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Thursday, October 25, 2018

का. रामनरेश राम की आठवीं बरसी पर आरा में होगी ‘भाजपा भगाओ, किसान बचाओ रैली’

आरा में अखिल भारतीय किसान महासभा की ओर से 26 अक्टूबर को ‘भाजपा भगाओ किसान बचाओ रैली’ होने वाली है। यह रैली भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन के शिल्पकारों में से एक का. रामनरेश राम की आठवीं बरसी के मौके पर हो रही है।


रामनरेश राम : किसानों की मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट 

किसान-मजदूरों, दलित-वंचित-उत्पीड़ित समुदायों और लोकतंत्रपसंद लोगों के प्रिय नेता, 60 के दशक के लोकप्रिय मुखिया और 1995 से लगातार तीन बार विधायक रहने वाले अत्यंत ईमानदार और जनप्रिय विधायक का. रामनरेश राम का पूरा जीवन एक प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट का जीवन था। 

1924 में जन्मे का. रामनरेश राम जब मीडिल स्कूल में पढ़ रहे थे, तभी 1942 का आंदोलन हुआ। उसी साल 15 सितंबर को भोजपुर के लसाढ़ी गांव में आंदोलनकारियों की तलाश में गए ब्रिटिश हुकूमत के सैनिकों का किसानों ने परंपरागत हथियारों के साथ प्रतिरोध किया और उनकी मशीनगन की गोलियों से शहीद हुए। का. रामनरेश राम उन शहीद किसानों को कभी भूल नहीं पाए। स्कूल की पढ़ाई छूट गई और वे आंदोलन का हिस्सा हो गए। उसके कुछ वर्षों बाद ही तेलंगाना का किसान विद्रोह हुआ, उसके नेतृत्वकारी बालन और बालू की फांसी की खबर और आंदोलनकारियों पर लादे गए फर्जी मुकदमों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए फंड जुटाने के लिए की गई कम्युनिस्ट पार्टी की अपील उन तक पहुंची और वे फंड जुटाने के कार्य में लग गए। 

1951 में का. रामनरेश राम को कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता मिली। उन्हें शाहाबाद जिला कमिटी का सदस्य बनाया गया। उन्हें किसानों के बीच काम करने की जिम्मेवारी मिली। बिहार सरकार ने जब सिंचाई रेट में दुगनी वृद्धि की, तो 10 मार्च 1954 को उसके विरुद्ध एक बड़ा प्रदर्शन कम्युनिस्ट पार्टी ने संगठित किया। 1965 में का. रामनरेश राम एकवारी ग्राम पंचायत के मुखिया चुने गए। मुखिया के रूप में वे इतने लोकप्रिय हुए कि उनके इलाके के किसान-मजदूर अंत-अंत तक उन्हें मुखिया कहकर ही संबोधित करते रहे। 1967 में जब वे सहार विधान सभा से सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर चुनाव लड़ रहे थे, तभी उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर सामंतों ने जानलेवा हमला किया। उसके बाद ही सामंती शक्तियों और राज्य तंत्र के गठजोड़ के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष शुरू हुआ। भोजपुर में सामंती सामाजिक ढांचे और उसकी हिमायत में खड़े राजनीतिक तंत्र के खिलाफ संग्राम छिड़ गया। रामनरेश राम, जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव समेत सभी नेतृत्वकारियों को भूमिगत होना पड़ा। तब तक 1967 का नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह हो चुका था और भोजपुर का किसान आंदोलन उस आंच से सुलग उठा था। एक नई कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले का जन्म हो चुका था। भोजपुर किसान आंदोलन के नेतृत्वकारी उसमें शामिल हो चुके थे। शासकवर्ग ने इस आंदोलन को कुचल देने के लिए भीषण दमन का सहारा लिया। का. रामनरेश राम के सहयोद्धा का. मास्टर जगदीश और का. रामेश्वर यादव शहीद हो गए। भाकपा-माले के दूसरे महासचिव का सुब्रत दत्त भी पुलिस के साथ मुकाबला करते हुए शहीद हुए। बुटन मुसहर, रामायण राम, नारायण कवि, शीला, अग्नि, लहरी समेत कई कम्युनिस्ट कार्यकत्र्ताओं ने एक नए राज-समाज के लिए संघर्ष करते हुए अपनी शहादत दी। शोक और धक्के को झेलते हुए का. रामनरेश राम सर्वहारा की दृढ़ता और जिजीविषा के साथ अपने शहीद साथियों के सपने को साकार करने में लगे रहे। का. स्वदेश भट्टाचार्य और भाकपा-माले के तीसरे महासचिव का. विनोद मिश्र और अपने अनेक साथियों के साथ उन्होंने भोजपुर के किसान-मजदूरों को संगठित करने का काम जारी रखा। उन्होंने भाकपा-माले के संस्थापक महासचिव का. चारु मजुमदार की इस बात को आत्मसात कर लिया था कि जनता की जनवादी क्रांति जरूरी है, जिसकी अंतर्वस्तु कृषि क्रांति है। अस्सी के दशक में उन्हें भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव की जिम्मेवारी मिली। इसके पहले बिहार प्रदेश किसान सभा का निर्माण हो चुका था। का. रामनरेश राम, स्वतंत्रता सेनानी और जनकवि का. रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ और कई अन्य नेताओं ने बिहार प्रदेश किसान सभा का गठन किया, जो अब अखिल भारतीय किसान महासभा में समाहित हो चुका है। 

का. रामनरेश राम जब विधायक बने, तो उन्होंने सिंचाई के साधनों को बेहतर बनाने की हरसंभव कोशिश की। मुकम्मल भूमि सुधार और खेत मजदूरों, बंटाईदार और छोटे-मंझोले किसानों के हक-अधिकार के लिए सदैव मुखर रहे। विधायक बनने के बाद उन्होंने 1942 के शहीद किसानों की याद में एक भव्य स्मारक बनवाया। किसान विद्रोहों और आंदोलनों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था। उनके लिए 1857 का जनविद्रोह किसानांे के बेटों द्वारा किया गया विद्रोह था। वे स्वामी सहजानंद सरस्वती को ब्रिटिश शासनकाल में बिहार में किसान आंदोलन की शुरुआत में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अहम भूमिका मानते थे। जीवन के अंतिम वर्षों में का. रामनरेश राम बदले हुए दौर में किसान आंदोलन पर एक किताब लिखना चाहते थे, जो संभव नहीं हो पाया। 26 अक्टूबर 2010 को उनका निधन हो गया। 
इस बार उनकी आठवीं बरसी का अवसर किसानों की मुक्ति के उनके सपनों के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। इस मौके पर ‘खेत, खेती, किसान बचाओ, कारपोरेट लूट का राज मिटाओ’ नारे के साथ जो ‘भाजपा भगाओ, किसान बचाओ’ रैली हो रही है, उसे भाकपा-माले के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के साथ अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव का. हन्नान मोला, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेता समाजवादी विचारक योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव का. राजाराम सिंह संबोधित करेंगे। इस रैली के तुरत बाद अखिल भारतीय किसान महासभा का दो दिवसीय राज्य सम्मेलन शुरू होगा, जिसमें बिहार के विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधि, अतिथि भाग लेंगे।

देश के आंदोलनरत किसानों के हमराह हैं भोजपुर के किसान

पिछले कुछ वर्षों में सरकार की कारपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ पूरे देश में किसानों ने जगह-जगह जुझारू आंदोलन किए हैं। चाहे भूमि अधिग्रहण के विरोध का सवाल हो या सिंचाई का या डीजल, बीज, खाद की बढ़ती कीमत का या फिर सरकारी उपेक्षा और तमाम प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए उत्पादित किए गए फसलों की वाजिब कीमत का, इन सवालों को लेकर किसानों ने जो आंदोलन किए हैं, उन आंदोलनों पर केंद्र की मोदी सरकार समेत भाजपा की राज्य सरकारें हिंसक हमला किया है। किसानों को अपनी शहादत भी देनी पड़ी है। हजारों की तादाद में किसान अपने सवालों को लेकर देश और राज्यों की राजधानी पहुंचने लगे हैं। लेकिन भाजपा की सरकारें उनकी मांगों को सुनने के बजाय उन पर लाठी-गोली चलवा रही हैं। किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बदस्तुर जारी है। भाजपाई मंत्रियों ने किसानों पर अपमाजनक टिप्पणियां करने में पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। जाहिर है ऐसे में ‘भाजपा भगाओ, किसान बचाओ’ सिर्फ एक रैली का नाम नहीं रह जाता, बल्कि एक वाजिब नारा, एक जरूरी अपील बन जाता है, इसमें देश के किसानों का आक्रोश झलकता है- उन वास्तविक किसानों का, जिनकी आजीविका का आधार कृषि ही है, जिसे भाजपा की सरकारों ने और बदतर स्थिति में धकेल दिया है। 

