावटी विरोध करके चुप हो गई हैं, ऐसे समय में का. विनोद मिश्र द्वारा क्रांतिकारी विपक्ष के निर्माण का नारा नए सिरे से प्रासंगिक हो उठा है। वाम महासंघ भी उनका सपना था। बेशक नोटबंदी के जरिए पैदा आर्थिक आपातकाल, महंगाई, बेरोजगारी, खेती-उद्योग धंधों और छोटे व्यवसाय की तबाही के खिलाफ वामपंथी दलों के एकताबद्ध कार्रवाइयों में उतरने का यही माकूल वक्त है। 

संकल्प सभा को संबोधित करते हुए जिला स्थाई समिति सदस्य का. जितेंद्र कुमार ने कहा कि मोदी सरकार बात तो गरीबों की करती है, पर काम अमीरों के लिए करती है। नोटबंदी ने इस तथ्य को और भी स्पष्ट कर दिया है। सरकार अपने कदम को जायद ठहराने के लिए लगातार प्रचार कर रही है, हमें भी उसके प्रचार के खिलाफ जमीनी स्तर तक प्रचार संगठित करना होगा और उनका पर्दाफाश करना होगा। 

रिक्शा ठेला टेंपू चालक संघ के नेता और वार्ड पार्षद का. गोपाल प्रसाद ने कहा कि नोटबंदी से सबसे अधिक नुकसान मजदूर वर्ग को हुआ है। कालाबाजारियों ने बट्टे पर उनके नोट बदले। लघु उद्योग बुरी तरह तबाह हुआ है। निर्माण क्षेत्र में भी काम कम हो गए हैं। भुखमरी की स्थिति बनती जा रही है। 

एक्टू नेता का. यदुनंदन चौधरी ने कहा कि मोदी पूंजीपतियों के सेवक हैं, पूंजीवाद के भीतर जनकल्याण की भावना हो ही नहीं सकती। नोटबंदी से परेशान और उसके कारण मर रहे लोगों के प्रति जिस बेरहमी का प्रदर्शन इस सरकार ने किया है, वह इसका सबूूत है। लेकिन एक झूठ को सौ बार कहा जाए तो वह वह सच लगने लगता है, हिटलर के मंत्री गोयबल्स की उसी राह पर चलते हुए आज भारत के सत्ताधारी गोयबल्स मोदी के बारे में गलतफहमी फैला रहे हैं। 

ऐपवा नेता संगीता जी ने कहा कि नोटबंदी का हमला महिलाओं, छात्र-नौजवानों, बेरोजगारों- सबको झेलना पड़ रहा है। मोदी ने जो भ्रम फैलाया था वह टूटने लगा है। 

जिला कमिटी सदस्य का. राजनाथ राम ने कहा कि कालाधन पर अंकुश लगाने के नाम पर नोटबंदी की गई थी, पर जनता के पास जो रकम थी, उसका ज्यादातर हिस्सा बैंकों में जमा हो चुका है, खुद आरबीआई ने यह स्वीकार किया है। जाहिर है इस सरकार का मकसद काला धन पकड़ने के बजाए जनता की मेहनत की कमाई को बैंकों में जमा करवाना था। दलितों-अल्पसंख्यकों की हत्याओं के लिए जिम्मेवार मोदी की सरकार की फासिस्ट प्रवृत्ति को का. विनोद मिश्र ने पहले ही चिह्नित कर दिया था। मोदी सरकार जब से आई है, तबसे दलितों-अल्पसंख्यकों पर हिंदुत्ववादियों के हमले बढ़े हैं, काॅरपोरेट कंपनियों के स्वार्थ को पूरा करने के लिए सरकार आदिवासियांे, किसानों, छात्रों और बुद्धिजीवियों सबके दमन पर उतारू है। काॅरपोरेट ताकतों के पक्ष में की गई खूनी नोटबंदी भी इस सरकार के फासीवादी चरित्र को ही उजागर करती है। 

आइसा के जिला अध्यक्ष का. सबीर ने कहा कि नोटबंदी की घोषणा के अगले ही दिन परीक्षा थी, पर छात्र परीक्षा की तैयारी करने के बजाए कतार में लगने को विवश हो गए। इस नोटबंदी ने मजदूर-किसानों को बेटों को, जो गांव से आकर शहरों में पढ़ाई करते हैं, भारी मुश्किल में डाल दिया है। भाजपाई छात्र संगठन नोटबंदी को लेकर लोगों के बीच भ्रम फैला रहा है। इस तरह की कोशिशों का भी जवाब देना होगा। 

संकल्प दिवस पर हुई सभा का संचालन आरा नगर कमेटी के सचिव का. दिलराज प्रीतम ने किया। उन्होंने आरा प्रखंड मुख्यालय पर 22 दिसंबर को नोटबंदी के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शन को व्यापक जनभागीदारी के साथ सफल बनाने की अपील भी की। 

संकल्प दिवस की शुरुआत का. विनोद मिश्र की स्मृति में एक मिनट का मौन से हुई। फिर उनकी तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। इस मौके पर जिला कमिटी सदस्य का. अशोक कुमार सिंह भी मंच पर मौजूद थे। इस अवसर पर आरा शहर के अधिकांश सक्रिय कामरेड और विभिन्न जनसंगठनों के जिम्मेवार साथी मौजूद थे।

Tuesday, November 29, 2016

काॅॅ. जौहर, काॅॅ. निर्मल और काॅ. रतन के शहादत दिवस पर


आज 29 नवंबर है। 1975 में आज ही के दिन भाकपा-माले के दूसरे राष्ट्रीय महासचिव काॅ. सुब्रत दत्त (काॅॅ. जौहर), काॅॅ. डॉ.निर्मल महतो और काॅ. राजेंद्र यादव (काॅ. रतन) भोजपुर में शहीद हुुए थे। आज भोजपुर के गड़हनी (निर्मल नगर) में इन तीनों शहीदों के स्मारक का शिलान्यास किया गया। शिलान्यास भाकपा-माले के वर्तमान महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने किया। इस मौके पर काॅ. रामजतन शर्मा, काॅ. नंदकिशोर प्रसाद, काॅ. अमर,  काॅ. सुदामा प्रसाद समेत कई वरिष्ठ माले नेता मौजूद थे। 
कामरेड सुब्रत दत्त (जौहर)


