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Friday, November 9, 2018

शहीद कॉ. मंजू देवी की याद : संतोष सहर

वो सूरतें इलाही किस मुल्क बसतियाँ हैं
अब  देखने को जिन केआंखें तरसतियाँ हैं

(ऑटो चालक ने मुझे जिस जगह उतारा वह पुनपुन नदी पर बना एक पुल था। का किनारा था। पूछने पर पता चला यह पुनपुन नदी है। पुल के पहले व बाद में दो-चार गुमटियां और सामुदायिक भवन जिस पर कॉ. मंजू देवी के नाम का शिलापट्ट लगा हुआ है। पुल के पार बाएं उतरिये तो धरनई गांव। नीचे से होकर बहती पुनपुन नदी, जिसमें दर्जन भर बच्चे छपाछप नहा रहे होते हैं।
पूछते-पाछते घर तक पहुंचा तो दो किशोर वय बच्चियां मिलीं। फिर कॉ. मंजू भी दिखीं कमरे की दीवारों पर टंगी अपनी तस्वीरों से झांकती हुईं।
आज जब देश के फासीवाद निजाम की ओर से सामाजिक-आर्थिक वंचना व गैरबराबरी के खिलाफ हम मेहनतकशों के संघर्ष के महान नायकों - लेनिन, पेरियार, अम्बेदकर, भगत सिंह आदि के स्मारकों, मूर्तियों व स्मृति चिन्हों तक के प्रति देशव्यापी उन्मत, घृणित व हिंसक अभियान छेड़ दिया गया है, कॉ. मंजू को याद करना बेहद जरूरी लगता है।
रणवीर सेना के गुंडों ने 10 नवम्बर 2003 को जहानाबाद जिले के पुराण गांव में कायरता की एक नई मिसाल कायम करते हुए उन्हें मार डाला था। अपने दो साथियों के साथ लौट रही मंजू देवी पर कई गोलियां दागी गयीं जबकि वह हत्यारों के सामने अकेली और निहत्थी खड़ी थीं। हत्यारे तभी हटे जब उन्हें उनके जीवित न बचने का पक्का यकीन हो गया। तब उनकी उम्र महज तैतीस बरस थी।- संतोष सहर)

जन्म और बचपन
जहानाबाद जिले (अब अरवल) का एक गांव है - खरसा। यह गांव उस लक्ष्मणपुर-बाथे गांव से ज्यादा दूर नहीं जहां 31 दिसंबर 1997 को 59 दलित-गरीबों का नृशंस जनसंहार हुआ था।
वर्ष 1970 में 14 अप्रैल को जो बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर का जन्मदिन भी है, मंजू पैदा हुईं। वे अपनी माता-पिता शांति देवी और शिवसेवक साव की पहली संतान थीं। अपने चार छोटी बहनों और दो छोटे भाईयों समेत चचेरे भाई-बहनों समेत भरा-पूरा लेकिन गरीब परिवार। पिता और चाचा विरासत में मिले चावल की लदनी-बेचनी का काम करते थे। दस कट्ठा जो पुश्तैनी जमीन थी, वह भी कब की बिक चुकी थी। सबसे बड़ी सन्तान थीं इसलिए बचपन लाड़-प्यार में ही बीता।

पहला सबक
10 साल की उम्र हुईं तो मंजू ने स्कूल जाने की ज़िद ठान लीं। गरीब मां-बाप ने खरसा टोले के प्राथमिक विद्यालय में नाम लिखा दिया।
स्कूल आने-जाने के दौरान ही मंजू ने समाज की गैरबराबरी, जाति व लिंग आधारित पूर्वाग्रहों, भेदभाव व हिंसा का प्रत्यक्ष अनुभव हासिल किया। भूमिहार जाति के दबंग मालिकों के बिगड़ैल बच्चे हर बहाने से दलित-गरीबों के बच्चों के साथ मारपीट व बच्चियों के साथ छेड़खानी किया करते। उनके घरवाले भी हर शिकायत की अनसुनी करते। मंजू ने अपने दलित-गरीबों के बच्चों के साथ मिलकर उनका विरोध करना शुरू किया। इस तरह उनके किशोर मन में अन्याय के प्रतिकार व सामंती हिंसा के प्रतिकार के पहले बीज अंकुरित हुए।
यही समय था जब सरवरपुर, कईल, कामता आदि आसपास के गांवों में नई हलचल शुरू हुई। आइपीएफ तथा भाकपा-माले का संगठन बनने लगा। लोदीपुर में भी आइपीएफ के लोग आने-जाने लगे। दलित टोले खरसा में तो मजबूत संगठन बन गया। 1985 के विधानसभा चुनाव आया। दबंगों ने गोली चलाई और गांव का बूथ कब्जा कर लिया। इस घटना ने गरीबों के भीतर अपना संगठन बनाने के संकल्प को और बढ़ा दिया।
पिता शिवसेवक साव बताते हैं कि सरवरपुर के इंदल मेहता (लोकप्रिय नाम गांधी जी) और कुंती देवी तथा बेलावं की मीना देवी आइपीएफ में थीं। खरसा टोले के सिद्धेश्वर, राजबलि और रामईश्वर पासवान भी थे। मंजू भी गांव स्तर पर आइपीएफ से जुड़ गई। बैठकों की खबर करना, बाहर से आये लोगों के खाने-सोने की व्यवस्था करना और सभा-जुलूसों में आना-जाना। यह देखकर मेरे मन में भय पैदा होने लगा। मालिकों का दबाव व धमकी मिलती और जाति-बिरादरी की नसीहतें। मैंने समझाने-बुझाने से लेकर डराने-धमकाने तक के तरीके आजमाने शुरू कर दिये। लेकिन, अंततः उसने मुझे भी कायल कर लिया, अपना समर्थक बना लिया।
कॉ. मंजू का अपने अपने भाई-बहनों से असीम लगाव था। वे उनका बहुत खयाल रखती थीं। बदले में उनका भी आदर-प्यार उन्हें मिलता। वे पास-पड़ोस के गरीबों की हर तरह से मदद करने को हमेशा तत्पर रहतीं। वे गांव-घर की चहेती बन गयीं।
उसी समय एक घटना घटी। एक रात शिवसेवक साव के घर में चोरी हो गयी। चोर घर का सारा सामान, कपड़ा-लत्ता और अनाज-पानी उठा ले गए। चोरी किसने करवायी यह समझना मुश्किल नहीं था। आइपीएफ ने इस गाढ़े वक्त में परिवार का पूरा साथ दिया। जरूरत का हर समान मुहैय्या कराया। अब पूरा परिवार ही आइपीएफ का मुरीद बन गया। मंजू भी जोश-खरोश से संगठन का काम करने लगीं।
चर्चित महिला नेता कॉ. कुंती देवी बताती हैं कि मंजू से मेरी पहली भेंट 1985 में ही हुई थी। लोदीपुर-खरसा गांव में महिला संगठन की बैठक हो रही थी। वह देखने-सुनने के लिए बैठक में आयी थीं। उनको बैठक में शामिल कर लिया गया। बारह-तेरह साल की लगती थीं। मैंने जब बात चलायी तो संगठन का कामकाज करने को तैयार थीं।
20 सितंबर 1988 को सामंतों ने आइपीएफ के स्थानीय नेता कॉ. चितरंजन मिश्र की हत्या कर शव गायब कर दी। कॉ. मंजू ने उनके शव को ढूंढने में सक्रिय भूमिका निभायी जो अंततः एक तालाब में मिला। तब वे सातवीं कक्षा में थीं। इस हत्या के खिलाफ चले आंदोलन के दौरान ही उनकी सक्रियता अगले स्तर तक पहुंची।

युवा जोश
अरवल रेड क्रॉस सोसायटी के अध्यक्ष कॉ. राजनारायण चौधरी बताते हैं : ' मैंने लाल छींट का फ्रॉक पहने एक बच्ची को झंडा थामे जुलूस के आगे-आगे चलते और नारा लगाते देखा। वह देखने में बमुश्किल 15 साल की लगती थी। वह जल्द ही जनवादी महिला मंच की नेता और भाकपा-माले के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के बतौर काम करने लगीं।
1989 में करपी प्रखंड के केयाल गांव में एक माले कार्यकर्त्ता रामप्रवेश दास (राजेश) को सामंती गुंडों ने हत्या कर देने की नीयत से पकड़ लिया। कॉ. मंजू ने तुरत ही लोगों को संगठित किया, गुंडों का प्रतिरोध किया था और उन्हें छुड़ा लिया था। 1990 के विधानसभा चुनाव में जब कॉ. रामाधार सिंह अरवल के प्रत्याशी थे, वह रोजाना हम सबके साथ प्रचार जत्थे में शामिल होती। कॉ. शाह चांद के घर में उसको शेल्टर दिया गया जहां पूरा परिवार उसे अपनी बच्ची की तरह प्यार-दुलार देता। उसके खाने-पहनने का सारा इंतजाम करता। चुनाव बाद वह करपी में ही काम करने लगीं। इसी दौरान उनकी शादी भी हुई और जीवन में एक नया अध्याय जुड़ गया।
1990 में करपी के प्रमुख नेताओं में थे - कॉ. सुभाष सिंह, रामप्रवेश विश्वकर्मा और अशोक वर्मा। कॉ. सुभाष सिंह पार्टी के चंद शुरुआती नेताओं में थे। पार्टी कामकाज के दौरान ही वे और कॉ. मंजू एक दूसरे के नजदीक आये, घनिष्ठ हुए और फिर शादी करने का फैसला लिया।
कॉ. सुभाष सिंह बताते हैं " हमारी शादी अंतर्जातीय थी। मैं राजपूत जाति से था। इस शादी को लेकर मेरे पिता या परिवार में कोई विरोध नहीं हुआ। लेकिन, कॉ. मंजू के पिता व परिवार का विरोध रहा। उनके घर से बाहर आने-जाने पर रोक लगा दी गयी थी। शादी से एक दिन पहले जब उनको अपने मामा के घर (गैनी गांव) पहुंचाया जा रहा था, उन्होंने बीच रास्ते घर में कपड़ा छूट जाने का बहाना बनाया और तब पार्टी के जिला सचिव रहे कॉ. अजित (सुरेश मेहता) के पास जा पहुंचीं। हमारी शादी 2 अप्रैल 1990 को अलावलपुर गांव में हुई थी। सारा इंतजाम जल श्रमिक संघ के नेता रामचरित्तर जी ने किया था। कॉ. शिवसागर शर्मा ने हमें शादी की शपथ दिलवाई थी।"