भोजपुर में भाकपा-माले न केवल अखिल भारतीय किसान महासभा के साथ बल्कि आम किसानों के हर सवाल और संघर्ष के साथ खड़ी रहती है, उसके कार्यकर्ता रैली की तैयारियों में जुटे हुए हैं। अभी पिछले ही माह 21 सितंबर को पटना में एक बड़ी रैली पार्टी ने की। उसके बाद उसके कार्यकर्ता भोजपुर की किसान रैली की तैयारी में जुट गए। त्योहारों का समय है, पर महंगाई की भीषण मार किसान से लेकर छोटे व्यवसायियों तक पर पड़ रही है। सरकार के प्रति असंतोष और क्षोभ हर ओर है। सिर्फ किसान ही नहीं, समाज का हर तबका भाजपा से मुक्ति चाहता है। 

पीरो प्रखंड में अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला सचिव का. चंद्रदीप सिंह, अगिआंव प्रखंड में इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य अध्यक्ष का. मनोज मंजिल और किसान नेता का. विमल यादव, तरारी में का. कृष्णा गुप्ता, का. कामता प्रसाद सिंह और का. गणेश जी, सहार में का. उपेंद्र जी, का. रामकिशोर राय और का. मदन जी, संदेश में का. परशुराम सिंह और जीतन चैधरी, उदवंतनगर में का. शिवमंगल सिंह, का. राजू यादव और का. रामानुज जी, गड़हनी में का. महेश राम और का. छपित राम, चरपोखरी में का. विनोद मिश्र, का. टेंगर राम, का. रामईश्वर यादव, जगदीशपुर में का. अजित कुशवाहा और का. विनोद कुशवाहा, कोईलवर में का. विष्णु ठाकुर, बड़हरा में का. नंद जी, बिहिया में का. उत्तम जी, शाहपुर में का. हरेंद्र जी और आरा शहर में अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला अध्यक्ष का. सुदामा प्रसाद और भाकपा-माले नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम समेत कई नेताओं के नेतृत्व में रैली और राज्य सम्मेलन की तैयारी चल रही है। 24 अक्टूबर को रैली की तैयारी हेतु वाहन प्रचार निकाला गया, जिसके दौरान कई नुक्कड़ सभाएं हुईं। जिनको संबोधित करते हुए वक्ताओं ने भोजपुर में सूखे की स्थिति, धान में लगने वाले गलकी रोग, धान के नकली बीज देने वालों के विरुद्ध कार्रवाई और मुआवजे के सवाल को उठाया। भोजपुर के किसानों की मांग है कि नहरों में निचले छोर तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाए, सोन नहर के निजीकरण की साजिश को बंद किया जाए और सरकार उसका आधुनिकीकरण करे, डीजल अनुदान मिलना सुनिश्चित किया जाए और उसके लिए आॅनलाइन रजिस्ट्रेशन के बजाए आॅफलाइन रजिस्ट्रेशन किया जाए। बंटाईदार किसानों को पहचान पत्र दिया जाए, ताकि जो भी सरकारी राहत की योजना है, वह उन्हें भी मिल सके। बढ़ी हुई मालगुजारी दर को भी वापस लेने की मांग की जा रही है। इस वक्त भोजपुर के किसान चाहते हैं कि इस जिले को सरकार सूखा क्षेत्र घोषित करे। 

अखबारों में सिंचाई के सवाल पर किसानों के आंदोलन की छिटपुट खबरें छप रही हैं, पर किसान रैली को कोई खास तरजीह नहीं दी जा रही है। दिलचस्प यह है कि दैनिक जागरण में रैली के बारे में खबरें प्रायः नजर नहीं आ रही हैं। अखबार अपने टैगलाइन में भाजपा का मुखपत्र लिख देता, तो शायद ज्यादा बेहतर होता। खैर, जिस वक्त मोदी सरकार के गुनाहों से जुड़ी बड़ी-बड़ी खबरों पर मीडिया पर्दा डालने की कोशिश कर रही है, तो ‘भाजपा भगाओ, किसान बचाओ रैली’ के प्रति उसके रुख को समझा जा सकता है।

रैली प्रचार के आखिरी दिन 25 अक्टूबर को शाम में मशाल जुलूस निकाला जाएगा। इस बीच आइसा-इनौस से जुड़े छात्र-नौजवानों ने रैली स्थल और आरा शहर को झंडों और पोस्टरों से सजाने का काम भी शुरू कर दिया है। 

भोजपुर के किसान आंदोलन की विरासत की झलक भी मिलेगी रैली में

अखिल भारतीय किसान महासभा की रैली में भोजपुर के किसान आंदोलन की विरासत की झलक भी मिलेगी। रैली स्थल वीर कुंवर सिंह स्टेडियम का नाम भोजपुर किसान आंदोलन की नेतृत्वकारी त्रयी के दो शहीदों- का. जगदीश मास्टर और का. रामईश्वर यादव के नाम पर रखा गया है। बिहार प्रदेश किसान सभा के संस्थापक सदस्यों की तस्वीरें रैली स्थल पर होंगी। आरा शहर का नामकरण का. रामनरेश राम नगर किया गया है। राज्य सम्मेलन स्थल नागरी प्रचारिणी सभागार का नाम का. रमेशचंद्र पांडेय के नाम पर और मंच का नाम का. किशुन यादव और रामापति यादव के नाम पर रखा गया है। इस मौके पर शहीद किसान नेताओं के सम्मान में उनकी तस्वीरें भी लगाई जाएंगी। 


जो किसान का साथ निबाहे, सो सच्चा इंसान : रमता जी

किसान आंदोलन से जुड़े साहित्यकारों की याद होगी साथ


भोजपुर किसान आंदोलन की चेतना, उसकी हकीकत और उसके मकसद को अपने गीतों और कहानियों के जरिए अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले जनकवि और स्वतंत्रता सेनानी रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’, विजेंद्र अनिल, दुर्गेंद्र अकारी, मधुकर सिंह, गोरख पांडेय, महेश्वर और उस आंदोलन पर ‘भोजपुर’ नाम से चर्चित कविता लिखने वाले जनकवि नागार्जुन को भी याद किया जाएगा। किसानों से संबंधित उनके गीतों और कविताओं के अंशों तथा उनकी तस्वीरों से रैली स्थल और राज्य सम्मेलन स्थल को सजाया जाएगा। यह संयोग है कि आगामी 30 अक्टूबर को जनकवि रमता जी का जन्मदिवस है और 3 नवंबर को विजेंद्र अनिल एवं 5 नवंबर को जनकवि दुर्गेंद्र अकारी और बाबा नागार्जुन का स्मृति दिवस है। का. रामनरेश राम की बरसी पर हो रही रैली और सम्मेलन उनकी विरासत और किसान आंदोलन के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित होगी, ऐसी उम्मीद है।




Sunday, April 22, 2018

1857 की क्रांति और वीर कुंवर सिंह : अवधेश प्रधान

हमलोग छात्र जीवन में इतिहास में पढ़ते थे कि 1857 की क्रांति इसलिए असफल हुई क्योंकि इसमें कोई संगठन नहीं था और इसकी कोई योजना नहीं थी। मंगल पांडेय नाम के एकआदमी ने समय से पहले ही विद्रोह कर दिया इसलिए अंग्रेजों को मालूम हो गया, उन्होंने कुचल दिया। अलग-अलग तारीखों में बगावतें हुईं, जिससे लोगों ने समझा कि कोई संगठन या योजना नहीं थी। नए अध्ययनों के अनुसार ये अलग-अलग तारीखें ही बतलाती है कि इनमें एक योजना थी।

मेरठ चूंकि दिल्ली के सबसे करीब है इसलिए सबसे पहले वहां विद्रोह हुआ। उसके बाद पटना, आरा ने जुलाई तक समय लिया। कुंवर सिह हिचकिचाहट में या मजबूरी में इस लड़ाई में कूद पड़े, अंग्रेज इस बात को नहीं मानते। यद्यपि कुंवर सिंह काफी कर्ज में डूब गए थे। अंग्रेज मानते थे कि जमींदारी चलानी उन्हें नहीं आती थी, इसलिए उनकी नजर में वे भोले-भाले थे। लेकिन उनके तार बाकायदा पटना और भारत भर के विद्रोहियों से जुड़े हुए थे। उन्होंने पटना की यात्राएं भी की थीं। लगातार समाचारों का आदान-प्रदान और प्रचार का काम चल रहा था। सेठ जुल्फिकार मोहम्मद के परिवार से तीन पत्र बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने दिए वे कुंवर सिंह के मुहर से दिए गए पत्र हैं। के.के. दत्त ने अपनी पुस्तक में उन्हें प्रामाणिक ठहराया है। सबसे प्रामाणिक किताब उन्हीं की है- ‘द लाइफ आॅफ कुंवर सिंह एंड अमर सिंह’। इस तरह के पत्र भी बतलाते हैं कि कुंवर सिंह के तार विद्रोहियों से जुड़े हुए थे। तभी तो दानापुर की बगावती फौजों ने दिल्ली के मुगल बादशाह का जयकारा करने के बाद अपना सेनापति घोषित किया कुंवर सिंह को। उसके बाद उन्होंने आरा की ओर कूच किया। अगर योजना नहीं थी तो क्या कोई एक दिन में दिल्ली के बादशाह का जयकारा लगाता है? रामविलास शर्मा ने 1957 में जो अपनी पुस्तक पूरी की, तब तक तमाम बुद्धिजीवी इसको फ्रीडम मूवमेंट मानने को ही तैयार नहीं थे। उस पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सभी बगावती फौजों का मुगल बादशाह को केंद्रीय नेतृत्व के रूप में स्वीकार करना यह बतलाता है कि यह एक राष्ट्रीय योजना के तहत किया गया विद्रोह था। कोई इन योजनाओं की कमियों और तारीखों के अंतराल की समीक्षा कर सकता है, लेकिन यह तो तय है कि इस दौर में हर अंचल से कुछ बड़े नायक उभर कर सामने आए और वे छोटी जमीनों से उभरे। जो बड़ी-बड़ी रियासतें थीं, वे तो अंग्रेजों के साथ थीं।