1946 में कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे काॅॅ. सुब्रत दत्त का प्रारंभिक स्कूली जीवन दिल्ली में गुजरा था। उनके पिता हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत थे। बाद में सुब्रत दत्त कलकत्ता वापस आ गए। वहीं साम्राज्यवाद विरोधी, कांग्रेस विरोधी कम्युनिस्ट आंदोलन से उनका जुड़ाव हुआ। भारत-चीन के युद्ध के दौरान शासकवर्ग द्वारा भड़काए गए अंधराष्ट्रवादी लहर का उन्होंने दृढ़तापूर्वक विरोध किया। सही क्रांतिकारी लाइन की तलाश में वे सीपीआई से सीपीआई (एम) में गए, फिर नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद सीपीआई (एम) से भी अलग हो गए। उसके बाद सीपीआई (एमएल) मेें शामिल हुए और अपनी नौकरी छोड़कर पेशेवर क्रांतिकारी बन गए। सर्वप्रथम उन्हें छोटानागपुर के बंगाल-बिहार सीमा क्षेत्र के किसानों को संगठित करने की जिम्मेवारी मिली। जल्द ही वे सीपीआई (एमएल) की बिहार राज्य कमेटी के सदस्य बना दिए गए। सीपीआई (एमएल) के पहले महासचिव काॅॅ. चारु मजुमदार की शहादत और बिहार राज्य कमेटी के लगभग सभी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी को नवजीवन प्रदान करने का बीड़ा उठाया। पार्टी के पुनर्गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1974 में भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के पुनर्गठन के बाद उन्हें महासचिव चुना गया। काॅॅ. सुब्रत दत्त ने एक ओर जहां भाकपा (माले) को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का हरसंभव प्रयत्न किया, वहीं भोजपुर कें क्रांतिकारी किसान संघर्ष कर रहे साथियों और जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। भोजपुर की धरती पर ही बाबूबांध, सहार में सशस्त्र पुलिस दल के अचानक हमले में उन्होंने शहादत धारण की।

काॅॅ. राजेंद्र यादव (का. रतन) पार्टी के महासचिव काॅॅ. सुब्रत दत्त के संदेशवाहक थे और तत्कालीन भोजपुर आंचलिक कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने का. सुब्रत दत्त को बचाने की कोशिश करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। का. रतन का जन्म 1950 में तत्कालीन भोजपुर जिले के केसठ गांव के एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। केसठ भोजपुर जिले में सी.पी.आई का मास्को कहा जाता था। कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर मौजूद अंतविर्रोधों से संघर्ष के दौरान गांव के मेहनतकश, उत्पीड़ित गरीब लोगों की वास्तविक मुक्ति की आकांक्षा उन्हें नक्सलबाड़ी की राह पर ले गई। जनवरी 1972 में वे किसानों को संगठित करने के काम में लगे। अपने क्रांतिकारी जीवन की छोटी सी अवधि में ही उन्होंने अपने साथियों और जनता का अगाध विश्वास, प्यार और स्नेह हासिल कर लिया था।

(स्रोत- भाकपा-माले द्वारा प्रकाशित दस्तावेजी पुस्तक ‘बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान) 


काॅॅ. निर्मल महतो (काॅॅ. नरेंद्र) जो जुलाई 75 में बहुचर्चित बहुआरा (भोजपुर) की लड़ाई में पुलिस की घेरेबंदी तोड़कर बाहर निकल आए थे, वे भी का. सुब्रत के साथ 29 नवंबर को बाबू बांध, सहार में शहीद हुए थे। 

काॅॅ. निर्मल महतो बिहार के भोजपुर जिले के बड़उरा गांव के निवासी थे। 1948 में एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे। पटना साईंस काॅलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थी। जिसके बाद डाॅक्टरी की पढ़ाई के लिए उनका दाखिला दरभंगा मेडिकल काॅलेज में हुआ था। उन दिनों उच्च अंकों के साथ पास करनेवाले छात्रों का नामांकन सीधे तौर पर मेडिकल काॅलेज में होता था। लेकिन उस जमाने में दरभंगा मेडिकल काॅलेज में दाखिला लेना तथा हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई करना पिछड़े, दलित एवं उपेक्षित वर्ग के छात्रों के लिए सामान्य बात नहीं थी।

काॅलेज प्रशासन से लेकर हाॅस्टल तक वर्णवादी-सामंती वर्चस्व कायम था। निर्मल महतो जैसे छात्रों के लिए ढंग से पढ़ाई की कौन कहें, हाॅस्टल में टिक पाना भी दूभर था। उन्होंने इस दमघोटू माहौल का विरोध करना शुरू किया। अपने मिलनसार स्वभाव के कारण कुछ ही दिनों में वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए तथा छात्रों को संगठित कर मेडिकल काॅलेज और छात्रावास में तत्कालीन व्याप्त वर्णगत भेदभाव और सामंती उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन का बिगूल फूंक दिया। आंदोलन के दरम्यान कई बार उनपर हमले किए गए। फरवरी, 1973 ई. में उन पर जानलेवा हमला किया गया। घायल अवस्था में अस्पताल में भी उनके साथ बदसलूकी की गई तथा सुनियोजित षड्यंत्र के तहत उन्हें जेल में डाल दिया गया। इन झंझावातों से जूझते हुए उन्होंने घोषणा की कि ‘‘पूंजीवादी न्यायालय मुझे न्याय देने में सक्षम नहीं है।’’ उन्होंने महसूस किया कि इस तरह के माहौल को बदलने के लिए पूरी सड़ी-गली सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करना जरूरी है। अपने कैरियर को त्यागकर वे सहार, भोजपुर लौट गए और भाकपा-माले के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन में शामिल हो गए। बहुत जल्द ही वे उस आंदोलन की अगली कतार के योद्धाओं में शुमार किये जाने लगे। 

(स्रोत- ‘समकालीन चुनौती’ पत्रिका)