जीवन की राहों पर
शादी के बाद भी कॉ. मंजू देवी की राजनीतिक सक्रियता कम नहीं हुई। 1992, 1995 व 1997 में क्रमशः अनिल कुमार, धीरेंद्र और जयप्रकाश का जन्म हुआ। इन तीनों का पालन-पोषण करते हुए भी वे माले और महिला संगठन के कार्यक्रमों में सक्रियतापूर्वक हिस्सा लेती रहीं।
"कॉ. मंजू से हुई पहली मुलाकात मुझे अब भी याद है। वे 1990 के अंत में किसान महिला सेल द्वारा आयोजित महिला कन्वेंशन में भाग लेने पटना आयी थीं। एक दुबली-पतली लड़की का शुद्ध खड़ी बोली में दिया गया वह ओजपूर्ण वक्तव्य आज भी भुलाए नहीं भूलता" - ऐपवा की राज्य अध्यक्ष कॉ. सरोज चौबे बताती हैं।
फिर भी घर-परिवार की जिम्मेवारियों, खास तौर पर तीन-तीन बच्चों का लालन-पालन करना एक बड़ी जिम्मेवारी है। कॉ. मंजू देवी ने उचित तालमेल कायम करते हुए अपने बच्चों समेत एक संयुक्त परिवार में सबका, यहां तक कि पूरे गांव का प्यार व सम्मान हासिल किया।
1998-2005 के बीच भाकपा-माले के जहानाबाद जिला सचिव के रूप में काम कर चुके कॉ. कुणाल कहते हैं - 1998 में जब मैं यहां पहुंचा था जिले में लंबे समय बाद एक नया माहौल था। जिले में जनांदोलन तेज करने की पूरी संभावना मौजूद थी। संगठन को भी नई गति व ऊर्जा मिल रही थी। एक नया दौर जिसमें रणवीर सेना एक प्रमुख चुनौती बनकर सामने आयी थी। पार्टी यूनिटी व एमसीसी अपनी अराजक नीतियों की वजह से उसके खिलाफ असफल साबित हो रहे थे। रणवीर सेना की मदद में सरकार भी खड़ी थी। अराजकतावादी कार्रवाइयों व संगठनों पर रोक लगाने की आड़ लेकर जिले में भारी पुलिस फौज तैनात थी। गरीब एक ओर रणवीर सेना की हिंसा तो दूसरी ओर पुलिस का भयानक दमन झेल रहे थे। इन दोनों के खिलाफ व्यापक दायरे में प्रचार अभियान छेड़ते हुए जोरदार व जुझारू प्रतिरोध खड़ा करना वक्त की जरूरी मांग थी। कॉ. मंजू देवी ने इस जरूरत को बेहद संजीदगी से आत्मसात किया। उन्होंने अपने राजनीतिक सक्रियता की दूसरी उड़ान भरी और अगले पांच वर्षों की अल्प अवधि में ही खुद को उस ऊंचाई पर स्थापित कर दिया जो एक नया प्रतिमान बन गया।
करपी के खड़ासीन में रणवीर सेना द्वारा तीन महिलाओं समेत 8 गरीबों का जनसंहार (2 सितंबर 1997) हो या अरवल के इमामगंज में पुलिस द्वारा दो स्कूली छात्रों की हत्या (18 जून 2000) या बलौरा गांव में एक दलित परिवार के दो लोगों की हत्या (2001) - कॉ. मंजू हर हत्याकांड के खिलाफ आंदोलन की अगली कतार में खड़ी रहीं।
कॉ. मंजू ने करपी बाजार में व्यवसायी वीरेंद्र गुप्ता की हत्या, करपी गाँव के किसान कृष्णा प्रसाद पर जानलेवा हमला, आजादनगर (किंजर) के झिकटिया टोले में दो बच्चों समेत दलित महिला की हत्या, करपी के मुरारी गांव में एक किसान की हत्या तथा पुराण गांव में दो युवकों की हत्या की घटनाओं के खिलाफ भी आंदोलन खड़े किए।

महिलाओं की सशक्त आवाज
बंशी प्रखंड के अनुआ गांव में एक रात रणवीर गुंडे एक बनिया परिवार के घर में जबरन घुस गए। पहले तो घर की महिलाओं की आबरू लूटने का प्रयास किये और जब विफल रहे तो बुरीतरह मार-पीट किये। खबर पाते ही कॉ. मंजू वहां पहुंची, प्रतिवाद सभा आयोजित किया और उन पर मुकदमा दर्ज करवाकर ही दम लीं। करपी बाजार में एक महिला किरायेदार और बसनबिगहा में एक दलित लड़की (2002) के साथ बलात्कार करनेवाले सामंती अपराधियों के खिलाफ भी मंजू डटकर खड़ी हुईं।
याद होगा कि कुर्था प्रखंड के सेनारी गांव में जहां एमसीसी ने रणवीर सेना समर्थक बता 34 सवर्ण लोगों की हत्या कर डाली थी (18 मार्च 1999 को)। अगले साल पुलिस ने भी भूमिहार जाति के लोगों के घरों में घुसकर महिलाओं की बर्बरतापूर्वक पीटा। कॉ. मंजू के नेतृत्व में इस घटना के खिलाफ भी प्रतिवाद सभा का आयोजित की गयी।

जन प्रतिनिधि 
सोनभद्र-वंशी-सूर्यपुर जिला परिषद क्षेत्र में आठ पंचायतें हैं - माली बिगहा, खड़ासीन, शेरपुर, अनुआ, सोनभद्र, सेनारी, खटांगी और चमण्डी। पहले यहां एमसीसी का प्रभाव था। वे माले कार्यकर्त्ताओं की भी हत्याएं कर दिया करते थे। लेकिन, जब रणवीर सेना का खूनी दौर शुरू हुआ, वे गरीबों की रक्षा करने के बजाय इलाका खाली कर दिए।
कॉ. मंजू देवी ने गरीबों पर रणवीर सेना-पुलिस द्वारा हत्या-बलात्कार की हर छोटी-बड़ी घटना के खिलाफ पहल की, प्रतिरोध खड़ा किया और गरीबों को इसमें संगठित किया। वह दुःख-सुख की हर घड़ी में उनके साथ खड़ी रहीं। वह जनता का सर्वप्रिय नेता बन गयीं। 2001 में यहां से ही उन्होंने जिला परिषद का चुनाव जीता। रणवीर सेना की महिला प्रत्याशी रीना देवी को भारी मतों से पराजित किया। अपनी जीत को उन्होंने जनसंघर्षों की जीत बताया था।
अरवल के जिला सचिव कॉ. महानन्द बताते हैं : वे बहुत हीं साहसी थीं। तेजी से और सही दिशा में पहलकदमी लेती थीं। एक घटना है कि गांव के दबंग ने गरीब पर खलिहान से धान की चोरी का झूठा आरोप लगाया और उसे पकड़कर मारने-पीटने लगा। वे तुरत वहां पहुंचीं, घूम-घूम कर पूरा गांव को अपने साथ कर लिया और उसे मुक्त करवाया। करपी प्रखंड के मुरारी गांव में रणवीर सेना ने एक किसान की हत्या कर दी। उन्होंने मजिस्ट्रेट से लिखित आश्वासन लिए बगैर शव को उठाने नहीं दिया। प्रशासन ने उन पर इलाके में अशांति फैलाने का मुकदमा दायर किया। वे शासन की धौंस-धमकियों की जरा भी परवाह नहीं करती थीं।
कॉ. कुंती बताती हैं "मंजू में जननेता के जबरदस्त गुण थे। वह बहुत मिलनसार थी, सचेत व समझदार भी। सब कुछ तुरत सीख लेती। गरीबी में पली-बढ़ी थीं सो सहज हीं गरीबों में घुल-मिल जाती। साहसी थी, डर-भय बिल्कुल नहीं था। खूबसूरत, सलीकेदार और पढ़ा-लिखा होने की वजह से वह ऊंची जातियों की युवतियों को भी आकर्षित कर लेती थी। महिलाओं के बीच तो बहुत ही लोकप्रिय थी।''
"कॉ. मंजू आंदोलन और पार्टी के प्रति निष्ठा व वफादारी की मिसाल थीं। जिम्मेवारियों के प्रति हमेशा उत्साही रहतीं। बेहद खुशमिजाज व फुर्तीली जो कठिन से कठिन काम को भी सहजता से सम्पन्न कर देतीं। मध्यवर्गीय शहरी आधार में भी बेहिचक घुस जातीं और वहां अपने समर्थक बना लेतीं। साहस और गरिमा, ये गुण उन्होंने गरीब जनता से परिश्रमपूर्वक हासिल किया था। उस जनता से जो उन्हें अटूट प्यार करती थी।" - कॉ. कुणाल बताते हैं।