अंग्रेजों ने भी भांपा कि 10 मई की बगावत के बाद कुंवर सिंह दम साधे तीन महीने तक प्रतीक्षा करते रहे। एक बड़े नेता की तरह वे इंतजार करते रहे थे समय का। इसके पीछे बड़े रणनीतिक योद्धा का दिमाग कर रहा था। थे वे निपढ़ निरक्षर, एकाउंटेन्सी नहीं जानते थे। बिजनेस करना नहीं जानते थे। लेकिन बाकी जो-जो वे जानते थे वह देखने लायक है। असल में 25 जुलाई को जब विद्रोह हुआ तो नदी में बाढ़ आई हुई थी और गरमी भी बेतहाशा थी। यह समय पूरी योजना के साथ चुना गया था। कुछ लोगों ने कहा है कि अंग्रेज बड़े अनुशासित थे, पढ़े-लिखे योद्धा थे, 150-150 साल की लड़ाई और कई देशों की लड़ाई का अनुभव उनके पास था! लेकिन कैप्टन डनवर मना करने के बावजूद चल पड़ा रात में ही। दूसरी ओर जगह-जगह बागीचों और बालू के ढूहों में बगावती फौजें तैनात की गई थीं। आंकड़े दिए हैं के.के. दत्त और दूसरे इतिहासकारों ने कि सुबह होने तक अंग्रेजी फौज का बहुत छोटा हिस्सा ही भागने में कामयाब हो पाया था। खुद कैप्टन डनवर मारा गया उसमें। बहरहाल, देखें तो लड़ाई बराबरी की नहीं थी। क्योंकि अंग्रेजों के पास तोपें थीं। वैसे जगदीशपुर में प्रमाण मिले हैं कि कुंवर सिंह ने कुछ छोटे कारखाने कायम किए थे हथियार बनाने के लिए। 

एक बहुत भद्दा आरोप लगता है कि कुंवर सिंह के साथ सिर्फ राजपूत थे। पोस्टमार्डनिज्म के असर में आजकल स्वाधीनता संग्राम की तरह-तरह की व्याख्याएं हो रही हैं, खोज-खोज कर जातियां निकाली जा रही हैं। कुंवर सिंह राजपूत समुदाय में पैदा हुए थे, इसलिए यह आरोप लगाना कि उनके साथ केवल राजपूत थे, इतिहास के साथ अन्याय है। उन्होंने नेताओं का चयन जिस तरह किया उससे पता चलता है कि उनके भीतर एक राष्ट्रीय और सांगठनिक प्रतिभा काम कर रही थी। मैकू मल्लाह जल सेना के प्रधान थे और इसीलिए अंगे्रेजों ने उन्हें बाद में मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने इब्राहिम खान को बिहिया डिवीजन, मैंगर सिंह को गहमर तथा रंजीत यादव को चौंगाई डिवीजन का प्रधान बनाया था। जिस तरह उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और तमाम दलित-पिछड़े समुदायों के अपने सहयोगियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष किया, वह गौरतलब है। उनकी सांगठनिक प्रतिभा की तुलना सिर्फ अकबर से की जा सकती है। बेशक अंग्रेजों के पास तोपखाना था, आधुनिक हथियार था, बहुत बड़ी ताकत थी और लगातार कुमुक पहुंच रही थी, लेकिन कुंवर सिंह ने भी जबर्दस्त तैयारी की थी। उन्होंने अपने फौज को खिलाने के लिए 6 माह की रसद जमा कर रखी थी, जिसे बाद में जगदीशपुर छोड़ते वक्त उन्होंने जला दिया। 

जगदीशपुर छोड़ने के बाद उनको अपनी रणनीतिक प्रतिभा दिखाने का असली मौका मिला। कुंवर सिंह जब जगदीशपुर से बाहर निकले तो पूरे भारत का नेता बनकर निकले। उन्होंने बड़ी योजना पर काम करना शुरू किया। सासाराम, जमानिया, गाजीपुर और मिर्जापुर की पहाड़ियों से होते हुए वे रीवां पहुंचे। रीवां में उनकी रिश्तेदारी थी। मगर उनके रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। रीवां से उन्होंने बांदा की ओर रुख किया। वहां एक बड़ी योजना बनी कि तात्यां टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की सम्मिलित शक्ति अंग्रेजों पर हमला करेंगी। कुंवर सिंह के फैजाबाद, अयोध्या जाने के भी प्रमाण मिलते हैं। जिधर-जिधर से उनकी फौज गुजरी उधर-उधर बगावत की लहर फैलती गई। बुंदेलखंड के नागौर, जबलपुर, सागर आदि इलाकों पर भी इस ऐतिहासिक अभियान का प्रभाव पड़ा। खासकर लोकगीतों में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, अतरौलिया और मंदौरी की लड़ाई का जबर्दस्त जिक्र मिलता है। आजमगढ़ की लड़ाई का क्या जज्बा था, इसका अनुमान इससे मिल सकता है कि एक खास चौकी पर जब अंग्रेजों ने कब्जा किया तो पाया कि घर के अंदर तीन-तीन फीट तक लाशों का अंबार लगा है यानी हिंदुस्तानी सिपाहियों ने तोपों के गोलों के आगे उड़ जाना स्वीकार किया, लेकिन भागे नहीं। आजमगढ़ पर बाकायदा उन्होंने विजय हासिल की और कुछ दिन तक शासन किया। वहां हरेकृष्ण सिंह के नेतृत्व मे कुछ टुकड़ियों को छोड़कर वे बलिया की सीमा पर नगरा पहुंचे और फिर नगरा से सिकंदरपुर होते हुए अपने ननिहाल सहतवार पहुंचे। एकाएक दोआबा का वह क्षेत्र बगावती ज्वार की चपेट में आ गया। स्थानीय ताकतें किस तरह संगठित हुईं इसकी मिसाल सहतवार की एक घटना से मिलती है। वहां अरहर के खेत में छिपे किसानों ने, जिन्हें किसी छापामार लड़ाई का अनुभव नहीं था, न कोई प्रशिक्षण था, भाला-गड़ासा जैसे देहाती हथियारों से अंग्रेजों की एक पूरी टुकड़ी को खत्म कर दिया। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि अगर आजमगढ़ से सीधे उन्होंने बनारस पर हमला बोल दिया होता, तो पूरा पूर्वांचल उनके कब्जे में होता और यह बहुत बड़ी घटना होती। लेकिन वे फिर से जगदीशपुर को अपने कब्जे में लेना चाहते थे, शायद लोगों को यह संदेश देना चाहते थे कि हम हारे नहीं हैं। बहरहाल, जिस तरह अंग्रेजी राज के नाक के नीचे से इतना लंबा ऐतिहासिक अभियान चलाते और अपनी फौजों को सुरक्षित रखते हुए वे वापस आए वह मामूली रणनीतिक प्रतिभा का कमाल नहीं है। बगैर अपार जनसमर्थन के यह संभव नहीं था। 

1857 की लड़ाई में एक से बढ़कर एक योद्धा थे, लेकिन इतना लंबा मार्च किसी ने नहीं किया। जब कुंवर सिंह ने देखा कि चारों ओर घेराबंदी है, तो अफवाह उड़ा दिया कि वे बलिया में हाथियों के जरिए गंगा पार करेंगे। अंग्रेजों ने अपनी ज्यादातर ताकत बलिया पर लगा दी और रातोंरात शिवपुर घाट से मल्लाहों के सहयोग से नावों के जरिए उनकी पूरी सेना पार हो गई। अंग्रेज आखिर में पहुंचे और उन पर हमला किया जिसमें वे जख्मी हो गए, अपने बाजू को काटना पड़ा। लेकिन उनकी फौज ने ली ग्रांट को जबर्दस्त शिकस्त देते हुए दुबारा 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर पर अपना विजय पताका फहरा दिया। ली ग्रांट इस लड़ाई में मारा गया। अंग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कुंवर सिंह तो 26 अप्रैल तक ही जीवित रह पाए, मगर उसके बाद भी अमर सिंह के नेतृत्व में लड़ाई जारी रही। मार्क्स और एंगेल्स ने कुँवर सिंह और अमर सिंह की छापामार लड़ाइयों पर बहुत लंबी-लंबी टिप्पणियां लिखी हैं। अमर सिंह की छापामार लड़ाइयों से परेशान होकर अंग्रेजों ने आरा से जगदीशपुर तक का सारा जंगल कटवा दिया। अंग्रेज अमर सिंह को बेहद खतरनाक समझते थे। छापामार लड़ाइयों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि जिस लुगार्ड के हाथ में नया नेतृत्व आया था, उसने इस्तीफा दे दिया। साल भर की लड़ाई में अंग्रेजों के दो सेनानायक मारे गए और एक ने इस्तीफा दे दिया। हमारे योद्धा अंत-अंत तक डटे रहे। वे फांसी पर झूल गए या मारे गए, पर पीछे नहीं हटे।