Tuesday, October 27, 2015

भोजपुर जिले के सातों विधान सभा सीटों के माले उम्मीदवारों का परिचय



सुदामा प्रसाद, तरारी विधानसभा

तरारी विधानसभा से माले के उम्मीदवार सुदामा प्रसाद ने नाट्य संस्था युवानीति से अपने सफर की शुरुआत की। उसी वक्त उनका भाकपा-माले से जुड़ाव हुआ। अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षोंं में उन्हें आईपीएफ का जिला प्रवक्ता बनाया गया। किसान आंदोलनों का वह दौर था। जिले में विश्वविद्यालय, सोन नहर के आधुनिकीकरण, सहार अरवल पुल समेत जिले के समग्र विकास के लिए जो उस दौर में आंदोलन चला, उसके अगुआ नेताओं में सुदामा प्रसाद रहे। इनको फर्जी मुकदमों में जेल भी भेजा गया। एक जननेता के बतौर बेहद लोकप्रिय सुदामा प्रसाद ने आरा और जगदीशपुर विधानसभाओं से चुनाव लड़े। आरा विधानसभा चुनाव में बहुत कम वोटों के अंतर से इनकी हार हुई थी। पिछले डेढ़ दशक से सुदामा प्रसाद किसानों के सवालों पर लगातार संघर्षरत रहे हैं। फिलहाल वे अखिल भारतीय किसान सभा के बिहार राज्य के सचिव हैं। पिछले दिनों इन्होंने किसानों की धान की खरीद, सिंचाई और खरीदे गए धान की कीमत समेत कई मुद्दों को लेकर ये अनशन पर बैठे थे। खासकर तरारी विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न तबकों के सवालों पर इन्होंने आंदोलन किया है। 


मनोज मंजिल, अगियांव विधानसभा

तरारी प्रखंड के कपूर डिहरा में एक भूमिहीन परिवार में जन्मे मनोज कुमार उर्फ मनोज मंजिल 1997 में छात्र संगठन आइसा से जुड़े। इनके पिता पार्टी कार्यकर्ता हैं। इनकी मां खेतिहर मजदूर हैं। ट्यूशन पढ़ाकर इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। छात्र-आंदोलनों में शिरकत के कारण पढ़ाई बीच-बीच में बाधित भी हुई। इन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की है। छात्र आंदोलन मंे ये तीन बार जेल गए। इन्होंने आइसा के जिला सचिव, प्रदेश सहसचिव की जिम्मेवारी निभाई। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय को यूजीसी की मान्यता दिलाने के लिए और छात्रसंघ चुनाव के लिए इन्होंने आंदोलन किया। लाॅ कालेज में आंदोलन करके आरक्षण लागू करवाया। डाॅ. अंबेडकर आवासीय विद्यालय में आंदोलन के बल पर क्लास रूम का निर्माण करवाया। विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के लिए स्पेशल कोचिंग की व्यवस्था इन्होंने करवाई। दलित छात्रावासों की जर्जर स्थिति को बदलने के लिए आंदोलनों का इन्होंने नेतृत्व किया। 2003-04 से मनोज मंजिल ने भाकपा-माले के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर काम करना शुरू किया। हाल के वर्षों में इन्होंने अगिआंव विधानसभा में बिजली, स्कूल, शिक्षा, राशन-किरासन, वृद्ध-विधवा-विकलांग पेंशन, गांवों के लिए पहुंच पथ, खाद की कालाबाजारी को रोकने और भूमिहीनों के लिए जमीन के सवाल पर जबर्दस्त आंदोलन संचालित किये। एक स्कूल की जमीन को दबंगों से मुक्त करवाया। स्कूल में शिक्षकों की व्यवस्था करवाई। खाद की कालाबाजारी के खिलाफ आंदोलन किया। इन्होंने शहीद साथी सतीश यादव के साथ मिलकर किसानों का लगभग चैंतीस हजार क्विंटल धान बिकवाया। आंदोलनों से जनता की मांग तो पूरी हुई पर प्रशासन ने हर बार इन पर फर्जी मुकदमा लाद दिया। जनता के सवालों पर लड़ते हुए ये प्रशासन के आतंक के सामने कभी नहीं दबते। इन पर अभी तेरह फर्जी मुकदमे हैं। अगिआंव इलाके के नौजवानों, किसानों, महिलाओं, मजदूरों और गरीबों के बीच ये बेहद लोकप्रिय हैं। 


चंद्रदीप सिंह, जगदीशपुर विधानसभा

जगदीशपुर विधानसभा के भाकपा-माले प्रत्याशी चंद्रदीप सिंह 1978 में पार्टी से जुड़े। राजपूत जाति से आने वाले चंद्रदीप सिंह अस्सी के दशक से ही भोजपुर के गरीब मेहनतकशों और किसानों के आंदोलन के लोकप्रिय नेता रहे हैं। वे बिहार प्रदेश किसान सभा की राज्य कमेटी के सदस्य रहे और फिर इसके राज्य उपाध्यक्ष बनाए गए। 1990 में उन्होंने आईपीएफ के उम्मीदवार के बतौर तत्कालीन पीरो विधानसभा से विजय हासिल की थी। 1995 और 2000 के विधानसभा चुनाव तथा 1996 के उपचुनाव में भी वे पीरो विधानसभा से भाकपा-माले के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े, लेकिन विजय हासिल नहीं कर पाए। 1996 में उन्हें 33000 वोट मिले। 

फिलहाल वे अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, बिहार के राज्य उपाध्यक्ष और भोजपुर के जिला सचिव हैं।




राजू यादव, संदेश विधानसभा

राजू यादव आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा के पदाधिकारी रह चुके हैं। इन्हें छात्र-युवा आंदोलनों के नेतृत्व का अनुभव है। लगातार छात्र-युवाओं के सवालों पर संघर्ष करते रहे हैं। 2010 में ये बड़हरा विधानसभा से माले के उम्मीदवार थे। पिछले लोकसभा चुनाव में आरा संसदीय क्षेत्र से इन्होंने भाकपा-माले प्रत्याशी के बतौर चुनाव लड़ा और लगभग 1 लाख वोट ले आए। संदेश क्षेत्र में इनके कामकाज का केंद्रीकरण है। यहां किसानों की सिंचाई, धान की बिक्री, डीजल अनुदान, फसल क्षति मुआवजा आदि सवालों पर इन्होंने आंदोलनों का नेतृत्व किया है। पिछले दिनों सुदामा प्रसाद के साथ ये भी आरा में इन सवालों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे। राजू यादव नौजवानों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। 