वो शाम हत्यारी
धरनई गांव के माले कार्यकर्त्ता विजय बताते हैं : "मैं खुशकिस्मत रहा कि वे मेरे बड़े भाई की पत्नी थीं। उन्होंने मुझे अपने बच्चों की तरह ही प्यार दिया। उस दिन भी मैंने ही अपनी मोटरसाइकिल पर उन्हें बैठक में पहुंचाया। उन्होंने अपने हाथों से मुझे मछली खिलायी। दोपहर बाद मैं वहां से लौटा था।
शाम को यह सुनकर कि रणवीर हत्यारों ने करपी लौटते वक्त पुराण गांव में उनकी हत्या कर दी, गांव-घर में कोहराम मच गया। महिलाएं-बच्चे दहाड़ मारकर रोने लगे। जान ले लेने की धमकियां उनको हर रोज मिलती थीं। किसको पता था कि वह आज ही सच साबित हो जाएंगी।"
कॉ. मंजू के साथ दो और लोग भी थे, अवधेश और अशोक वर्मा। अवधेश कहते हैं कि दिन का समय था इसलिये लगा कि ऐसा कुछ नहीं होगा। आशंका तो हमेशा ही रहती थी। पुराण गांव हमलोग पार करने ही वाले थे कि अचानक हथियारबंद हत्यारे सामने दिख गये। वहां प्रतिरोध करना असंभव था।
11 नवंबर को उसी जगह की गई संकल्प सभा से जिसमें पांच हजार से भी अधिक लोग शामिल थे, जहानाबाद के नदी घाट तक कॉ. मंजू की अंतिम यात्रा शुरू हुई।
कॉ. मंजू की इस कायरतापूर्ण हत्या का देश के हर कोने में विरोध हुआ। जहानाबाद, अरवल, भोजपुर, सिवान, पटना, दरभंगा सब जगह गरीबों, महिलाओं व न्यायपसन्द लोगों ने शोक मनाया। राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम ने हत्यास्थल का दौरा किया व हत्यारों को सजा दिलाने की मांग की।
चर्चित वामपंथी चिंतक जेम्स पेत्रास (अमेरिका ) समेत ब्रिटेन के दर्जनों बुद्धिजीवियों तथा लेबर पार्टी ऑफ पाकिस्तान, यूरोपियन पार्लियामेंट (फ्रांस) तथा सोशलिस्ट पार्टी ऑफ लेबर (फिलीपींस) ने हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग करते हुए बयान व पत्र भेंजे।
जहानाबाद के साथी ब्रह्मदेव ने उनकी शहादत पर यह गीत लिखा था :
"बिलखत मजदूर किसानवा हो,
कामरेड मंजू जी हो गइली सपनवा!
दस तारीख रहे, नवंबर महीनवा,
चार बजे सांझ रहे, सोमवार दिनवा,
गोलिया मरलस रणवीर सेनवा हो!
कामरेड मंजू जी हो गइली सपनवा!
गांवें-गांवें, टोले-टोले, खबर पाई,
रोवत-पीटत आवे मजदूर भाई,
घर में रोवे तीन-तीन ललनवा हो!
कामरेड मंजू जी हो गइली सपनवा!
उनकी प्रिय पार्टी भाकपा-माले ने उनको श्रद्धाजंलि देते हुए कहा - "कॉ. मंजू उन बहादुर नई महिलाओं की ठेठ प्रतिनिधि थीं, जो नवजनवाद के लिए, नये बिहार के लिए पिछले तीन दशकों से जारी संघर्ष के दौरान उभरी हैं।"

शर्म उनको मगर नहीं आती
हफ्ते दिन बाद रणवीर सेना ने प्रेस बयान जारी कर इस घृणित हत्या की जिम्मेवारी लेते हुए कॉ. मंजू की हत्या को सही ठहराने की बेशर्मी दिखाई भी दिखा दी। लेकिन जिले के गरीबों के दिल में जमा शोक नया संकल्प बनकर खड़ा था।
हजारों लोगों की सभा के साथ 25 जनवरी 2004 को करपी में कॉ. मंजू के स्मारक व मूर्ति का अनावरण हुआ। शहीद मंजू जीवित मंजू जैसी ही ताकतवर साबित हुईं। हत्यारे उनकी मूर्ति को भी क्षति पहुंचाने की कोशिशों से बाज नहीं आये। लेकिन, आज भी यह मूर्ति व स्मारक गरीब लोगों के गौरव का गान करते हुए वहां खड़ा है।

Wednesday, June 13, 2018

कॉ_अशोक सिंह व दीपिका जी के लिए : संतोष सहर



वे हम सबके साथी हैं - पुराने साथी। अगर आप कभी आरा के पूर्वी रेलवे गुमटी स्थित पार्टी (भाकपा-माले) जिला कार्यालय गये हों तो जरूर ही मुलाकात होगी। मंझोले कद के, पतली कद-काठी, घनी हल्की काली-सफेद बाल-दाढ़ी वाले। जबसे यह कार्यालय है उसी वक्त से उसके एक प्रमुख स्तम्भ। कॉ. रामनरेश राम 1995 से मृत्युपर्यन्त (अक्टूबर 2010) तक सहार क्षेत्र के विधायक रहे और अशोक जी उनके प्रतिनिधि।
इस ऑफिस में हमेशा ही चहल-पहल रहती है। कई-कई तरह की गतिविधि। कहते हैं न कि आदमी पगला जाये, वैसी। एक बार किसी गांव से एक फोन आया। अशोक जी उस वक्त कहीं व्यस्त थे। फोन मैंने उठाया, पूछा -कहिये साथी क्या बात है? वे कोई किसान थे। बोले - मेरी भैंस कल शाम से गायब हैँ। अभी तक कुछ पता नहीं चला। उन्हें खोजने में पार्टी की मदद चाहिए, सो, अशोक जी से बात करनी है। उनकी भैंस शाम तक मिल भी गयी जो भटक कर बगल के गांव में अपने ही रिश्तेदार के 'नाद' पर थी।

पिता की छांव से बुआ की गोद में

साल 1952 में चरपोखरी प्रखंड के कनई गांव में उनका जन्म हुआ। पिता रामनारायण राय जिन्हें 'कलक्टर राय' भी कहते थे और मां सोनझारी देवी की दूसरी संतान ठहरे। एक बहन बड़ी, दो भाई, दो बहनें छोटी। बचपन में ही 'अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन' का जादू चल गया सो पिता कांग्रेसी हो गये। कांग्रेसी पिता ने ही सबसे प्रेम का पाठ पढ़ाया। स्कूल की पढ़ाई बगल के हँसवाडीह गांव से की। फुआ रूपझारो देवी से कुछ ज्यादा लगाव था। उनके पति जो सप्लाई के इंस्पेक्टर थे, दूसरी शादी कर अलग रहने लगे थे। आरा के पश्चिम टोला में अपने घर में वे अकेली पड़ गयी थीं। उनकी देखरेख और आगे की पढ़ाई के लिये अशोक जी को आरा आना पड़ा। जिला स्कूल से मैट्रिक और महाराजा कॉलेज बीएससी तक की पढ़ाई पूरी हुई।

दूर देश की कथा

1952 में ही चरपोखरी के कनई गांव से सैकड़ो मील दूर अवस्थित बांग्लादेश के एक छोटे से गांव में रह रहा एक परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। मनोरंजन भट्टाचार्य जिन्होंने अभी-अभी अपना घर बसाया था और जिनके पूर्वज बरसों से उस गांव में रह रहे थे, आधी रात के अंधेरे में अपनी नवोढ़ा पत्नी के साथ गांव छोड़ने को विवश हुये। बांग्ला देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में धू-धू कर जल रहा था। बांग्लादेश की सीमा पार कर लेने के बाद भी, भय इस कदर हावी था कि वे मीलों दूर दंगारह रहे मनोरंजन भट्टाचार्य अपनी पत्नी के साथ 
डेहरी ऑन सोन में पिछले कुछ वर्षों से रह रहे और वहां के सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके 'सेन मेडिकल' के मालिक ने उन्हें शरण दी। मनोरंजन भट्टाचार्य ने एलएमपी की डिग्री हासिल की, मेडिकल प्रैक्टिशनर बन गये और आसपास के दर्जनों गांवों में घूम-घूम कर लोगों का ईलाज करने लगे। किसान लोगों के बीच बंगाली डॉक्टर बाबू 'ईश्वर का अवतार' साबित हुए। धनहरा गांव के लोगों ने पहले तो उन्हें गांव में ही डिस्पेंसरी खोलने को राजी किया और फिर एक बना-बनाया पुराना मकान खरीदवा कर वहीं पर बस जाने के लिये मना लिया।