जो लोग कहते हैं कि लड़ाई योजनाबद्ध नहीं थी या विद्रोही पिछड़ी चेतना के लोग थे या ये अनुशासनहीन भीड़ के नेता थे या कि इनमें कोई राजनीतिक प्रतिभा नहीं थी, उनकी सारी व्याख्याएं ओछी साबित होती हैं। वास्तव में सारी सीमाओं के बावजूद एक सीमित शक्ति के भरोसे एक राष्ट्रीय नेतृत्व कैसे विकसित होता है, इसकी व्याख्या हम जरूर कर सकते हैं। मुख्य बात यह है कि कुंवर सिंह और अमर सिंह केवल जगदीशपुर, केवल आरा या बिहार के नहीं थे। वे पूरे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों में हैं। उन्हें इसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। 

1857 असफल हो गया। लेकिन वह एक ‘भव्य असफलता’ है। इस असफलता में एक ट्रैजिक सौंदर्य है, जो बराबर प्रेरणा देता है। इस प्रेरणा में ही विजय निहित है। अंग्रेज जो लोकतंत्र और न्याय के प्रहरी बनते हैं जितना क्रूर व्यवहार कैदियों और क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने किया, उसकी इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलती। एक-एक पेड़ उनके अत्याचार का साक्षी है, जिन पर लोगों को फांसी दी गई। एक नया भारत जो उभर रहा था अंग्रेजों ने उसे पीछे धकेलने का काम किया। सामंतवाद जो खत्म हो रहा था, उसे हरा-भरा करने और उसकी जड़ों में पानी देने का काम अंग्रेजी राज ने किया। उसने हिंदू-मुसलमानों को एक नहीं रहने दिया। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगे हुए। 1857 के बाद जो साहित्य आया, उसमें क्रांति की अनुगूंज इसलिए कम मिलती है कि मध्यवर्ग अंग्रेजों से प्रतिरोध के लिए तैयार नहीं था। लोकगीत ही उस क्रांति के सच्चे दर्पण हैं। इन लोकगीतों में वीर कुंवर सिंह और अमर सिंह की गाथा को बड़े प्यार से जगह दी गई है। 

(1857 की 150 वीं वर्षगांठ और 23 अप्रैल 2007 को विजयोत्सव के मौके पर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा में दिए गए व्याख्यान का संक्षिप्त और संपादित अंश)

Monday, September 21, 2015

आरा में ‘एजेंडा 2015 : बिहार में वामपंथी विकल्प’ कन्वेन्शन आयोजित हुआ


प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से 20 सितंबर रेडक्राॅस सभागार, आरा में आयोजित कन्वेंशन ‘एजेंडा 2015: बिहार में वामपंथी विकल्प’ में लेखक, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने भोजपुर जिले के तमाम सीटों से भाकपा-माले के उम्मीदवारों और पूरे शाहाबाद इलाके में वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की।

कवि सुनील चौधरी ने कन्वेंशन के दृष्टि पत्र का पाठ किया। अध्यक्षता रामनिहाल गुंजन, डाॅ. नीरज सिंह, प्रो. रवींद्रनाथ राय और जितेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए जनवादी लेखक संघ, बिहार के अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य में जो सरकारें हैं, उन्होंने जनतंत्र के मायने बदल दिए हैं। जनाधिकारों पर ऐसी खुली चोट पहले कभी नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार भी मोदी की तरह ही तानाशाह हैं। ये छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलर गठबंधन एक-दूसरे को मुकाबले में बता रहे हैं, पर ये दोनों देश को बेचने को तैयार बैठे हैं। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार पिछले पच्चीस साल से एक मकसद और लक्ष्य के साथ सांप्रदायिक आंधी, सामंती उत्पीड़न और कारपोरेटपरस्ती के खिलाफ सृजनरत रहे हैं। आज वामपंथी दल भी एकजुट हुए हैं, जो यथास्थितिवादी और पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्ष के लिहाज से बेहद उम्मीद भरी स्थिति है। आशा की यह किरण जरूर मशाल बनेगी। 

प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अमनपसंद, इंसानियतपसंद लोगों को वामपंथी विकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने जनपक्षधर मीडिया के निर्माण पर भी जोर दिया।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, अगर वो है तो सबके साथ ही। उन्होंने कहा कि आज वामपंथ ही एकमात्र विकल्प है। 

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि वामपंथ ही वह रास्ता है, जिससे इस देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान संभव है। इस चुनाव में वामपंथ के लिए बेहद अच्छी परिस्थिति है।

सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता रामप्रभाव मिश्र ने कहा कि विकल्प जनता के संघर्ष से ही निर्मित होगा।

हिरावल के संयोजक रंगकर्मी-गायक संतोष झा ने कहा कि कन्वेंशन का दृष्टिपत्र बताता है कि लड़ाई सिर्फ चुनाव तक महदूद नहीं है। लेकिन फिलहाल यह जरूरी है कि जिन ताकतों के खिलाफ लड़ना है, उनके खिलाफ प्रचार में उतरा जाए, वामपंथी विकल्प के पक्ष में पूरी ताकत से लगा जाए। महागठबंधन में शामिल दलों का भी शिक्षा और संस्कृति और जनता के बुनियादी मुद्दों के प्रति बहुत खराब रिकार्ड रहा है, भाजपा के रोकने के नाम पर महागठबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सकता। इन दोनों गठबंधनों से मुक्ति के बगैर बिहार का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आरएसएस की गुंडावाहिनियों से आने वाले समय में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और इंसानी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तियों को और भी बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार रहना होगा। 

इंसाफ मंच के जाकिर हुसैन ने कहा कि जो आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, वे आज सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं और ‘देशभक्ति’ का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। लालू बिहार में भाजपा को रोकने का दावा करते रहे, पर उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को बढ़ावा दिया, उनके कंधे पर सवार होकर वह बिहार में आ गई, तो अब उसे भगाने का झांसा जनता को दे रहे हैं। अगर लालू और नीतीश एक नंबर के सेकुलर हैं तो उन्हें जवाब देना होगा कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं दिया। आतंकवाद के नाम पर साईकिल बनाने वाले से लेकर डाॅक्टरी की पढ़ाई करने वाले बेगुनाह नौजवानों को एनआईए ने उठाया, नीतीश ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं कहा कि बिहार में एनआईए की जरूरत नहीं है? 

बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोप गुट के नेता अखिलेश ने कहा कि समान शिक्षा प्रणाली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन सिर्फ वामपंथी दलों ने किया है, शिक्षकों के आंदोलनों को उनका साथ मिला है, इस कारण भी उनका खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। 

आइसा नेता रचना सिंह ने शिक्षा और संस्कृति के सांप्रदायीकरण और निजीकरण की चर्चा की। वीमेंस काॅलेज में लड़कियों से छेड़खानी के बाद भड़के आंदोलन पर बिहार सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि बिहार में शिक्षा और स्त्रियों की आजादी और सुरक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है और इसके लिए नीतीश कुमार की सरकार पूरी तरह जिम्मेवार है। मीडिया द्वारा मोदी और नीतीश के चेहरे को चुनाव के केंद्र बनाने की आलोचना करते हुए प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, स्त्रियों के सम्मान, आजादी और सुरक्षा के लिए उन्होंने वाम दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि पूंजीवाद चकाचौंध पैदा करता है। वह धोखा और तिलिस्म फैलाता है। कारपोरेट हमारे सामने राजनीतिक विकल्प भी फेंकता है। इन्हीं विकल्पों के बीच चुनाव के कारण सरकारों का चरित्र नहीं बदल रहा है। इनके खिलाफ जनता के सही विकल्प के निर्माण में लगी शक्तियों को वैकल्पिक प्रचार तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि अल्पसंख्यकों के नफ्सियात (मनोविज्ञान) को समझना जरूरी है। दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी नफ्सियाती कमजोरियों से फायदा उठाती हैं। पिछले चुनाव में जो दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई और अब जो आवैसी सामने आए हैं, वे दोनों इसी के उदाहरण हैं। 

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के एक फरमान की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो विधायक, मंत्री के खिलाफ बोलने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे लोगों को जनता क्यों चुने? उन्होंने कहा कि वामपंथी विकल्प होने से अब मतदाताओं के सामने नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनने की दुविधा नहीं रहेगी। उन्होंने इस कन्वेंशन के मकसद के प्रति कथाकार शीन हयात के समर्थन का संदेश भी पढ़ा।

प्रो. तुंगनाथ चौधरी ने कहा कि चुनाव के समय जातिवादी-सामंती शक्तियों के पक्ष में होने वाले धु्रवीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस चुनाव में एकजुटता से वामपंथी दलों में नई ऊर्जा का संचार होगा। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि सत्ताधारी पार्टियों के दो मोर्चों के विरुद्ध वाममोर्चा ही असली तीसरा मोर्चा है। 