क्यामुद्दीन अंसारी, आरा विधानसभा

क्यामुद्दीन अंसारी आरा विधानसभा से माले प्रत्याशी हैं। हदियाबाद, गड़हनी, भोजपुर के एक गरीब भूमिहीन परिवार, जिसके पास मात्र एक कमरे का घर था, में जन्मे 43 वर्षीय क्यामुद्दीन अंसारी 1989 के आसपास भाकपा-माले आंदोलन से जुड़े। लोकसभा चुनाव में आईपीएफ उम्मीदवार रामेश्वर प्रसाद के चुनाव प्रचार में लगे। उस वक्त पूरे देश में घोर सांप्रदायिक उन्माद और हिंसा का माहौल था, इन्हें लगा कि आईपीएफ और भाकपा-माले ही सही सेकुलर पार्टी है। पहले ये छात्र संगठन एबीएसयू से जुड़े और 1990 में जब आइसा के सम्मेलन हुआ, तो उसमें शामिल हुए। 1990 में भाकपा-माले की सदस्यता के लिए आवेदन दिया और 1992 में पार्टी के सदस्य बन गए और एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर काम करना शुरू किया। 

1990 से 2000 तक इन्होंने आइसा में काम किया। 1995 में ये बिहार आइसा के राज्य अध्यक्ष चुने गए। इन्होंने चारा घोटाले के खिलाफ छात्र-युवाओं के बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया। शिक्षा और रोजगार के सवाल पर इन्होंने लड़ाई लड़ी। बिहार में केंद्रीय विश्वविद्यालय और नए विश्वविद्यालयों की मांग को लेकर हुए आंदोलन का इन्होंने नेतृत्व किया। उस आंदोलन के दबाव में ही बिहार में छह नए विश्वविद्यालय बने। छात्र-आंदोलन को सामंतवाद और सांप्रदायिकताविरोधी आंदोलनों से जोड़ने में इनकी अहम भूमिका रही। राजद के सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के पाखंड का इन्होंने लगातार पर्दाफाश किया। समस्तीपुर और मधुबनी गोलीकांड हो या छात्र-युवाओं पर दमन के अन्य मामले ये उनके प्रतिरोध की अगली कतार में रहे। 

सन् 2000 के बाद पीरो, गड़हनी, सहार आदि प्रखंडों में पार्टी मोर्चे पर काम करते हुए गरीब-गुरबों के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ी। पिछले चार वर्षों वे आरा मुफस्सिल प्रखंड के सचिव हैं। यहां उन्होंने बाढ़पीड़ितों के लिए राहत के सवाल पर बड़ी लड़ाई लड़ी। राशन, किरासन, बिजली, बीपीएल सूची में सुधार के लिए हुए आंदोलनों का नेतृत्व किया। महिला उत्पीड़न और बलात्कार की कई घटनाओं के खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी। अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार की खिलाफत की और सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वालों के खिलाफ संघर्ष की अगली कतार में रहे। 



ललन यादव, बड़हरा विधानसभा

61 वर्षीय ललन यादव भाकपा-माले से 1978 में जुड़े। इसके पहले 74 के छात्र आंदोलन में शामिल हुए थे, पर बहुत जल्दी से उससे इनका मोहभंग हो गया। उन्हें लगा कि संपूर्ण क्रांति वाले कांग्रेसी ढर्रा पर चल रहे हैं। इसके बाद ही ये भाकपा-माले से जुड़े। 1984 में पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। इन्होंने बिहार प्रदेश किसान सभा के मोर्चे पर काम करना शुरू कियाा। कभी भूमि आंदोलन, तो कभी सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने, तो कभी कर्मचारी आंदोलन में सड़क जाम करने के कारण प्रशासन ने इन पर मुकदमा किया। इन्हें छह बार जेल में डाला गया। 2005 में इन्होंने बड़हरा विधानसभा से चुनाव लड़ा था। पिछले विधानसभा चुनाव में ये बड़हरा विधानसभा चुनाव अभियान समिति के प्रभारी थे। बाढ़-सुखाड़, मनरेगा, बकाया मजदूरी और पर्चाधारियों की जमीन से संबंधित आंदोलनों के लिए इन्होंने लगातार संघर्ष किया है। 


वृंदानंद सिंह, शाहपुर विधानसभा 

वृंदानंद सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र संगठन एबीएसयू से की थी, जो आगे चलकर अखिल भारतीय स्तर पर आइसा बना। वृंदानंद पेशे से अधिवक्ता हैं। आम अवाम को न्याय दिलाने के लिए ये हमेशा तैयार रहते हैं। भाकपा-माले आंदोलन के प्रति गहरे तौर पर प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी हैं। ये शाहपुर क्षेत्र में सामाजिक न्याय और गरीब-मेहनतकशों के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।

सम्मान-अधिकार के वास्ते, कामरेड रामनरेश राम के रास्ते


गरीबों-मजदूरों-किसानों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारा ही कामरेड रामनरेश राम का संदेश 

कामरेड रामनरेश राम के रास्ते चलकर ही जनता को सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकार हासिल होगा: का. दीपंकर

आरा समेत भोजपुर के कई प्रखंडों और पंचायतों में रामनरेश राम की याद में जुलूस निकला 

सहार में कामरेड दीपंकर जनसभा को संबोधित करते हुए 
(कामरेड रामनरेश राम की पाँचवी बरसी पर भोजपुर में दो विशाल जनसभाएं हुईं। संयोग से यह भोजपुर में चुनाव प्रचार का आखिरी दिन था। परिसीमन के बाद  जदयू संरक्षित एक अपराधी इस इलाके से जीत गया था, पर इस बार वह अपराधी लोजपा में चला गया है। परिसीमन के बाद दो हिस्से में बंट गए सहार विधान सभा के दोनों हिस्सों यानी तरारी और अगिआँव विधान सभा में इस बार माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद और मनोज मंजिल के प्रति जबर्दस्त जनसमर्थन दिख रहा है। इन दोनों जनसभाओं तक किसी चैनल के कैमरे नहीं पहुंचे। खुद लालू जी की सभा इस जनसैलाब के आगे बेहद फीकी थी। अखबार अब भी यहाँ माले को तीसरे नंबर पर दिखा रहे हैं। जबकि सच यह है कि माले यहाँ एक नंबर पर है। पेश है इन दोनों सभाओं में दिये गए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य के भाषण का सार संक्षेप। साथ में अखबारों के कतरन और कुछ फोटो)
नारायणपुर/ सहार/ आरा/ अगिआंव बाजार : 26 अक्टूबर