दीपिका के उजाले से रौशन हुई दुनिया

सात बच्चों - छह बेटियां व एक बेटा - सात बच्चों के साथ परिवार इस नई जमीन पर भी मजबूती से जम गया। मनोरंजन भट्टाचार्य और रामनारायण राय के बीच पहले जान-पहचान बनी जो चलते-चलते गाढ़ी दोस्ती में बदल गयी। वे अपनी दो बड़ी बेटियों की शादी कर चुके थे। उनसे छोटी दो - दीपिका और नीलिमा ने भी हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी। अब आगे की पढ़ाई के लिये उन्हें आरा आना था। मित्र रामनारायण ने मनोरंजन की परेशानी दूर करने की खातिर आरा के डीन्स टैंक (नवादा मुहल्ला) के पास एक किराये का घर खोज दिया। बच्चियां को गांव-घर-परिवार से अलग, दूर आरा शहर में रहना था, सो मित्र रामनारायण ने बेटे अशोक को हिदायत दी कि वे उनकी देखरेख करें - पढ़ाई-लिखाई व खाने-रहने की जरूरतों का ख़याल रखते हुए रेगुलर वहां आया-जाया करें।
कॉ. अशोक बताते हैं - "मैं अक्सर घूमते-टहलते उनके यहां चला जाता। दीपिका तब महिला कॉलेज में इंटरमीडिएट की छात्र थीं। इसी आने-जाने के दौरान न जाने कब एक लगाव-सा पैदा हो गया। मैं अच्छे स्वभाव का मन जाता था। पढ़ने में भी रुचि रखता था और बीएससी कर रहा था। सभी बहनों, भाई और मां-पिता को भी मैं खूब भाता था। लेकिन, मेरे मन में एक नैतिक हिचक भी थी। यह परिवार अपने गांव-घर से विस्थापित होकर, हजार कष्टों को झेलते हुए, फिर से इस सामाजिक-आर्थिक हैसियत में पहुंचा था। मेरे जरिये आगे का कोई कदम उठाना फिर से उन्हें एक नई तबाही में न डाल दे। मेरा मन बीच मंझधार पड़ी नाव की तरह डांवाडोल था।"
"लेकिन, इस बीच दीपिका और मेरे बीच - एक दूसरे के प्रति - लगाव बढ़ता ही चला गया। हम प्रेम में पड़ गये। जी हाँ, अब हम एक दूसरे के बगैर नहीं रह नही सकते थे।"

दश्त मिलता है मियां इश्क़ में घर से पहले

"इन्हीं दिनों दीपिका के घर में उनकी शादी की बातें चलने लगीं। उनकी दो बड़ी बहनों की शादी कोलकाता में भद्र बंगाली परिवारों में हो चुकी थी। उनके लिए भी कई अच्छे परिवारों के सुयोग्य लड़के मिल रहे थे। मैं बीएससी की परीक्षा देने जा रहा था। एडमिट कार्ड आ चुका था। यह 1973 की बात है। मेरे पिता भी मेरी शादी तय करने वाले थे। अब देर करना संभव नहीं था। हम दोनों ने तय किया कि अब हमें शादी करके इसे जग जाहिर कर देना चाहिये। सो हम कोर्ट पहुंचे और एक-दूसरे का पति-पत्नी होने का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया।"
"दीपिका जी के पिता, माँ, बहन-भाई हमारी शादी के पक्ष में थे। लेकिन, मेरे पिता, चाचा और गांव-समाज इसके खिलाफ उबल उठा। मेरे पिता हम दोनों को तरह-तरह से डराने लगे, जिसमें दोनों को जान से मार-मरवा देने की बात भी शामिल थी। संपत्ति से बेदखली और घर-बदर तो आम बात थी।"
"जब प्यार किया तो डरना क्या? फ़िल्म मुगले आज़म का यह गाना अब भी सबकी जुबान पर रहता था। लेकिन हमारी कहानी कुछ और रही। 'अनारकली' अपने पिता के घर धनहरा चली गयी और 'सलीम' ने मायानगरी मुंबई की राह ली - बागी तेवर लिये हुए, रोजगार की तलाश में।"

बहना! ओ बहना!

"बम्बई (मुंबई) में मेरी बड़ी बहन रहती थी। उनके पति वहां सेल टैक्स अधिकारी थे। मैं उसका शरणागत हुआ। मैं किसी और जगह कहाँ जा सकता था? बहन और बहनोई ने मेरा पूरा साथ दिया, ताकत दी और अपने प्रभाव से मुझे फायरस्टोन टायर कम्पनी में अप्रेंटिशशिप की नौकरी भी दिलवा दी। उन्होंने पिता पर भी दबाव बनाया जब तक वे नाराज रहे , मैं वहां रहा। लेकिन, मन बेचैन ही रहा। हां, इस बीच कुछ कमाई हो गयी। पिता ने दीपिका को अपनी बहू मान लिया। नैहर में रह रही मेरी पत्नी के लिए दशहरा के मौके पर साड़ी-कपड़े व फल-मिठाई भेजे। उसके कुछ दिनों बाद ही मैं मुम्बई से गांव-घर लौटा।"

पिता! हे पिता!

"मुझसे छोटी मेरी दो बहनें थी। अब, जब उनकी शादी करने का मौका आया तो अड़चनें खड़ी हो गयीं। मेरे पिता ने हमारी शादी को मान लिया। उन्होंने 22 मई 1974 को समारोहपूर्वक हमारी शादी का भोज भी आयोजित किया, लेकिन वे चिंतित रहने लगे। मैं अपने परिवार से विलग दिखूँ और मेरी बहनों की शादी में मेरा विवाह मुद्दा न बने, इसलिए मुझे अपने पिता से किसी भी तरह से सम्पर्क न रखना एक शर्त्त बन गया। 22 मई 1974 को जो शादी समारोह हुआ, वह भी उनकी गैर मौजूदगी में ही हुआ। उनके जिगरी दोस्त रामसूरत राय (राय मोटर सर्विस के मालिक) ने 'समधी' का रोल निभाया। में अब भी घर की संपत्ति से वंचित था।"

"हम नया क़रीना सीख गये"

"मुंबई से जो कुछ भी कमाया था, वह खत्म होने लगा था। 1975 में मेरा पहला बच्चा भी इस दुनिया में आ चुका था। मेरी माली हालत डांवाडोल थी। एक दिन पता चला कि मेरे पास महज 500 रुपये बच रहे। घर में युवा पत्नी और एक मासूम नन्ही जान।"/
"मैंने इन्हीं 500 रुपयों से एक धंधा शुरू किया - कबाड़ी का काम। दो मजदूर भी रख लिये। हम तीनों घर-घर घूमते हुए कबाड़ जुटाने लगे। राजेंद्रनगर मुहल्ले में एक सस्ता-सा मकान - दो कमरे, एक छोटा-सा आंगन किराये पर मिल गया। पत्नी-बच्चा साथ रहने लगे। दीपिका टीचर की ट्रेनिंग करने लगीं। 1977 तक मैं 'कबाड़ीवाला' बना रहा। इस बीच मेरे दूसरे बेटे ने जन्म लिया।"
"रामसूरत राय मेरे साथ बड़े ही उदार थे। वे हर वक्त मुझ पर निगाह रखते थे। देर-सबेर जब उनको मेरी हालत की खबर मिली तो खबर भेज मिलने को बुलाया। अगले ही दिन सुबह मैं उनसे मिलने पहुंचा। उन्होंने पहले तो मुझे इतने दिनों तक दूर-दूर रहने के लिये फटकार लगायी। फिर आरा और सहार के बीच चल रही अपनी बस के मैनेजर की नौकरी दे दी। महीने में तीन सौ रुपये का वेतन और बाद में मेरी ईमानदारी व मेहनत देख हर रोज 5 रुपये और। इस नौकरी से जब तीन हजार रुपये मेरे पास जमा हो गये तो मैंने उनसे कहकर यह नौकरी छोड़ दी।"
"1980-88 के बीच मैंने कई तरह के काम किये। एक दोस्त के पिता जो नहर विभाग में कार्यपालक अभियंता बनकर आये के कहने पर कुछ दिनों ठेकेदारी भी की। कारीसाथ में आये एक बौद्ध भिक्षुक से प्रभावित होकर उनके मठ के सचिव के रूप में भी काम किया। 1988 में दीपिका जी को शिक्षिका की नौकरी लग गई। 1989 में पिता भी नहीं रहे। बहनें भी शादीशुदा हो अपने परिवार में रम गईं। दोनों भाई बड़े होकर नौकरी में चले गए। उनका परिवार भी बाहर रहने लगा। सो, मैंने आश्रम से छुट्टी ली और गाँव चला गया। आरा आना-जाना पड़ता ही था। मेरा परिवार जो यहीं था।"