कन्वेंशन में मौजूद आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार क्यामुद्दीन ने कहा कि भाकपा-माले के नेता-कार्यकर्ता सांप्रदायिकता, अपराध, स्त्रियों के उत्पीड़न, व्यवसायियों की हत्या, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य आदि सवालों पर साल के तीन सौ पैसठों दिन संघर्ष करते रहते हैं। चुनाव में उनकी जीत से विधानसभा के भीतर भी जनता के सवालों पर संघर्ष हो सकेगा। 

जलेस के बालरूप शर्मा, सीपीआई-एम के आरा नगर कमेटी सदस्य वैद्यनाथ पांडेय, कवि केडी सिंह, राजेश राजमणि, कवि संतोष श्रेयांश, अरविंद अनुराग, सतीश कुमार राणा ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। 

कन्वेंशन में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने चुनावी जनगीतों और शायर कुर्बान आतिश ने अपनी गजल को सुनाया।

आशुतोष कुमार पांडेय ने कन्वेंशन का तीन सूत्री प्रस्ताव पढ़ा। पहला प्रस्ताव वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन का था। दूसरा प्रस्ताव एफटीआईआई के छात्रों के आंदोलन के सौ दिन पूरा होने से संबंधित था। उनके आंदोलन के समर्थन में सभागार से बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया था, जिस पर लेखक-संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए। तीसरे प्रस्ताव में आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रगतिशील, विवेकवादी बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले का हर स्तर से प्रतिवाद तेज करने की अपील की गई थी। 

कन्वेंशन में कवि जर्नादन मिश्र, अरुण शीतांश, आदित्य नारायण, रविशंकर सिंह, हरिनाथ राम, मिथिलेश जी, दीनानाथ सिंह, श्रमिक नेता यदुनंदन चौधरी, छात्र नेता अजित कुशवाहा, पत्रकार प्रशांत, शमशाद, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, अमित मेहता, विजय मेहता, रामदास राही, बनवारी राम, रामकुमार नीरज, किशोर कुणाल, संजय कुमार, माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम, राजेंद्र यादव आदि भी मौजूद थे। 








Saturday, September 5, 2015

प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ आरा में प्रतिरोध मार्च



फासीवाद के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध संगठित करना होगा 

3 सितंबर को पटना में प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ प्रगतिशील-जनवादी संगठनों ने प्रतिरोध मार्च निकाला था। इसके अगले दिन देर शाम में हमने आरा में 5 सितंबर को प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, छात्र संगठन आइसा, नाट्य संस्था युवानीति और बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोपगुट की ओर से प्रतिरोध मार्च करने का निर्णय लिया। तैयारी के लिए कम समय मिला। शनिवार, कार्यालयों और काॅलेजों में छुट्टी के बावजूद करीब चालीस साहित्यकार, शिक्षक, संस्कृतिकर्मी, छात्र और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल हुए।

आजकल हर तरह के आयोजन के लिए प्रशासन को सूचना देने का नियम बना दिया गया है। लेकिन हमारे पास इसके लिए समय बिल्कुल नहीं था। हम जनकवि भोलाजी के पान दूकान के पास जुटे। वे अब नहीं हैं, पर उनकी दूकान है, जहां बैठकर वे अक्सर मूर्तिपूजा करने वालों के समाजविरोधी आचरण की खबर लेते थे, किसी-किसी से जरूर उनकी बहस हुई, पर किसी ने उनको हत्या करने की कभी धमकी नहीं दी थी। वे होते तो जरूर मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच के खिलाफ वैचारिक संघर्ष करने वाले प्रो. कलबुर्गी की हत्या पर कुछ काव्यात्मक पंक्तियां जरूर सुनाते, जैसा कि उन्होंने अपने एक गीत में लिखा था- कवन हउवे देवी देवता कवन ह मलिकवा/ बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा...माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी/ दिहनी बहुते कुछुवो न पइनी/ इ लोरवा इ लहूवा से बूझल पियसवा/ बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा। प्रतिवाद मार्च का बैनर भोलाजी के छोटे लड़के मंगल माही ने ही लिखा था। उसमें मैं एकाध संशोधन करवा रहा था, तभी बगल के थाने के एक पुलिसवाले को साथियों से कुछ पूछते देखा, शायद ‘प्रतिरोध मार्च’ के विषय के बारे में जानकर वह वहां से चला गया। 
फासीवाद हो बर्बाद, इंकलाब जिंदाबाद के जोशीले नारे के साथ मार्च की शुरुआत हुई। लेखक-बुद्धिजीवियों की हत्या क्यों, मोदी सरकार जवाब दो के नारे भी गूंजे। प्रतिरोध मार्च रेलवे स्टेशन परिसर में पहुंचकर सभा में तब्दील हो गया। सभा को संबोधित करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि देश में हिटलरशाही चल रही है। प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे महान शख्सियतों की हत्या की जा रही है और हत्यारों को पकड़ा नहीं जा रहा है। इन हत्यारों को संरक्षण देने वाले इंसानियत, विज्ञान और विकास के विरोधी हैं। वे जितनी भी हत्याएं कर लें, पर उनके खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रहेगी। 

अस्वस्थता के कारण जलेस के राज्य अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह प्रतिवाद मार्च में शामिल नहीं हो पाए, पर सभा के लिए उन्होंने अपना संदेश भेेजा था, जिसे कवि सुनील श्रीवास्तव ने पढ़ा। नीरज सिंह का मानना है कि प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्याएं लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। इस देश में फासीवाद के तेज कदमों की आहट साफ तौर पर सुनाई पड़ने लगी है। सभी तरह के लोकतंत्रवादियों, समाजकर्मियों, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों को इस खतरे को समझते हुए एक स्वर से इसके विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध संगठित करना चाहिए। 

शाम हो रही थी, युवा कवि हरेराम सिंह विक्रमगंज से आए थे, उनकी ट्रेन का समय हो चुका था, पर अपने गुस्से का इजहार उन्हें ज्यादा जरूरी लग रहा था। उन्होंने धर्म की आड़ में चलने वाले शोषण-उत्पीड़न और भेदभाव के अतीत और वर्तमान का जिक्र किया। आज के बाबाओं-महात्माओं के पास मौजूद अकूत संपदा पर सवाल उठाया और कहा कि किसान-मजदूरों को इनके और इनको संरक्षण देने वाली राजनीति के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार होना होगा। 

आइसा, बिहार की राज्य कार्यकारिणी सदस्य रचना ने कहा कि बुद्धिजीवियों की हत्या दरअसल उनकी सोच की हत्या की कोशिश है। आरएसएस राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता और जातिभेद को बढ़ावा दे रही है। इसी मकसद से वह पाठ्यक्रम में भी तब्दीली कर रही है। लेकिन उसके करतूत देश को ऐसे मुहाने पर ले जा रहे हैं, जहां उसके खिलाफ भारतीय जनता का एकताबद्ध प्रतिरोध होना अवश्यंभावी है। व्यक्ति की हत्या करके वे प्रगतिशील और विवेकवादी सोच की हत्या नहीं कर सकते।

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि धार्मिक-सामाजिक शोषण-उत्पीडन का विरोध किसी भी सच्चे लेखक का कर्तव्य है। अमेरिका तक में लेखक सरकारों की आलोचना करते हैं, पर उनकी हत्या इस तरह नहीं होती। लेकिन हमारे देश में सत्ता में ऐसी शक्तियां आई हैं, जो कहती हैं कि जो धार्मिक अंधविश्वास और मूर्तिपूजा का विरोध करेगा, उसकी हत्या करेंगी। प्रो. कलबुर्गी, का. पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्याएं एक पैटर्न पर की गई हैं। यही वे जनविरोधी ताकतें हैं, जो स्त्रियों की बराबरी और आजादी के विचार को बर्दाश्त नहीं करतीं। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद सुनील चौधरी ने कहा कि कारपोरेट और सांप्रदायिक शक्तियों के साथ गठजोड़ के बल पर मोदी की तानाशाही चल रही है। सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी ही नहीं, बल्कि आज जनता के सारे लोकतांत्रिक अधिकार भी खतरे में हैं। इसलिए इनके खिलाफ जनता की व्यापक एकजुटता जरूरी है। साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को इसी प्रयास में लगना चाहिए। 



संचालन करते हुए मैंने इस ओर ध्यान दिलाया कि इस देश में धार्मिक सुधार, जातिगत समानता और सर्वधर्म सम्भाव की जो वैचारिक परंपरा रही है, आरएसएस उस पर सुनियोजित तरीके से हमले कर रही है। इसके साथ ही सामाजिक-सांप्रदायिक भेदभाव, उत्पीड़न, धार्मिक रूढ़िवाद और कट्टरता के खिलाफ भारत में आलोचना और प्रतिरोध की अपनी जो तर्कशील और विवेकवादी परंपरा रही है, वह उसे बर्दास्त नहीं है। एक ओर देश में निरंतर सांप्रदायिक विभाजन, विद्वेष और कत्लेआम को प्रोत्साहित करने वाले आरएसएस प्रमुख को जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराना और दूसरी ओर प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों को खुला छोड़ देना, भारत के लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सभा में महाराष्ट्र सरकार द्वारा जनप्रतिनिधियों- मेयर, विधायक, सांसद की आलोचना या विरोध करने वालों को देशद्रोही करार देने वाले फरमान की भी भर्त्सना की गई। 