भोजपुर में क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के संस्थापक और सहार के पूर्व विधायक का. रामनरेश राम की पांचवी बरसी पर नारायणपुर और सहार में भाकपा-माले ने दो विशाल जनसभाएं की, जिनको संबोधित करते हुए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि भोजपुर में गरीबों और किसान-मजदूरों की राजनीतिक दावेदारी और सामाजिक बदलाव लाने का काम का. रामनरेश राम ने किया। उन्होंने इन ताकतों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारे का जो संदेश दिया, उसी रास्ते से ही देश खुशहाली की ओर बढ़ेगा।

नारायणपुर की सभा में कामरेड दीपंकर 
का. दीपंकर ने कहा कि एक ओर भाजपा है खेती की जमीन हड़पने और खेती को चौपट करने की नीति पर अमल कर रही है और उनका कृषि मंत्री आत्महत्या करने वाले किसानों का अपमान करता है, तो दूसरी ओर भाकपा-माले है, जो किसानों के खेतों में पानी, फसल की खरीद, डीजल, बीज, खाद अनुदान के लिए संघर्ष कर रही है। एक ओर आरएसएस-भाजपा की ओर से आरक्षण खत्म करने की बात की जाती है और उनका एक मंत्री जलाकर मार दिए गए दलित बच्चों की तुलना कुत्ते से करता है, जैसा कि खुद मोदी ने गुजरात जनसंहार के मृतकों की तुलना दुर्घटना में मारे गए पिल्ले से की थी, वहीं दूसरी ओर भाकपा-माले है, जिसने का. रामनरेश राम के नेतृत्व में दलितों-अकलियतों, गरीबों, महिलाओं के मान-सम्मान और बराबरी के अधिकार की लंबी लड़ाई लड़ी है। 
का. दीपंकर ने कहा कि देश में एक बड़बोला नेता प्रधानमंत्री बन गया है, परिवर्तन के नाम पर उसने गरीबों, किसानों, नौजवानों- सबको धोखा दिया है। खाद्य सुरक्षा, मनरेगा, शिक्षा में कटौती कर दी गई और पूरा बजट पूंजीपतियों के लिए खोल दिया गया। सरकार बनने के बाद मोदी ने देशी-विदेशी कंपनियों के लिए किसानों की जमीन छीनने का फरमान जारी किया, जिसे पूरे देश में किसानों और वामपंथी ताकतों ने खारिज करने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा कि भाजपा-आरएसएस देश के सांप्रदायिक एकता को तोड़ रहे है। उन्होंने यही परिवर्तन लाया है कि वे गाय के नाम पर इंसान की हत्या कर रहे है। भाकपा-माले दंगा, लूट और नफरत की राजनीति करने वालों को कोई छूट नहीं दे सकती। मोदी सरकार कंपनियों और आरएसएस की कठपुतली है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असुरक्षा के लिए यह सरकार जिम्मेवार तो है ही, यह निरंतर दलितों-अकलियतों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की साजिश कर रही है। इन साजिशों और जनता के जीने के अधिकार पर हमले का मुंहतोड़ जवाब भाकपा-माले देगी। देश की खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों नीलामी और साम्राज्यवाद की दलाली के कारण भाजपा के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन का माहौल बन रहा है। किसान, मजदूर, श्रमिक, छात्र, लेखक-बुद्धिजीवी सब विरोध में खड़े हो रहे हैं। बिहार में भी इनका विरोध हो रहा है। भाकपा-माले किसी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देगी। 

का. दीपंकर ने महागठबंधन को निशाना बनाते हुए कहा कि पंद्रह साल तक लालू जी की सरकार रही और दस साल तक नीतीश कुमार की, इतने दिनों में इन लोगों ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। क्या ये इतने दिनों में सोन नहर का आधुनिकीकरण नहीं कर सकते थे, क्या बंद नलकूपों को चालू नहीं किया जा सकता था? इन लोगों ने भूमिहीनों को आवास और खेती की जमीन उपलब्ध नहीं कराई। जहां भी जमीन मिली, वह का. रामनरेश राम के संघर्ष के रास्ते के जरिए ही मिली। उन्होंने किसानों और बंटाईदारों के सवालों पर ही संघर्ष से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, जिस लड़ाई को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। वे चाहते थे कि किसान-मजदूर बड़ी एकता बनाकर सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदल दें। जब वे विधायक बने तो उन्होंने 1942 की लड़ाई में शहीद किसानों के लिए स्मारक बनाने का काम किया।

प्रभात खबर 
का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी कहते चलते हैं कि उन्होंने गरीबों को आवाज दी, यह गलत है। सच यह है कि गरीबों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। गरीबों को ताकत देने का काम तो का. रामनरेश राम, जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, बूटन मुसहर समेत भाकपा-माले के कामरेडों ने किया। का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी ने आडवाणी का रथ रोककर भाजपा को रोकने का दावा किया, लेकिन दरअसल उन्होंने माले को रोकने के लिए नरक की ताकतों से हाथ मिलाने का ऐलान किया। वे गरीबों को ऊपर देखने को कहा, लेकिन नीचे जनसंहार होते रहे। उन्होंने देश में टाडा खत्म होने के बावजूद माले नेता शाह चांद को टाडा के तहत जेल में बंद रखा, जहां अंततः पिछले साल उनकी मौत हो गई। उन्होंने बात की सामाजिक न्याय की, लेकिन दलितों, अकलियतों, किसानों-मजदूरों के साथ अन्याय ही किया। नीतीश कुमार ने उसी सिलसिले को आगे बढ़ाया और अमीरदास आयोग को भंग करके भाजपाइयों को बचाने का काम किया। सारे जनसंहारी छोड़ दिए गए। 