गांव जिसके बगल से एक नदी बहती है

"74 के छात्र आंदोलन में मैं अपने दोस्तों के साथ शरीक था। नाथूराम, रमाकांत ठाकुर, पवन आदि सभी मेरे मित्र थे। मैंने आंदोलन की भरपूर मदद की थी। हालांकि कभी जेल नहीं गया। छात्र जीवन में अपने कॉलेज में भी मेरी एक पहचान थी जो एक जाति विशेष की एक निजी सेना के एक चर्चित दबंग को मेरे द्वारा सबक सिखाने की वजह से बनी थी।"
"मेरे गांव के बगल में एक नदी बहती थी। इस नदी पर सिंचाई के लिये लोग एक अस्थायी बांध बनाते थे। सरकार इसे बार-बार कटवा देती थी। गांव जाते ही उन्होंने मिट्टी ढो-ढोकर स्थायी बांध बनाना शुरू कर दिया। लोग भी इस काम में उतरे। भारी तादाद में पुलिस आयी और आते ही गोली चलाने लगी। दो किसान - संजय यादव और एक अन्य मारे गये। इस गोलीकांड की पूरे बिहार में चर्चा फैल गयी। इन किसानों के सवाल पर कोई संघर्ष खड़ा कर सके - वैसी पार्टी या संगठन की तलाश शुरू की। एक पत्रकार मित्र के जरिये आइपीएफ नेताओं से सम्पर्क हुआ। प्रखंड व जिला स्तर पर जोरदार आंदोलन चला। शहीदों का स्मारक भी बना और स्थायी बांध भी। अब बांध काटने कोई नहीं आता।"
इसके बाद कॉ. अशोक पर आइपीएफ व भाकपा-माले का लाल रंग कुछ यूं चढ़ा कि उसी के होकर रह गए।

न टूटे, न झुके : एक अनथक योद्धा

रणवीर सेना के खूनी हमलों के दौर में कॉ. अशोक जी की सक्रियता, दृढ़ता व तेजी की बदौलत हमने जिला प्रशासन व सरकार को कई बार बैकफुट पर धकेलने में कामयाबी पायी। बथानी जनसंहार के बाद डीएम गोरेलाल यादव को हटना पड़ा, एसपी एस के सिंघल को कठघरे में खड़ा होना पड़ा और एक अन्य एसपी आर के मल्लिक को घुटने टेकने पड़े। बौखलाये एएसपी संजय लाटकर (पीरो) ने उन्हें झूठे आरोपों के तहत चोरी-चुपके आरा से गिरफ्तार करने व जेल में डाल देने के जरिये झुका देना चाहा। लेकिन, उस पर किया मुकदमा वापस नहीं हुआ। यह मुकदमा जघन्य पसौर पुलिस गोलीकांड के बाद जिसमें मुसहर जाति के दर्जन भर लोगों की हत्या कर दी गयी थी, उन्होंने कोर्ट में जाकर दर्ज करवाया था।

होठों पे तबस्सुम है, आंखों में उदासी है

"अमित आनन्द 13 जून को पैदा हुआ था, 1975 में। जैन कॉलेज से जब इंटर पास कर गया तो कहने लगा कि अब आगे नहीं पढूंगा, बिजिनेस करूँगा । मुंबई में जो मेरी बहन रहती थी उसका बेटा (मेरा भांजा) भी इसी रे का था। मैंने घर का धान बेचा था। चौदह हजार रुपये लेकर वह गया। साठ हजार रुपये लोन लेकर वहां रेडीमेड कपड़ों का कारोबार शुरू किया। 20 मशीनें थीं और 25-30 लड़कों का पूरा स्टाफ। वर्कशॉप एक मुस्लिम परिवार के मकान में था। उनकी बच्ची भी सेल्स का काम देखती थी। उन दोनों में प्रेम हुआ। बच्ची बहुत ही नेकदिल और समझदार थी। रेहाना नाम था उसका। अपने घरवालों से बोली कि हम अमित से ही शादी करेंगे। घरवालों को राजी भी कर लिया। हमें भी भला क्या ऐतराज होता? बहन की एक बच्ची की शादी एक 'एक्सपर्ट डिजाइनर' से है जो मुस्लिम समुदाय से हैं। सो, हमने अमित और रेहाना की शादी कर दी। वही, मुंबई में। इस बीच उसे बहरीन से एक अच्छा ऑफर मिला था। एक महीने के लिये वहां गया भी।"

दबे पांव आयी दुख की झंझा

"20 जनवरी को अचानक हम पर वज्रपात-सा हुआ। खबर आयी कि अमित मुंबई में किसी लोकल ट्रेन से गिर पड़ा है। उसका सिर बुरीतरह कुचल गया है। हम भागे-भागे वहां पहुंचे। जिस अस्पताल में वह भर्ती था, उसके तमाम सहयोगी वहां जमा थे। सब के सब दुख में निढाल। लेकिन, वह इस दुनिया से जा चुका था।
उसके दोस्तों ने हमें अपनी ओर से कुछ भी नहीं करने दिया। सारा खर्च मिल-जुलकर उठाया। उन्होनें वर्कशॉप को बेच दिया। सारी मशीनों के दाम समेत बाजार में बकाया पैसे वसूल कर हमारे हाथ में रख दिये। लेकिन, अमित जो हमारे प्यार की पहली निशानी था, वहीं छूट गया था।"


"अभिषेक हमारा छोटा बेटा है। उसके दो बच्चे हैं अंतरा आनंद (10 वर्ष) और विश्वरुप (6 वर्ष)। दीपिका जी कुछ साल पहले रिटायर हो चुकी हैं। एक छोटा-सा घर यहां खरीद लिया है। अब उसी में रहना होता है।"
आज भी अगर आप आरा के माले कार्यालय जायें तो कॉ. अशोक जी आपको भेंट जाएंगे। नीम के पेड़ की छांव में कुर्सी पर बैठे। हल्की मुस्कान के साथ आपका स्वागत करते। लेकिन आज उनकी गहरी उदास आंखे किसी को खोज रही होंगी। आज 13 जून जो है। उस अमित आनंद के जन्म का दिन जिसने प्यार की खातिर जिंदगी दांव चढ़ा दी।
समय हर ज़ख्म को भर देता है। लेकिन ऐसे ज़ख्म शायद कभी नहीं भरते। कामरेड, यह लड़ाई जब हम सबकी साझी लड़ाई है तो यह उदासी भी हम सबकी साझी उदासी है। हम सब आपके साथ खड़े हैं।
-संतोष सहर 

Tuesday, November 29, 2016

काॅॅ. जौहर, काॅॅ. निर्मल और काॅ. रतन के शहादत दिवस पर


आज 29 नवंबर है। 1975 में आज ही के दिन भाकपा-माले के दूसरे राष्ट्रीय महासचिव काॅ. सुब्रत दत्त (काॅॅ. जौहर), काॅॅ. डॉ.निर्मल महतो और काॅ. राजेंद्र यादव (काॅ. रतन) भोजपुर में शहीद हुुए थे। आज भोजपुर के गड़हनी (निर्मल नगर) में इन तीनों शहीदों के स्मारक का शिलान्यास किया गया। शिलान्यास भाकपा-माले के वर्तमान महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने किया। इस मौके पर काॅ. रामजतन शर्मा, काॅ. नंदकिशोर प्रसाद, काॅ. अमर,  काॅ. सुदामा प्रसाद समेत कई वरिष्ठ माले नेता मौजूद थे। 
कामरेड सुब्रत दत्त (जौहर)


1946 में कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे काॅॅ. सुब्रत दत्त का प्रारंभिक स्कूली जीवन दिल्ली में गुजरा था। उनके पिता हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत थे। बाद में सुब्रत दत्त कलकत्ता वापस आ गए। वहीं साम्राज्यवाद विरोधी, कांग्रेस विरोधी कम्युनिस्ट आंदोलन से उनका जुड़ाव हुआ। भारत-चीन के युद्ध के दौरान शासकवर्ग द्वारा भड़काए गए अंधराष्ट्रवादी लहर का उन्होंने दृढ़तापूर्वक विरोध किया। सही क्रांतिकारी लाइन की तलाश में वे सीपीआई से सीपीआई (एम) में गए, फिर नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद सीपीआई (एम) से भी अलग हो गए। उसके बाद सीपीआई (एमएल) मेें शामिल हुए और अपनी नौकरी छोड़कर पेशेवर क्रांतिकारी बन गए। सर्वप्रथम उन्हें छोटानागपुर के बंगाल-बिहार सीमा क्षेत्र के किसानों को संगठित करने की जिम्मेवारी मिली। जल्द ही वे सीपीआई (एमएल) की बिहार राज्य कमेटी के सदस्य बना दिए गए। सीपीआई (एमएल) के पहले महासचिव काॅॅ. चारु मजुमदार की शहादत और बिहार राज्य कमेटी के लगभग सभी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी को नवजीवन प्रदान करने का बीड़ा उठाया। पार्टी के पुनर्गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1974 में भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के पुनर्गठन के बाद उन्हें महासचिव चुना गया। काॅॅ. सुब्रत दत्त ने एक ओर जहां भाकपा (माले) को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का हरसंभव प्रयत्न किया, वहीं भोजपुर कें क्रांतिकारी किसान संघर्ष कर रहे साथियों और जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। भोजपुर की धरती पर ही बाबूबांध, सहार में सशस्त्र पुलिस दल के अचानक हमले में उन्होंने शहादत धारण की।