सभा में मैंने प्रो. कलबुर्गी पर जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण के लेख के अंश भी पढ़े। उन्होंने लिखा है कि प्रो. कलबुर्गी कन्नड़ के ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने उस क्षेत्र के इतिहास को इतिहास के आधिकारिक विद्वानों से भी ज्यादा वैज्ञानिक ढंग से उद्घाटित किया। वे 12 वीं सदी के क्रांतिकारी संत बसवेश्वर के जीवन और दर्शन के श्रेष्ठ व्याख्याकार थे। बसवन्ना की ही तरह वे अपने विचारों के लिए ही जिए और मरे। लेकिन अपने तार्किक और वस्तुवादी दृष्टिकोण के कारण खुद लिंगायत धर्म-प्रतिष्ठान से भी उनका टकराव होता रहा। उन्होंने कन्नड़ साहित्य, इतिहास और संस्कृति से संबंधित शोधपरक निबंध लिखे जो मार्ग शृंखला की पुस्तकों में संकलित हैं। उसी शृंखला के पहले खंड से उन्हें दो अध्याय लिंगायत मठाधीशों के दबाव में वापस लेने पड़े थे। इसी शृंखला की पुस्तक ‘मार्ग 4’ पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड 2006 में मिला। सन 2012 में कर्नाटक सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने प्रो. कलबुर्गी को उस समिति का प्रमुख बनाया जिसे आदिलशाही वंश के अधीन रचे गए समस्त साहित्य को कन्नड़ में लाने का कार्यभार सौंपा गया। श्री कलबुर्गी आदिलशाही वंश को दक्कन के पठार में सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अलमबरदार मानते थे। 

प्रणय कृष्ण के अनुसार प्रो. कलबुर्गी वचन साहित्य के महान अध्येता थे। उनके संपादन में ही 450 से भी ज्यादा संतों की वाणियों को 15 खण्डों में ‘समग्र वचन सम्पुट’ नाम से संकलित करने की शुरुआत हुई थी। वे सवाल उठाते हैं कि क्या इन संतों ( शरण और शरणियों) ने वेदों पर व्यंग्य नहीं किया, कर्मकांडों का उपहास नहीं किया? क्या देवी-देवताओं की उपासना का तिरस्कार नहीं किया? उनकी ह्त्या के बाद भी जिस तरह विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि टी.वी. चैनल पर श्री कलबुर्गी पर देवी-देवताओं के तिरस्कार का आरोप लगा रहे थे और प्रकारांतर से लोगों के विक्षोभ के बहाने उनकी हत्या के औचित्य का संकेत कर रहे थे, क्या वे बसवन्ना, अक्क महादेवी, अल्लम प्रभू, चेन्न बसवन्ना, दोहर काकय्या, चेन्नैया, सिद्धरमा, गणचार और सैकड़ों शरणों और शरणियों से अतीत में जाकर बदला लेंगे? 

प्रणय कृष्ण ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि प्रो. कलबुर्गी ने 103 पुस्तकें लिखीं और यह साबित किया कि आज के समय में भी मातृभाषाओं में चिंतन और शोध के उच्चतम शिखर छुए जा सकते हैं। वे मातृभाषाओं में शिक्षा देने के प्रबल हिमायती थे और हाल ही में उन्होंने कर्नाटक सरकार से मांग की थी कि वह केंद्र सरकार से अपनी भाषा नीति स्पष्ट करने को कहे।

प्रो.कुलबर्गी, कामरेड गोविंद पंसारे और डा. दाभोलकर की हत्याएं तथा पाकिस्तान और बांग्लादेश में परिपाटी से हट कर मुक्त विचार रखनेवालों की हत्याएं यह बताती हैं कि धर्मसत्ता, राजसत्ता, पितृसत्ता, पूंजी की सत्ता और वर्ण-व्यवस्था की सत्ता के व्यापक गठजोड़ के बावजूद सही और सच्चे विचारों से कानून, राजनीति और विचारधारा के स्तर पर निपट पाना इन ताकतों के लिए मुश्किल पड़ रहा है। इसीलिए व्यक्तिगत हत्याओं का सहारा लिया जा रहा है। नए भारत की खोज के लिए शहीद हुए इन अग्रजों के उसूलों और विचारों को आम जनता के बीच रचनात्मक प्रयासों से लोकप्रिय बनाना ही वह कार्यभार है जो उस लोकजागरण के लिए जरूरी है जिस के लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे और जो भारत के भविष्य की एकमात्र आशा है। 

इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, जनपथ संपादक अनंत कुमार सिंह, शिक्षक नेता अखिलेश, धर्म कुमार, रामकुमार नीरज, शायर इम्तयाज दानिश, कवि अरुण शीतांश, सुमन कुमार सिंह, ओमप्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, संतोष श्रेयांस, कवि-चित्रकार रविशंकर सिंह, रंगकर्मी राजू रंजन, आशुतोष पांडेय, विजय मेहता, रंगकर्मी सूर्यप्रकाश, पत्रकार प्रशांत, वार्ड पार्षद गोपाल प्रसाद, दीनानाथ सिंह, बालमुकुंद चौधरी, दिलराज प्रीतम, आइसा के संदीप, राकेश कुमार, श्याम सुंदर, रंजन, राजू राम, विक्की, अनिल, सुशील यादव आदि मौजूद थे। 

Wednesday, June 17, 2015

परम्परा में जो कुछ सुंदर है हम उसे जिएंगे

(साथी सुनील सरीन के कन्धों पर युवानीति की जिम्मेवारी थी. उनका घर संस्कृतिकर्मियों और भोजपुर के वामपंथी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं का एक अड्डा था. उस वक्त नाटकों में काम करना शुरू नहीं किया था. लेकिन आरा शहर के जिस मुहल्ले में उनका घर है वहीँ मेरा ननिहाल है, लिहाजा बचपन से ही उनके घर आना जाना था. उनकी शादी उस वक्त पूरे मुहल्ले में चर्चा का विषय थी. शादी के बाद अनुपमा भाभी ने नुक्कड़ नाटकों में अभिनय किया, नाटक टीम के साथ गांव दौरे में भी गयीं. परम्परागत रीति रिवाज  से अलग हट कर जो उनकी शादी हुई थी वह तो महत्वपूर्ण था ही, हमारे लिए उससे भी आगे बढ़ा हुआ कदम था अनुपमा भाभी का नाटकों में अभिनय. उस वक्त युवानीति से कई लड़कियां जुडी थीं. सुनील भइया और अनुपमा भाभी रोजी-रोटी के चक्कर में आरा से दूर चले गए. अब भी आरा शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत में स्त्रियों की मौजूदगी बहुत ही कम है. जब भी मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मुझे आरा के सांस्कृतिक जगत की इस जोड़ी की याद आती है. इन्होंने वैवाहिक जीवन के 25 साल पूरे कर लिए हैं. उन्हें हार्दिक बधाई. आइए उस शादी को याद करें, खुद सुनील सरीन की जुबानी- सुधीर सुमन) 



शपथग्रहण 
माँ पिताजी के साथ 
25 साल पहले। 17 जून को पटना जिले के मोरियावां गांव में हम जीवन-साथी बने थे। भीषण गर्मी थी। छत पर खुले में दरियां व बेडशीट बिछा दिए गए थे। अनु के रिश्तेदार, संगी-साथी और मेरे साथियों-रिश्तेदारों को मिलाकर 150 से अधिक लोग जुटे थे। एक नये किस्म का विवाह हो रहा है– यह देखने के लिए अगल-बगल की छतों पर भी गांव भर के लोग आ जुटे थे। पड़ोसी भी अपने अपने तरीके से इस शादी में हिस्सेदार हो रहे थे। बगल की छत पर बैठी कुछ महिलाएं बारातियों के स्वागत में गीत मतलब गारी गा रही थीं।

न बैंड बाजा न माड़ो, न डंडा न चौका। कोई फिजुलखर्ची नहीं। एक पेट्रोमेक्स जला हुआ था रोशनी के लिए। झावेंदार ईटों से बने पड़ोस की दीवार से सटा कर लकड़ी की दो कुर्सियां लगा दी गई थीं। कुर्सियों को चादर से ढक दिया गया था। मुझे याद रहा है– मेरी कुर्सी की एक बांह हिल रही थी।

अनु शादी के जोड़े में सजी थी। मेरे लिए भी साथी एश्तियाक ने भाड़े पर एक शेरवानी जुटा दिया था 25 रु. के किराए पर। मेरी बहनों ने पगड़ी और लखनवी जूते खरीद दिए थे।