का. दीपंकर ने कहा कि नीतीश के शासन में हाल यह है कि आरा कोर्ट में बम विस्फोट करवाने वाला जेल से बाहर आ जा रहा है और बिजली, शिक्षा, सिंचाई के सवाल पर संघर्ष करने वाले मनोज मंजिल को जेल में डाल दिया जाता है। किसानों की धान खरीद और सिंचाई के सवाल पर जुझारू संघर्ष चलाने वाले सतीश यादव की हत्या हो जाती है और लालू-नीतीश की पार्टियां निंदा का बयान तक नहीं देती। 

का. दीपंकर ने कहा कि का. रामनरेश की परंपरा यह है कि चुनाव भी जनता के बुनियादी सवालों से संघर्ष से अलग नहीं है। तरारी और जगदीशपुर से माले के उम्मीदवार किसान आंदोलनों के नेता हैं, संदेश और अगिआंव के माले प्रत्याशी नौजवान सभा के नेता रहे हैं, आरा के माले प्रत्याशी पूर्व छात्र नेता रहे हैं। ये सारे नेता विजयी होंगे तो विधानसभा में किसानों, नौजवानों और छात्रों की आवाज को बुलंद करेंगे। वे का. रामनरेश राम की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। इनकी जीत से बिहार में वास्तविक बदलाव के संघर्ष को मजबूती मिलेगी। बिहार बदलेगा तो देश भी बदलेगा। 
दैनिक जागरण 
इन दोनों सभाओं को संबोधित करते हुए माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद ने कहा कि माले ने जो जनघोषणापत्र जारी किया है, उसे लागू करने के लिए पूरी ताकत लगा दी जाएगी। 

अगिआंव में संकल्प सभा को का. रवि राय और सुदामा प्रसाद ने भी संबोधित किया। संचालन उपेंद्र यादव ने किया। मंच पर शहीद सतीश यादव की पत्नी उषा यादव, का. मनोज मंजिल की पत्नी शीला, मीरा जी, का. स्वदेश भट्टाचार्य, का. रामजी राय, का. कुणाल भी मौजूद थे। 

सहार में का. रामकिशोर राय ने संकल्प सभा का संचालन किया। सभा को सिद्धनाथ राम, कामता प्रसाद सिंह ने संबोधित किया।

राष्ट्रीय सहारा 
आज अगिआंव बाजार में एक संकल्प सभा हुई, जिसे अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव का. अरुण सिंह और माले प्रत्याशी चंद्रदीप सिंह ने संबोधित किया। आरा शहर समेत जिले के कई पंचायतों में का. रामनरेश राम को याद किया गया और उनकी तस्वीरों के साथ जुलूस निकाला गया। 


Sunday, October 25, 2015

भारतीय क्रांति के नायक का. रामनरेश राम

(जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने 2010 में कामरेड रामनरेश राम की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद यह श्रद्धांजलि लेख लिखा था। आज कामरेड रामनरेश जी यानी पारस जी की पाँचवी बरसी है। भोजपुर की क्रांतिकारी जनता उन्हें याद कर रही है। इस मौके पर पेश है यह श्रद्धांजलि लेख, जो भारतीय क्रांति में उनकी ऐतिहासिक भूमिका का भी आकलन करता है )


आरा से एकवारी के लिए मोटरसाइकिल, चौपहियों से हजारों साथी का. रामनरेश राम की अंतिम यात्रा का आरंभ कर चुके थे। हर एकाध कि.मि. पर सैकड़ों लोग, शोकार्त्त किन्तु गगनभेदी नारों के साथ काफिले को रोक लेते। आंख भर देखते उनका निश्चल शरीर, जैसे कभी पहले उन्हें नहीं देखा हो। उन्हें फूल चढाते, अच्छी खासी तादाद में लोग सायकिल से लेकर मोटरसाइकिलों तक पर लाल झण्डा बांधे काफिले के साथ हो लेते। बहुत से लोग दौड़ते हुए उस वाहन के नज़दीक पहुंचते जिसपर वे शांत लेटे थे, कि कहीं आखीरी बार देखने से चूक न जाएं- आबाल-वृद्ध, महिलाएं। काफिला चले तो भी कुछ दूर तक, अनेक लोग दौड़ते चलते सामर्थ्य भर। याद आने लगे ऐसे ही दृश्य जब कामरेड वी.एम. की अंतिम यात्रा लेकर साथी चले थे, बनारस से आरा। इसी तरह भभुआ से आरा तक हर कुछ कि.मी. पर रुकते, रुद्ध-कंठ से नारे लगते, काफिले के साथ सामर्थ्य भर दौड़ते लोग। आरा से एकवारी तक अनेक जगह लोगों ने यात्रा पहुंचने की तैयारी में जनसभाएं शुरू कर रखी थीं। 

पारस जी ने गोरेे अंग्रेजों से लडते हुए अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। बाद को काले अंग्रेजों से अनथक संघर्ष करते उनका जीवन जारी रहा अंत तक। लगता है जैसे उन्हें लंबा जीवन मिला ही इसलिए कि किसी एक व्यक्ति के जीवन में हमारी क्रांतिकारी धारा की पूरी आनुवांशिकी, उसका प्रचण्ड शौर्य और अपार धैर्य, धक्कों के गहन शोक और बार-बार पुनर्नवा शक्ति की अविराम साधना, प्रतिरोध का सौंदर्य और उत्सर्ग का संगीत खुद को झलका सकें। बेशक, यह लंबा जीवन उन्होंने मौत से आंखें मिलाकर, उससे पंजा लडाकर जनता के लिए हासिल किया था. वह उन्हें सेंत में नहीं मिला था।