काॅॅ. राजेंद्र यादव (का. रतन) पार्टी के महासचिव काॅॅ. सुब्रत दत्त के संदेशवाहक थे और तत्कालीन भोजपुर आंचलिक कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने का. सुब्रत दत्त को बचाने की कोशिश करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। का. रतन का जन्म 1950 में तत्कालीन भोजपुर जिले के केसठ गांव के एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। केसठ भोजपुर जिले में सी.पी.आई का मास्को कहा जाता था। कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर मौजूद अंतविर्रोधों से संघर्ष के दौरान गांव के मेहनतकश, उत्पीड़ित गरीब लोगों की वास्तविक मुक्ति की आकांक्षा उन्हें नक्सलबाड़ी की राह पर ले गई। जनवरी 1972 में वे किसानों को संगठित करने के काम में लगे। अपने क्रांतिकारी जीवन की छोटी सी अवधि में ही उन्होंने अपने साथियों और जनता का अगाध विश्वास, प्यार और स्नेह हासिल कर लिया था।

(स्रोत- भाकपा-माले द्वारा प्रकाशित दस्तावेजी पुस्तक ‘बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान) 


काॅॅ. निर्मल महतो (काॅॅ. नरेंद्र) जो जुलाई 75 में बहुचर्चित बहुआरा (भोजपुर) की लड़ाई में पुलिस की घेरेबंदी तोड़कर बाहर निकल आए थे, वे भी का. सुब्रत के साथ 29 नवंबर को बाबू बांध, सहार में शहीद हुए थे। 

काॅॅ. निर्मल महतो बिहार के भोजपुर जिले के बड़उरा गांव के निवासी थे। 1948 में एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे। पटना साईंस काॅलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थी। जिसके बाद डाॅक्टरी की पढ़ाई के लिए उनका दाखिला दरभंगा मेडिकल काॅलेज में हुआ था। उन दिनों उच्च अंकों के साथ पास करनेवाले छात्रों का नामांकन सीधे तौर पर मेडिकल काॅलेज में होता था। लेकिन उस जमाने में दरभंगा मेडिकल काॅलेज में दाखिला लेना तथा हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई करना पिछड़े, दलित एवं उपेक्षित वर्ग के छात्रों के लिए सामान्य बात नहीं थी।

काॅलेज प्रशासन से लेकर हाॅस्टल तक वर्णवादी-सामंती वर्चस्व कायम था। निर्मल महतो जैसे छात्रों के लिए ढंग से पढ़ाई की कौन कहें, हाॅस्टल में टिक पाना भी दूभर था। उन्होंने इस दमघोटू माहौल का विरोध करना शुरू किया। अपने मिलनसार स्वभाव के कारण कुछ ही दिनों में वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए तथा छात्रों को संगठित कर मेडिकल काॅलेज और छात्रावास में तत्कालीन व्याप्त वर्णगत भेदभाव और सामंती उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन का बिगूल फूंक दिया। आंदोलन के दरम्यान कई बार उनपर हमले किए गए। फरवरी, 1973 ई. में उन पर जानलेवा हमला किया गया। घायल अवस्था में अस्पताल में भी उनके साथ बदसलूकी की गई तथा सुनियोजित षड्यंत्र के तहत उन्हें जेल में डाल दिया गया। इन झंझावातों से जूझते हुए उन्होंने घोषणा की कि ‘‘पूंजीवादी न्यायालय मुझे न्याय देने में सक्षम नहीं है।’’ उन्होंने महसूस किया कि इस तरह के माहौल को बदलने के लिए पूरी सड़ी-गली सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करना जरूरी है। अपने कैरियर को त्यागकर वे सहार, भोजपुर लौट गए और भाकपा-माले के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन में शामिल हो गए। बहुत जल्द ही वे उस आंदोलन की अगली कतार के योद्धाओं में शुमार किये जाने लगे। 

(स्रोत- ‘समकालीन चुनौती’ पत्रिका)

Tuesday, October 27, 2015

सम्मान-अधिकार के वास्ते, कामरेड रामनरेश राम के रास्ते


गरीबों-मजदूरों-किसानों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारा ही कामरेड रामनरेश राम का संदेश 

कामरेड रामनरेश राम के रास्ते चलकर ही जनता को सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकार हासिल होगा: का. दीपंकर

आरा समेत भोजपुर के कई प्रखंडों और पंचायतों में रामनरेश राम की याद में जुलूस निकला 

सहार में कामरेड दीपंकर जनसभा को संबोधित करते हुए 
(कामरेड रामनरेश राम की पाँचवी बरसी पर भोजपुर में दो विशाल जनसभाएं हुईं। संयोग से यह भोजपुर में चुनाव प्रचार का आखिरी दिन था। परिसीमन के बाद  जदयू संरक्षित एक अपराधी इस इलाके से जीत गया था, पर इस बार वह अपराधी लोजपा में चला गया है। परिसीमन के बाद दो हिस्से में बंट गए सहार विधान सभा के दोनों हिस्सों यानी तरारी और अगिआँव विधान सभा में इस बार माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद और मनोज मंजिल के प्रति जबर्दस्त जनसमर्थन दिख रहा है। इन दोनों जनसभाओं तक किसी चैनल के कैमरे नहीं पहुंचे। खुद लालू जी की सभा इस जनसैलाब के आगे बेहद फीकी थी। अखबार अब भी यहाँ माले को तीसरे नंबर पर दिखा रहे हैं। जबकि सच यह है कि माले यहाँ एक नंबर पर है। पेश है इन दोनों सभाओं में दिये गए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य के भाषण का सार संक्षेप। साथ में अखबारों के कतरन और कुछ फोटो)
नारायणपुर/ सहार/ आरा/ अगिआंव बाजार : 26 अक्टूबर

भोजपुर में क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के संस्थापक और सहार के पूर्व विधायक का. रामनरेश राम की पांचवी बरसी पर नारायणपुर और सहार में भाकपा-माले ने दो विशाल जनसभाएं की, जिनको संबोधित करते हुए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि भोजपुर में गरीबों और किसान-मजदूरों की राजनीतिक दावेदारी और सामाजिक बदलाव लाने का काम का. रामनरेश राम ने किया। उन्होंने इन ताकतों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारे का जो संदेश दिया, उसी रास्ते से ही देश खुशहाली की ओर बढ़ेगा।

नारायणपुर की सभा में कामरेड दीपंकर 
का. दीपंकर ने कहा कि एक ओर भाजपा है खेती की जमीन हड़पने और खेती को चौपट करने की नीति पर अमल कर रही है और उनका कृषि मंत्री आत्महत्या करने वाले किसानों का अपमान करता है, तो दूसरी ओर भाकपा-माले है, जो किसानों के खेतों में पानी, फसल की खरीद, डीजल, बीज, खाद अनुदान के लिए संघर्ष कर रही है। एक ओर आरएसएस-भाजपा की ओर से आरक्षण खत्म करने की बात की जाती है और उनका एक मंत्री जलाकर मार दिए गए दलित बच्चों की तुलना कुत्ते से करता है, जैसा कि खुद मोदी ने गुजरात जनसंहार के मृतकों की तुलना दुर्घटना में मारे गए पिल्ले से की थी, वहीं दूसरी ओर भाकपा-माले है, जिसने का. रामनरेश राम के नेतृत्व में दलितों-अकलियतों, गरीबों, महिलाओं के मान-सम्मान और बराबरी के अधिकार की लंबी लड़ाई लड़ी है। 
का. दीपंकर ने कहा कि देश में एक बड़बोला नेता प्रधानमंत्री बन गया है, परिवर्तन के नाम पर उसने गरीबों, किसानों, नौजवानों- सबको धोखा दिया है। खाद्य सुरक्षा, मनरेगा, शिक्षा में कटौती कर दी गई और पूरा बजट पूंजीपतियों के लिए खोल दिया गया। सरकार बनने के बाद मोदी ने देशी-विदेशी कंपनियों के लिए किसानों की जमीन छीनने का फरमान जारी किया, जिसे पूरे देश में किसानों और वामपंथी ताकतों ने खारिज करने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा कि भाजपा-आरएसएस देश के सांप्रदायिक एकता को तोड़ रहे है। उन्होंने यही परिवर्तन लाया है कि वे गाय के नाम पर इंसान की हत्या कर रहे है। भाकपा-माले दंगा, लूट और नफरत की राजनीति करने वालों को कोई छूट नहीं दे सकती। मोदी सरकार कंपनियों और आरएसएस की कठपुतली है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असुरक्षा के लिए यह सरकार जिम्मेवार तो है ही, यह निरंतर दलितों-अकलियतों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की साजिश कर रही है। इन साजिशों और जनता के जीने के अधिकार पर हमले का मुंहतोड़ जवाब भाकपा-माले देगी। देश की खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों नीलामी और साम्राज्यवाद की दलाली के कारण भाजपा के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन का माहौल बन रहा है। किसान, मजदूर, श्रमिक, छात्र, लेखक-बुद्धिजीवी सब विरोध में खड़े हो रहे हैं। बिहार में भी इनका विरोध हो रहा है। भाकपा-माले किसी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देगी। 