शपथपत्र पर हस्ताक्षर 
बारात हाईस्कूल के हाते में ठहरी थी। हमारे पड़ोसी पंडित रामसुभग मिश्र 'रासू' साथ गए थे। एक मुल्ला दोस्त भी थे। मेरे कैथोलिक विद्यालय का एक सहपाठी भी था जो पादरी बनने वाला था। अनु के पिताजी आरपी वर्मा ने इस शादी के लिए अपने एक परिचित भंते (बौद्ध भिक्षुक) को आमंत्रित किया था। अर्जक संघ के लोग भी थे। जन संस्कृति मंच के हमारे
कई साथी थे। शादी किस तरह से हो इसकी चर्चा जनवासे में चल रही थी। लगभग सबने ही यह बताया कि विवाह के मुख्य रूप से चार चरण हैं। पहले वर-वधु का परिचय होता है, फिर शादी की कुछ विधियां होती हैं। शपथ-ग्रहण कराया जाता है और अंत में सभी आशीर्वाद देते हैं। हमारी शादी में इस कार्य का बीड़ा उठाया था पत्रकार-कथाकार रामेश्वर उपाध्याय ने।

नैनीताल में 
पच्चीस  वर्षों बाद 
शादी के दिन की कुछ तसवीरें हमने सम्भाल रखी हैं। इन 25 वर्षो में हमने साथ-साथ कई मुकाम तय किए। आरा, बोकारो, वेरावल(गुजरात), दमण, मुम्बई और अब दिल्ली में। हमने बहुत कुछ हासिल किया। कई खुशियां बटोरीं। दुख के पल भी आये। अभी बहुत कुछ रह गया है जिसे साथ मिलकर पाना है। कई सपने देखे हैं हमने। एक बेहतर समाज, एक बेहतर दुनिया का सपना...। नई दुनिया बनाने की जंग के हम भी राही हैं। चलते रहेंगे ... और जिंदगी के गीत गाते रहेंगे।

Sunday, January 11, 2015

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर 'संकल्प सभा' का पर्चा


फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति को शिकस्त दो
बेहतर व्यवस्था के लिए संघर्षशील अवाम की एकता कायम करो
इंसाफ, अमन और सामाजिक-आर्थिक बराबरी की जंग तेज करो

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर
संकल्प सभा

13 जनवरी 2015, समय- 12 बजे दिन, स्थान- अबरपुल, आरा


नागरिक बंधुओ,

आज से सात वर्ष पहले अपराधियों ने का. सुफियान की हत्या कर दी थी। अपराधियों और हत्यारों को उन शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण मिलता रहा, जो सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का सिर्फ पाखंड करती हैं,, लेकिन जिन्होंने अपनी जनविरोधी कारगुजारियों के कारण आरा और बिहार ही नहीं, पूरे देश में फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति के लिए आगे बढ़ने की जमीन तैयार की। इसके विपरीत का. सुफियान जमीनी स्तर पर सांप्रदायिकता और अपराध के खिलाफ जुझारू जंग लड़ते रहे। वे ऐसे इंसान थे, जिन्हें हिंदू-मुस्लिम भाईचारा और आम नागरिकों की सुरक्षा की फिक्र थी। तीन-तीन बार आरा शहर में दंगे भड़काने की साजिश की गई, लेकिन का. सुफियान ने हर बार हिंदू-मुस्लिम अवाम की एकजुटता को संभव किया और सड़कों पर उतरकर उन साजिशों को नाकाम किया। 

देश की आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदू-मुस्लिम अवाम ने एक होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उनकी दमनकारी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था, अपने समय में का. सुफियान उसी परंपरा को जीवित रखने वाली इंकलाबी धारा के नुमाइंदे थे। यह बेवजह नहीं था कि रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला की ‘साझी शहादत साझी विरासत’ की चेतना से लोगों को उन्होंने लैस करने की कोशिश की। जिन्होंने इस देश में कभी बुश को बुलाया था और जो अब गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के स्वागत की तैयारियां कर रहे हैं, का. सुफियान उन जैसों के विरोधी थे। उनके भीतर गरीब-मेहनतकश जनता का स्वाभिमान था। जनता के ऐसे ही स्वाभिमान के बल पर किसी राष्ट्र की संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रहती है। का. सुफियान शहीद-ए-आजम भगतसिंह के अनुयायी थे, जिन्होंने जनता की वर्गीय एकजुटता को सांप्रदायिकता और साम्राज्यवादविरोध के लिए जरूरी बताया था। 

का. सुफियान हमेशा आरा में दबे-कुचले-पिछड़े-दलित समुदायों और अकलियतों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों में शामिल रहे। विडंबना यह है कि अकलियतों की खराब जीवन दशा के बारे में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद भी उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के बजाए उनके खिलाफ नफरत की सियासत को तरह-तरह की साजिशों, अफवाहों के जरिए लगातार हवा दी जाती रही है। अमेरिकन साम्राज्यवाद की रणनीति की तर्ज पर अपने देश में भी मुसलमानों की पहचान आतंकवादी के बतौर कायम करने की हरसंभव कोशिश की गई है। बेगुनाह नौजवानों को आतंकवाद के फर्जी मुकदमों में कई-कई वर्षों तक जेल में बंद रखा जाता है, कोर्ट के कैंपस में उनकी हत्याएं की जाती हैं, आरएसएस से जुड़े सांप्रदायिक लोगों द्वारा नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। अभी हाल में गुजरात में आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर जो माॅक ड्रील की गई, उसमें आतंकवादियों की भूमिका करने वालों को मुस्लिम वेशभूषा धारण करवाया गया था। मुसलमानों को बदनाम करने की ऐसी तमाम साजिशों का एक मुकम्मल जवाब हैं का. सुफियान। गरीब-मेहनतकश आम अवाम की इंकलाबी ताकत की पहचान हैं का. सुफियान।

बहुत ही कम उम्र में दर्जी यूनियन के जरिए का. सुफियान ने गरीब-मेहनतकशों के हक-अधिकार की लड़ाई की शुरुआत की थी। जीवनयापन के लिए कई छोटे-मोटे काम करते हुए उन्होंने ताउम्र भाकपा-माले के परचम को थामे रखा। हिंदू राष्ट्र का सपना दिखाकर पूंजीपतियों और कालेधंधे वालों का हित साधने वाले हों या सामाजिक न्याय, सेकुलरिज्म और सुशासन का पाखंड करने वाले, का. सुफियान  ने इन सबका विरोध किया। उन्होंने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की साठगांठ से होने वाली लूट का विरोध किया और जब वार्ड के चुनाव में वे जनप्रतिनिधि के रूप में चुने गए, तो यह दिखाया कि ईमानदारी से किस तरह विकास किया जाता है। 

नागरिक बंधुओ, देश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, केंद्र की मोदी सरकार जनता को विकास और अच्छे दिन का झांसा देकर देश के प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल, किसानों-आदिवासियों की जमीन को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को औने-पौने दामों में बेच रही है, आम जनता जिन खुदरा व्यवसायों या छोटे-मोटे धंधों के जरिए अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करती थी, उनको भी बड़ी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। इसके खिलाफ जनता में बढ़ रहा गुस्सा जबर्दस्त तूफान का रूप न ले ले, इसी मकसद से सरकार ने धर्म-संप्रदाय के नाम पर उन्माद और तनाव फैलाने वालों को खुली छूट दे दी है। बंधुओ, आज हमें सैकड़ो सुफियान की जरूरत है, जो लुटेरों-अपराधियों के चंगुल से अपने देश, शहर और समाज को बाहर निकाल सकें। आइए का. सुफियान के शहादत दिवस पर हम इस जंग को तेज करने और आम अवाम की बहुत बड़ी एकता कायम करने का संकल्प लें। 

निवेदक : भाकपा-माले, आरा नगर कमेटी

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी : चंद्रभूषण

13 जनवरी 2008 को का. सुफियान की शहादत के बाद पत्रकार साथी चंद्रभूषण ने अपने ब्लॉग पहलू पर एक पोस्ट लिखा था. उसके बाद उनके एक दूसरे पोस्ट में भी का. सुफियान का जिक्र आया था. कल उनका आठवां शहादत दिवस है. इस मौके पर चंद्रभूषण की यादों को हम यहाँ साझा कर रहे हैं. चंद्रभूषण ने आरा में भाकपा-माले के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के बतौर काम किया. समकालीन जनमत के संपादक मंडल में रहे.  फ़िलहाल डेढ़ दशक से हिंदी पत्रकारिकता के वे एक सुपरिचित नाम हैं. जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा के बाद आजकल वे नवभारत टाइम्स में कार्यरत हैं.

...एक अनजाने से नंबर से एसएमएस आया- 'अबरपुल के कॉमरेड सुफियान नहीं रहे। अपराधियों ने गोली मार दी।' पलटकर फोन किया तो लगातार इंगेज। ऐन स्कूटर स्टार्ट करते वक्त फोन बजा। उठाया तो पता चला सुनील (सुनील सरीन) हैं- नंबर कुछ और हो गया है। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि सुफियान अपनी दुकान के सामने कैरम खेल रहे थे, तभी नौशाद गैंग के लोगों ने आकर उन पर गोलियों की बारिश कर दी। स्पॉट डेथ हुई।...