1857 के राष्ट्रीय विद्रोह से लेकर नक्सलबाड़ी की विरासत की जन-चेतना के अखंड प्रवाह का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है शाहाबाद की धरती और उसका प्रतिनिधि आख्यान है रामनरेश राम का जीवन-चरित्र। पारस जी का जीवन जनता के क्रांतिकारी आंदोलन की व्यापकता और गहराई, दोनों को प्रतीकित करता है। व्यापकता सिर्फ वर्तमान के भौगोलिक विस्तार में ही नहीं होती, वह विरासत के ऐतिहासिक काल-विस्तार में भी होती है. जो लोग महज पहले अर्थ में व्यापकता को देखते हैं, वे चाहते हैं कि हम अपने इतिहास को, अपनी पहचान को भूल जाएं। वे गहराई से काटकर व्यापकता को देखते हैं, इसलिए अधूरा और असंगत देखते हैं। सिर्फ पत्तियां गिनते हैं, जड की गहराई और तने की मुटाई नहीं देखते जहां से पत्तियों को भी जीवन-द्रव्य आता है। पारस जी का जीवन अपना इतिहास और अपनी पहचान भूलने के विरुद्ध, उससे विश्वासघात के विरुद्ध, एक विराट संदेश है। देश के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में भोजपुर इस बात की भी मिसाल रहा कि कैसे जातिगत-वर्णगत शोषण का अंत भी वर्ग-संघर्ष के रास्ते ही संभव है, जब तक कृषि-क्रांति की धुरी पर आधारित भारत की जनवादी क्रांति का रास्ता न अपनाया जाएगा, भूमि-संबंध आमूलचूल नही बदले जाएंगे, तब तक छुआछूत और भयानक जातिगत और लैंगिक असमानता के खात्मे, वर्ण-व्यवस्था के खात्मे की लडाई भी नहीं हो पाएगी। आज से चार दशक पहले ही कामरेड रामनरेश राम और उनके साथियों के नेतृत्व में भोजपुर की जनता ने इस रास्ते को अंगीकार किया था। सामंती, जातिगत शोषण से निचली समझी जानेवाली जातियों की मुक्ति उन जातियों से आनेवाले मुट्ठी भर नवधनिक और दबंग प्रतिनिधियों द्वारा ज़मींदार-पूंजीपति राजसत्ता का हिस्सा बन जाने से नहीं हो सकेगी। कामरेड रामनरेश राम के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने यह बारंबार साबित किया कि ज़मीन, मज़दूरी और सामाजिक मान-सम्मान एक ही समेकित लडाई है, अलग-अलग नहीं। का. रामनरेश राम का राजनीतिक जीवन इस बात की भी मिसाल है कि क्रांतिकारी विपक्ष का निर्माण संसदीय और कानूनी निकायों में भी जन-आंदोलनों और वर्ग-संघर्ष के बूते ही होता है, अलग से नहीं, कि क्रांतिकारी विपक्ष मात्रा संसदीय दायरे की चीज नही है। 

जब सोन किनारे की अंतिम संकल्प सभा में महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने मंच से कहा कि, ‘सत्तर के दशक में जिन नेताओं को हमने खोया, उन्हें इस तरह से विदाई नहीं दे पाए थे', तो वहां हजारों की तादाद में जुटे लोगों में बहुतों की ही आंखें बरबस ही भर आई थीं। धीरे-धीरे सूर्य भी आकाश से विदा ले रहा था, सोन की रेती पर हजारों मेहनतकश पांव अपने निशान बना रहे थे, कंधें पर सैकड़ों गमछे कल, आज और कल के आंसुओं और पसीने का सोख्ता बने लहरा रहे थे, सैकड़ों लाल झंडे बल्लियों और लाठियों पर गर्व से सर उठाए आगे की चुनौतियों से निबटने की तैयारी का उद्घोष कर रहे थे। न जाने कितनी मां-बहनें भी परंपरा को धता बताते हुए रेती में उतर पडी थीं। आखिर ये और किसी की नहीं उनके नायक, भारतीय क्रांति के नायक का. रामनरेश राम की अंतिम विदा की घड़ी थी।

Monday, September 21, 2015

आरा में ‘एजेंडा 2015 : बिहार में वामपंथी विकल्प’ कन्वेन्शन आयोजित हुआ


प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से 20 सितंबर रेडक्राॅस सभागार, आरा में आयोजित कन्वेंशन ‘एजेंडा 2015: बिहार में वामपंथी विकल्प’ में लेखक, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने भोजपुर जिले के तमाम सीटों से भाकपा-माले के उम्मीदवारों और पूरे शाहाबाद इलाके में वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की।

कवि सुनील चौधरी ने कन्वेंशन के दृष्टि पत्र का पाठ किया। अध्यक्षता रामनिहाल गुंजन, डाॅ. नीरज सिंह, प्रो. रवींद्रनाथ राय और जितेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए जनवादी लेखक संघ, बिहार के अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य में जो सरकारें हैं, उन्होंने जनतंत्र के मायने बदल दिए हैं। जनाधिकारों पर ऐसी खुली चोट पहले कभी नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार भी मोदी की तरह ही तानाशाह हैं। ये छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलर गठबंधन एक-दूसरे को मुकाबले में बता रहे हैं, पर ये दोनों देश को बेचने को तैयार बैठे हैं। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार पिछले पच्चीस साल से एक मकसद और लक्ष्य के साथ सांप्रदायिक आंधी, सामंती उत्पीड़न और कारपोरेटपरस्ती के खिलाफ सृजनरत रहे हैं। आज वामपंथी दल भी एकजुट हुए हैं, जो यथास्थितिवादी और पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्ष के लिहाज से बेहद उम्मीद भरी स्थिति है। आशा की यह किरण जरूर मशाल बनेगी। 

प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अमनपसंद, इंसानियतपसंद लोगों को वामपंथी विकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने जनपक्षधर मीडिया के निर्माण पर भी जोर दिया।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, अगर वो है तो सबके साथ ही। उन्होंने कहा कि आज वामपंथ ही एकमात्र विकल्प है। 

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि वामपंथ ही वह रास्ता है, जिससे इस देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान संभव है। इस चुनाव में वामपंथ के लिए बेहद अच्छी परिस्थिति है।

सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता रामप्रभाव मिश्र ने कहा कि विकल्प जनता के संघर्ष से ही निर्मित होगा।