मोहम्मद सुफियान भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा में लगभग अपने बचपन से ही सीपीआई-एमएल लिबरेशन के कार्यकर्ता थे। मेरे निजी मित्र तो वे थे ही। आरा में जब पार्टी का काम शुरू हुआ तो दर्जी यूनियन और बक्सा मजदूर यूनियन ही इसका आधार बनी। संयोगवश इन दोनों ही यूनियनों में बहुसंख्या मुस्लिम मजदूरों की थी। सुफियान के पिता खुद भी दर्जी थे, हालांकि उनके पास अपनी दुकान नहीं थे। वे और शहर में काम करने वाले ढेरों अन्य अनपढ़ बाल मजदूरों की तरह उनके अकेले बेटे सुफियान थोक में कपड़ा सिलने वाली एक दुकान पर काम करते थे। आंदोलन बढ़ा तो मजदूरों की कुछ मांगें मानी गईं, लेकिन इसका नेतृत्व कर रहे सारे लोगों को काम से हटा दिया गया।

तब से जीविका के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे धंधे सुफियान ने किए। उनका आखिरी काम एक सैलून खोलने का था, जिसका फीता न जाने क्या सोचकर उन्होंने मुझसे ही कटाया था। उनके सैलून में बाल कटाने वाला पहला व्यक्ति भी मैं ही था।(सैलून के बाद सुफियान ने छोटी सी एक बिस्कुट फैक्ट्री खोली थी.) 
सुनील ने बताया कि इस बार आरा में हुए नगर निगम चुनाव में सुफियान अबरपुल इलाके के वार्ड कमिश्नर चुने गए थे। शायद यह उनका पहला ही चुनाव रहा हो, क्योंकि जबतक मैं आरा में था, तब तक तो यह कल्पना भी करना कठिन था कि सुफियान कभी चुनाव लड़ेंगे। 

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी। वे साथ हों तो किसी से भी भिड़ा जा सकता था- चाहे वह कोई उन्मादी भीड़ हो या अपनी अफसरी के गुमान में फूला कोई पुलिस अफसर। आरा के झोपड़िया स्कूल के सामने गद्दार विधायक श्रीभगवान सिंह का विरोध करते हुए अपने बीस साथियों के साथ मैं और सुफियान भी साथ-साथ जेल गए थे। वहां किसी बात पर झड़प के दौरान जेलर ने सुफियान को घुटना मार दिया था। इसके विरोध में और व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए हम लोगों ने जेल में भूख हड़ताल की, जिसमें जेल के तीन चौथाई से ज्यादा लोग शरीक हुए।

एक बार चुनावी माहौल में अपनी पार्टी का टेंपो डाउन देख मैं दोनों हाथों में अपना सिर थामे बैठा था, तभी सुफियान आए और मुझपर बिल्कुल बरस पड़े। उन्होंने कहा कि ऐसा करके आप बिगड़ी हालत को और बिगाड़ रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हर हालत में भिड़ने, मुकाबला करने की उनकी उस जिद और मस्ती का हाल अभी कैसा था। आखिर अब वे कोई बाल मजदूर नहीं, एक सैलून के मालिक और वार्ड कमिश्नर थे। लेकिन ऐन लोहड़ी की ठंडी रात सुफियान अपनी दुकान के बाहर कैरम खेलते हुए मारे गए, इससे लगता यही है कि बीच के चौदह सालों ने उन्हें भीतर से बहुत ज्यादा नहीं बदला था।

सुफियान को इस तरह याद करना मेरे लिए बहुत अटपटा है। समय की एक चौदह साल मोटी धुंधली दीवार मुझे अपने उस होने से अलगाए हुए है, जिसमें सुफियान और बहुत सारे ऐसे लोग थे, जिनके बिना अपना होना तब नामुमकिन लगता था। यह ध्रुवीय इलाकों में सफर कर रहे अभियान दल के लोगों के बरताव जैसा है, जो अपने पैरों की मर चुकी उंगलियां हथौड़े से तोड़कर आगे बढ़ जाते थे। सुफियान जैसा अपना टूटा हुआ सुन्न अंगूठा हजार मील दूर से निहारते हुए कहीं पहुंचनेकोई मुकाम सर करने जैसी कोई बात अगर अपने जेहन में होती तो लिखना शायद इतना अटपटा नहीं लगता।

...जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि मुसलमानों में धर्म ही सबकुछ है, जाति कुछ नहीं है, उनके लिए एक सूचना कि मेरी जानकारी में सिर्फ अबरपुल मोहल्ले में मुसलमानों की कुल 32 जातियां मौजूद थीं। बीड़ी बनाने वाले अपने एक साथी नन्हक जी की बेटी से हम लोगों ने सुफियान की शादी कराने की कोशिश की थी तो इलाके की दर्जी बिरादरी से आक्रोश के स्वर उभरने लगे- अब दर्जियों के दिन इतने खराब हो गए कि साईं-फकीर की लड़की ब्याह के घर में लाएंगे। इसके कुछ महीने बाद अबरपुल की मस्जिद में सुफियान का निकाह पढ़ाया गया- दोनों तरफ से कबूल है, कबूल है के जैसा कोई फिल्मी मामला नहीं था। दुल्हन घर में ही रही और उसकी तरफ से उसका इकरारनामा उसके बाप ने दिया। इसके अगले साल सुफियान कुछ दिनों तक मेरे साथ जेल में रहे। उनके साथ मेरा अंतिम और परोक्ष संवाद 1995 का है, जब जनमत में लिखे एक जेल संस्मरण पर उन्होंने चिट्ठी भेजकर अपना तीखा एतराज जताया था। मैंने लिखा था कि जेलर ने एक आंदोलन के दौरान सुफियान को घुटना मार दिया था, जिसे पढ़कर इलाके में शायद उनका कुछ मजाक बन गया था। उनका कहना था कि कोई घुटना-वुटना नहीं मारा था, मैंने खामखा अपनी बहादुरी जताने के लिए यह सब लिखा है।...


Saturday, April 12, 2014

माले की तमाम कमिटियां और इससे जुड़े सारे जनसंगठन राजू यादव के प्रचार में लगे हैं

माले का चौतरफा चुनाव प्रचार जारी है: का. कुणाल 

आरा: 12 अप्रैल 2014
आरा में अपने प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के लिए कैंप किए हुए भाकपा-माले के राज्य सचिव का. कुणाल ने कहा है कि पूरे लोकसभा में पार्टी का जमीनी स्तर पर जोरदार प्रचार अभियान चल रहा है
दैनिक आज १३ अप्रैल 
प्रभात खबर 
केंद्रीय कमेटी का. कृष्णदेव यादव, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, राज्य कमेटी सदस्य का. सुदामा प्रसाद, जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह समेत तमाम जिला कमेटी सदस्य, इनौस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का. असलम, आइसा के राज्य सचिव का. अजित कुशवाहा, आइसा जिला अध्यक्ष का. सबीर, ऐपवा की शोभा मंडल, ऐक्टू के यदुनंदन चैधरी, बिहार राज्य कर्मचारी महासंघ-गोप गुट के मदन प्रसाद और उमा यादव, रिक्शा टमटम, टेंपू यूनियन के नेता का. गोपाल प्रसाद, फुटपाथी दूकानदार संघ सह निर्माण मजदूर यूनियन के बालमुकुंद यूनियन, आॅल बिहार प्रोग्रेसिव एडवोकेट एसोसिएशन के अमित कुमार बंटी, माले नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम, वार्ड पार्षद विद्यावती देवी, सुधा देवी, लल्लू कुमार, नगर कमेटी सदस्य सत्यदेव, दीनानाथ सिंह, राजनाथ पासवान, सुरेश पासवान, खेमस के कामता प्रसाद सिंह, अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष चंद्रदीप सिंह, पूर्व विधायक अरुण सिंह समेत तमाम प्रखंडों और ब्रांचों के सचिव इस चुनाव अभियान में लगे हैं।
दैनिक हिन्दुस्तान 
इंकलाब नौजवान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि राय अगिआंव में तथा राज्य स्थायी समिति के सदस्य का. संतोष सहर शाहपुर  में, का. क्यामुद्दीन आरा मुफस्सिल में तथा का. महेश और राजू रंजन बड़हरा में, संदेश में परशुराम सिंह, सहार में मदन जी, तरारी में विंदेश्वरी जी, चरपोखरी में रमेश और रघुवर पासवान, पीरो में विजय जी आदि खास तौर पर चुनाव के अभियान की कमान संभाले हुए हैं। आइसा ने करीब साढ़े तीन सौ छात्र-नौजवानों को चुनाव प्रचार के लिए संगठित किया है, जो पिछले दो सप्ताह से पूरावक्ती कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं।
कई दिनों के बाद जागरण में एक छोटी सी खबर 
सांस्कृतिक संगठन हिरावल और युवानीति के कलाकार भी प्रचार में जुटे हुए हैं। हर रोज नए-नए कार्यकर्ता और प्रचारक पार्टी के साथ जुड़ रहे हैं। पार्टी की सभाओं और बैठकों मे उत्साह के साथ उमड़ती जनता को देखकर इस बार लगता है कि माले 1989 के इतिहास को दुहराएगा और राजू यादव को यहां से जीत हासिल होगी। 
कल से पार्टी के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य दो दिवसीय दौरा शुरू हो रहा है। जिसमें वे आठ सभाओं को संबोधित करेंगे।