हिरावल के संयोजक रंगकर्मी-गायक संतोष झा ने कहा कि कन्वेंशन का दृष्टिपत्र बताता है कि लड़ाई सिर्फ चुनाव तक महदूद नहीं है। लेकिन फिलहाल यह जरूरी है कि जिन ताकतों के खिलाफ लड़ना है, उनके खिलाफ प्रचार में उतरा जाए, वामपंथी विकल्प के पक्ष में पूरी ताकत से लगा जाए। महागठबंधन में शामिल दलों का भी शिक्षा और संस्कृति और जनता के बुनियादी मुद्दों के प्रति बहुत खराब रिकार्ड रहा है, भाजपा के रोकने के नाम पर महागठबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सकता। इन दोनों गठबंधनों से मुक्ति के बगैर बिहार का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आरएसएस की गुंडावाहिनियों से आने वाले समय में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और इंसानी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तियों को और भी बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार रहना होगा। 

इंसाफ मंच के जाकिर हुसैन ने कहा कि जो आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, वे आज सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं और ‘देशभक्ति’ का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। लालू बिहार में भाजपा को रोकने का दावा करते रहे, पर उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को बढ़ावा दिया, उनके कंधे पर सवार होकर वह बिहार में आ गई, तो अब उसे भगाने का झांसा जनता को दे रहे हैं। अगर लालू और नीतीश एक नंबर के सेकुलर हैं तो उन्हें जवाब देना होगा कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं दिया। आतंकवाद के नाम पर साईकिल बनाने वाले से लेकर डाॅक्टरी की पढ़ाई करने वाले बेगुनाह नौजवानों को एनआईए ने उठाया, नीतीश ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं कहा कि बिहार में एनआईए की जरूरत नहीं है? 

बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोप गुट के नेता अखिलेश ने कहा कि समान शिक्षा प्रणाली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन सिर्फ वामपंथी दलों ने किया है, शिक्षकों के आंदोलनों को उनका साथ मिला है, इस कारण भी उनका खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। 

आइसा नेता रचना सिंह ने शिक्षा और संस्कृति के सांप्रदायीकरण और निजीकरण की चर्चा की। वीमेंस काॅलेज में लड़कियों से छेड़खानी के बाद भड़के आंदोलन पर बिहार सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि बिहार में शिक्षा और स्त्रियों की आजादी और सुरक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है और इसके लिए नीतीश कुमार की सरकार पूरी तरह जिम्मेवार है। मीडिया द्वारा मोदी और नीतीश के चेहरे को चुनाव के केंद्र बनाने की आलोचना करते हुए प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, स्त्रियों के सम्मान, आजादी और सुरक्षा के लिए उन्होंने वाम दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि पूंजीवाद चकाचौंध पैदा करता है। वह धोखा और तिलिस्म फैलाता है। कारपोरेट हमारे सामने राजनीतिक विकल्प भी फेंकता है। इन्हीं विकल्पों के बीच चुनाव के कारण सरकारों का चरित्र नहीं बदल रहा है। इनके खिलाफ जनता के सही विकल्प के निर्माण में लगी शक्तियों को वैकल्पिक प्रचार तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि अल्पसंख्यकों के नफ्सियात (मनोविज्ञान) को समझना जरूरी है। दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी नफ्सियाती कमजोरियों से फायदा उठाती हैं। पिछले चुनाव में जो दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई और अब जो आवैसी सामने आए हैं, वे दोनों इसी के उदाहरण हैं। 

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के एक फरमान की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो विधायक, मंत्री के खिलाफ बोलने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे लोगों को जनता क्यों चुने? उन्होंने कहा कि वामपंथी विकल्प होने से अब मतदाताओं के सामने नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनने की दुविधा नहीं रहेगी। उन्होंने इस कन्वेंशन के मकसद के प्रति कथाकार शीन हयात के समर्थन का संदेश भी पढ़ा।

प्रो. तुंगनाथ चौधरी ने कहा कि चुनाव के समय जातिवादी-सामंती शक्तियों के पक्ष में होने वाले धु्रवीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस चुनाव में एकजुटता से वामपंथी दलों में नई ऊर्जा का संचार होगा। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि सत्ताधारी पार्टियों के दो मोर्चों के विरुद्ध वाममोर्चा ही असली तीसरा मोर्चा है। 

कन्वेंशन में मौजूद आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार क्यामुद्दीन ने कहा कि भाकपा-माले के नेता-कार्यकर्ता सांप्रदायिकता, अपराध, स्त्रियों के उत्पीड़न, व्यवसायियों की हत्या, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य आदि सवालों पर साल के तीन सौ पैसठों दिन संघर्ष करते रहते हैं। चुनाव में उनकी जीत से विधानसभा के भीतर भी जनता के सवालों पर संघर्ष हो सकेगा। 

जलेस के बालरूप शर्मा, सीपीआई-एम के आरा नगर कमेटी सदस्य वैद्यनाथ पांडेय, कवि केडी सिंह, राजेश राजमणि, कवि संतोष श्रेयांश, अरविंद अनुराग, सतीश कुमार राणा ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। 

कन्वेंशन में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने चुनावी जनगीतों और शायर कुर्बान आतिश ने अपनी गजल को सुनाया।

आशुतोष कुमार पांडेय ने कन्वेंशन का तीन सूत्री प्रस्ताव पढ़ा। पहला प्रस्ताव वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन का था। दूसरा प्रस्ताव एफटीआईआई के छात्रों के आंदोलन के सौ दिन पूरा होने से संबंधित था। उनके आंदोलन के समर्थन में सभागार से बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया था, जिस पर लेखक-संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए। तीसरे प्रस्ताव में आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रगतिशील, विवेकवादी बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले का हर स्तर से प्रतिवाद तेज करने की अपील की गई थी। 

कन्वेंशन में कवि जर्नादन मिश्र, अरुण शीतांश, आदित्य नारायण, रविशंकर सिंह, हरिनाथ राम, मिथिलेश जी, दीनानाथ सिंह, श्रमिक नेता यदुनंदन चौधरी, छात्र नेता अजित कुशवाहा, पत्रकार प्रशांत, शमशाद, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, अमित मेहता, विजय मेहता, रामदास राही, बनवारी राम, रामकुमार नीरज, किशोर कुणाल, संजय कुमार, माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम, राजेंद्र यादव आदि भी मौजूद थे।