का. दीपंकर ने महागठबंधन को निशाना बनाते हुए कहा कि पंद्रह साल तक लालू जी की सरकार रही और दस साल तक नीतीश कुमार की, इतने दिनों में इन लोगों ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। क्या ये इतने दिनों में सोन नहर का आधुनिकीकरण नहीं कर सकते थे, क्या बंद नलकूपों को चालू नहीं किया जा सकता था? इन लोगों ने भूमिहीनों को आवास और खेती की जमीन उपलब्ध नहीं कराई। जहां भी जमीन मिली, वह का. रामनरेश राम के संघर्ष के रास्ते के जरिए ही मिली। उन्होंने किसानों और बंटाईदारों के सवालों पर ही संघर्ष से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, जिस लड़ाई को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। वे चाहते थे कि किसान-मजदूर बड़ी एकता बनाकर सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदल दें। जब वे विधायक बने तो उन्होंने 1942 की लड़ाई में शहीद किसानों के लिए स्मारक बनाने का काम किया।

प्रभात खबर 
का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी कहते चलते हैं कि उन्होंने गरीबों को आवाज दी, यह गलत है। सच यह है कि गरीबों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। गरीबों को ताकत देने का काम तो का. रामनरेश राम, जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, बूटन मुसहर समेत भाकपा-माले के कामरेडों ने किया। का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी ने आडवाणी का रथ रोककर भाजपा को रोकने का दावा किया, लेकिन दरअसल उन्होंने माले को रोकने के लिए नरक की ताकतों से हाथ मिलाने का ऐलान किया। वे गरीबों को ऊपर देखने को कहा, लेकिन नीचे जनसंहार होते रहे। उन्होंने देश में टाडा खत्म होने के बावजूद माले नेता शाह चांद को टाडा के तहत जेल में बंद रखा, जहां अंततः पिछले साल उनकी मौत हो गई। उन्होंने बात की सामाजिक न्याय की, लेकिन दलितों, अकलियतों, किसानों-मजदूरों के साथ अन्याय ही किया। नीतीश कुमार ने उसी सिलसिले को आगे बढ़ाया और अमीरदास आयोग को भंग करके भाजपाइयों को बचाने का काम किया। सारे जनसंहारी छोड़ दिए गए। 

का. दीपंकर ने कहा कि नीतीश के शासन में हाल यह है कि आरा कोर्ट में बम विस्फोट करवाने वाला जेल से बाहर आ जा रहा है और बिजली, शिक्षा, सिंचाई के सवाल पर संघर्ष करने वाले मनोज मंजिल को जेल में डाल दिया जाता है। किसानों की धान खरीद और सिंचाई के सवाल पर जुझारू संघर्ष चलाने वाले सतीश यादव की हत्या हो जाती है और लालू-नीतीश की पार्टियां निंदा का बयान तक नहीं देती। 

का. दीपंकर ने कहा कि का. रामनरेश की परंपरा यह है कि चुनाव भी जनता के बुनियादी सवालों से संघर्ष से अलग नहीं है। तरारी और जगदीशपुर से माले के उम्मीदवार किसान आंदोलनों के नेता हैं, संदेश और अगिआंव के माले प्रत्याशी नौजवान सभा के नेता रहे हैं, आरा के माले प्रत्याशी पूर्व छात्र नेता रहे हैं। ये सारे नेता विजयी होंगे तो विधानसभा में किसानों, नौजवानों और छात्रों की आवाज को बुलंद करेंगे। वे का. रामनरेश राम की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। इनकी जीत से बिहार में वास्तविक बदलाव के संघर्ष को मजबूती मिलेगी। बिहार बदलेगा तो देश भी बदलेगा। 
दैनिक जागरण 
इन दोनों सभाओं को संबोधित करते हुए माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद ने कहा कि माले ने जो जनघोषणापत्र जारी किया है, उसे लागू करने के लिए पूरी ताकत लगा दी जाएगी। 

अगिआंव में संकल्प सभा को का. रवि राय और सुदामा प्रसाद ने भी संबोधित किया। संचालन उपेंद्र यादव ने किया। मंच पर शहीद सतीश यादव की पत्नी उषा यादव, का. मनोज मंजिल की पत्नी शीला, मीरा जी, का. स्वदेश भट्टाचार्य, का. रामजी राय, का. कुणाल भी मौजूद थे। 

सहार में का. रामकिशोर राय ने संकल्प सभा का संचालन किया। सभा को सिद्धनाथ राम, कामता प्रसाद सिंह ने संबोधित किया।

राष्ट्रीय सहारा 
आज अगिआंव बाजार में एक संकल्प सभा हुई, जिसे अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव का. अरुण सिंह और माले प्रत्याशी चंद्रदीप सिंह ने संबोधित किया। आरा शहर समेत जिले के कई पंचायतों में का. रामनरेश राम को याद किया गया और उनकी तस्वीरों के साथ जुलूस निकाला गया। 


Monday, September 21, 2015

आरा में ‘एजेंडा 2015 : बिहार में वामपंथी विकल्प’ कन्वेन्शन आयोजित हुआ


प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से 20 सितंबर रेडक्राॅस सभागार, आरा में आयोजित कन्वेंशन ‘एजेंडा 2015: बिहार में वामपंथी विकल्प’ में लेखक, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने भोजपुर जिले के तमाम सीटों से भाकपा-माले के उम्मीदवारों और पूरे शाहाबाद इलाके में वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की।

कवि सुनील चौधरी ने कन्वेंशन के दृष्टि पत्र का पाठ किया। अध्यक्षता रामनिहाल गुंजन, डाॅ. नीरज सिंह, प्रो. रवींद्रनाथ राय और जितेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए जनवादी लेखक संघ, बिहार के अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य में जो सरकारें हैं, उन्होंने जनतंत्र के मायने बदल दिए हैं। जनाधिकारों पर ऐसी खुली चोट पहले कभी नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार भी मोदी की तरह ही तानाशाह हैं। ये छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलर गठबंधन एक-दूसरे को मुकाबले में बता रहे हैं, पर ये दोनों देश को बेचने को तैयार बैठे हैं। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार पिछले पच्चीस साल से एक मकसद और लक्ष्य के साथ सांप्रदायिक आंधी, सामंती उत्पीड़न और कारपोरेटपरस्ती के खिलाफ सृजनरत रहे हैं। आज वामपंथी दल भी एकजुट हुए हैं, जो यथास्थितिवादी और पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्ष के लिहाज से बेहद उम्मीद भरी स्थिति है। आशा की यह किरण जरूर मशाल बनेगी। 

प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अमनपसंद, इंसानियतपसंद लोगों को वामपंथी विकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने जनपक्षधर मीडिया के निर्माण पर भी जोर दिया।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, अगर वो है तो सबके साथ ही। उन्होंने कहा कि आज वामपंथ ही एकमात्र विकल्प है। 

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि वामपंथ ही वह रास्ता है, जिससे इस देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान संभव है। इस चुनाव में वामपंथ के लिए बेहद अच्छी परिस्थिति है।

सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता रामप्रभाव मिश्र ने कहा कि विकल्प जनता के संघर्ष से ही निर्मित होगा।

हिरावल के संयोजक रंगकर्मी-गायक संतोष झा ने कहा कि कन्वेंशन का दृष्टिपत्र बताता है कि लड़ाई सिर्फ चुनाव तक महदूद नहीं है। लेकिन फिलहाल यह जरूरी है कि जिन ताकतों के खिलाफ लड़ना है, उनके खिलाफ प्रचार में उतरा जाए, वामपंथी विकल्प के पक्ष में पूरी ताकत से लगा जाए। महागठबंधन में शामिल दलों का भी शिक्षा और संस्कृति और जनता के बुनियादी मुद्दों के प्रति बहुत खराब रिकार्ड रहा है, भाजपा के रोकने के नाम पर महागठबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सकता। इन दोनों गठबंधनों से मुक्ति के बगैर बिहार का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आरएसएस की गुंडावाहिनियों से आने वाले समय में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और इंसानी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तियों को और भी बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार रहना होगा। 

इंसाफ मंच के जाकिर हुसैन ने कहा कि जो आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, वे आज सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं और ‘देशभक्ति’ का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। लालू बिहार में भाजपा को रोकने का दावा करते रहे, पर उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को बढ़ावा दिया, उनके कंधे पर सवार होकर वह बिहार में आ गई, तो अब उसे भगाने का झांसा जनता को दे रहे हैं। अगर लालू और नीतीश एक नंबर के सेकुलर हैं तो उन्हें जवाब देना होगा कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं दिया। आतंकवाद के नाम पर साईकिल बनाने वाले से लेकर डाॅक्टरी की पढ़ाई करने वाले बेगुनाह नौजवानों को एनआईए ने उठाया, नीतीश ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं कहा कि बिहार में एनआईए की जरूरत नहीं है? 

बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोप गुट के नेता अखिलेश ने कहा कि समान शिक्षा प्रणाली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन सिर्फ वामपंथी दलों ने किया है, शिक्षकों के आंदोलनों को उनका साथ मिला है, इस कारण भी उनका खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। 

आइसा नेता रचना सिंह ने शिक्षा और संस्कृति के सांप्रदायीकरण और निजीकरण की चर्चा की। वीमेंस काॅलेज में लड़कियों से छेड़खानी के बाद भड़के आंदोलन पर बिहार सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि बिहार में शिक्षा और स्त्रियों की आजादी और सुरक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है और इसके लिए नीतीश कुमार की सरकार पूरी तरह जिम्मेवार है। मीडिया द्वारा मोदी और नीतीश के चेहरे को चुनाव के केंद्र बनाने की आलोचना करते हुए प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, स्त्रियों के सम्मान, आजादी और सुरक्षा के लिए उन्होंने वाम दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि पूंजीवाद चकाचौंध पैदा करता है। वह धोखा और तिलिस्म फैलाता है। कारपोरेट हमारे सामने राजनीतिक विकल्प भी फेंकता है। इन्हीं विकल्पों के बीच चुनाव के कारण सरकारों का चरित्र नहीं बदल रहा है। इनके खिलाफ जनता के सही विकल्प के निर्माण में लगी शक्तियों को वैकल्पिक प्रचार तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि अल्पसंख्यकों के नफ्सियात (मनोविज्ञान) को समझना जरूरी है। दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी नफ्सियाती कमजोरियों से फायदा उठाती हैं। पिछले चुनाव में जो दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई और अब जो आवैसी सामने आए हैं, वे दोनों इसी के उदाहरण हैं। 

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के एक फरमान की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो विधायक, मंत्री के खिलाफ बोलने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे लोगों को जनता क्यों चुने? उन्होंने कहा कि वामपंथी विकल्प होने से अब मतदाताओं के सामने नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनने की दुविधा नहीं रहेगी। उन्होंने इस कन्वेंशन के मकसद के प्रति कथाकार शीन हयात के समर्थन का संदेश भी पढ़ा।

प्रो. तुंगनाथ चौधरी ने कहा कि चुनाव के समय जातिवादी-सामंती शक्तियों के पक्ष में होने वाले धु्रवीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस चुनाव में एकजुटता से वामपंथी दलों में नई ऊर्जा का संचार होगा। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि सत्ताधारी पार्टियों के दो मोर्चों के विरुद्ध वाममोर्चा ही असली तीसरा मोर्चा है। 

कन्वेंशन में मौजूद आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार क्यामुद्दीन ने कहा कि भाकपा-माले के नेता-कार्यकर्ता सांप्रदायिकता, अपराध, स्त्रियों के उत्पीड़न, व्यवसायियों की हत्या, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य आदि सवालों पर साल के तीन सौ पैसठों दिन संघर्ष करते रहते हैं। चुनाव में उनकी जीत से विधानसभा के भीतर भी जनता के सवालों पर संघर्ष हो सकेगा। 

जलेस के बालरूप शर्मा, सीपीआई-एम के आरा नगर कमेटी सदस्य वैद्यनाथ पांडेय, कवि केडी सिंह, राजेश राजमणि, कवि संतोष श्रेयांश, अरविंद अनुराग, सतीश कुमार राणा ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। 

कन्वेंशन में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने चुनावी जनगीतों और शायर कुर्बान आतिश ने अपनी गजल को सुनाया।

आशुतोष कुमार पांडेय ने कन्वेंशन का तीन सूत्री प्रस्ताव पढ़ा। पहला प्रस्ताव वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन का था। दूसरा प्रस्ताव एफटीआईआई के छात्रों के आंदोलन के सौ दिन पूरा होने से संबंधित था। उनके आंदोलन के समर्थन में सभागार से बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया था, जिस पर लेखक-संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए। तीसरे प्रस्ताव में आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रगतिशील, विवेकवादी बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले का हर स्तर से प्रतिवाद तेज करने की अपील की गई थी। 

कन्वेंशन में कवि जर्नादन मिश्र, अरुण शीतांश, आदित्य नारायण, रविशंकर सिंह, हरिनाथ राम, मिथिलेश जी, दीनानाथ सिंह, श्रमिक नेता यदुनंदन चौधरी, छात्र नेता अजित कुशवाहा, पत्रकार प्रशांत, शमशाद, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, अमित मेहता, विजय मेहता, रामदास राही, बनवारी राम, रामकुमार नीरज, किशोर कुणाल, संजय कुमार, माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम, राजेंद्र यादव आदि भी मौजूद थे। 








Sunday, January 11, 2015

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर 'संकल्प सभा' का पर्चा


फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति को शिकस्त दो
बेहतर व्यवस्था के लिए संघर्षशील अवाम की एकता कायम करो
इंसाफ, अमन और सामाजिक-आर्थिक बराबरी की जंग तेज करो

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर
संकल्प सभा

13 जनवरी 2015, समय- 12 बजे दिन, स्थान- अबरपुल, आरा


नागरिक बंधुओ,

आज से सात वर्ष पहले अपराधियों ने का. सुफियान की हत्या कर दी थी। अपराधियों और हत्यारों को उन शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण मिलता रहा, जो सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का सिर्फ पाखंड करती हैं,, लेकिन जिन्होंने अपनी जनविरोधी कारगुजारियों के कारण आरा और बिहार ही नहीं, पूरे देश में फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति के लिए आगे बढ़ने की जमीन तैयार की। इसके विपरीत का. सुफियान जमीनी स्तर पर सांप्रदायिकता और अपराध के खिलाफ जुझारू जंग लड़ते रहे। वे ऐसे इंसान थे, जिन्हें हिंदू-मुस्लिम भाईचारा और आम नागरिकों की सुरक्षा की फिक्र थी। तीन-तीन बार आरा शहर में दंगे भड़काने की साजिश की गई, लेकिन का. सुफियान ने हर बार हिंदू-मुस्लिम अवाम की एकजुटता को संभव किया और सड़कों पर उतरकर उन साजिशों को नाकाम किया। 

देश की आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदू-मुस्लिम अवाम ने एक होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उनकी दमनकारी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था, अपने समय में का. सुफियान उसी परंपरा को जीवित रखने वाली इंकलाबी धारा के नुमाइंदे थे। यह बेवजह नहीं था कि रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला की ‘साझी शहादत साझी विरासत’ की चेतना से लोगों को उन्होंने लैस करने की कोशिश की। जिन्होंने इस देश में कभी बुश को बुलाया था और जो अब गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के स्वागत की तैयारियां कर रहे हैं, का. सुफियान उन जैसों के विरोधी थे। उनके भीतर गरीब-मेहनतकश जनता का स्वाभिमान था। जनता के ऐसे ही स्वाभिमान के बल पर किसी राष्ट्र की संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रहती है। का. सुफियान शहीद-ए-आजम भगतसिंह के अनुयायी थे, जिन्होंने जनता की वर्गीय एकजुटता को सांप्रदायिकता और साम्राज्यवादविरोध के लिए जरूरी बताया था। 

का. सुफियान हमेशा आरा में दबे-कुचले-पिछड़े-दलित समुदायों और अकलियतों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों में शामिल रहे। विडंबना यह है कि अकलियतों की खराब जीवन दशा के बारे में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद भी उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के बजाए उनके खिलाफ नफरत की सियासत को तरह-तरह की साजिशों, अफवाहों के जरिए लगातार हवा दी जाती रही है। अमेरिकन साम्राज्यवाद की रणनीति की तर्ज पर अपने देश में भी मुसलमानों की पहचान आतंकवादी के बतौर कायम करने की हरसंभव कोशिश की गई है। बेगुनाह नौजवानों को आतंकवाद के फर्जी मुकदमों में कई-कई वर्षों तक जेल में बंद रखा जाता है, कोर्ट के कैंपस में उनकी हत्याएं की जाती हैं, आरएसएस से जुड़े सांप्रदायिक लोगों द्वारा नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। अभी हाल में गुजरात में आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर जो माॅक ड्रील की गई, उसमें आतंकवादियों की भूमिका करने वालों को मुस्लिम वेशभूषा धारण करवाया गया था। मुसलमानों को बदनाम करने की ऐसी तमाम साजिशों का एक मुकम्मल जवाब हैं का. सुफियान। गरीब-मेहनतकश आम अवाम की इंकलाबी ताकत की पहचान हैं का. सुफियान।

बहुत ही कम उम्र में दर्जी यूनियन के जरिए का. सुफियान ने गरीब-मेहनतकशों के हक-अधिकार की लड़ाई की शुरुआत की थी। जीवनयापन के लिए कई छोटे-मोटे काम करते हुए उन्होंने ताउम्र भाकपा-माले के परचम को थामे रखा। हिंदू राष्ट्र का सपना दिखाकर पूंजीपतियों और कालेधंधे वालों का हित साधने वाले हों या सामाजिक न्याय, सेकुलरिज्म और सुशासन का पाखंड करने वाले, का. सुफियान  ने इन सबका विरोध किया। उन्होंने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की साठगांठ से होने वाली लूट का विरोध किया और जब वार्ड के चुनाव में वे जनप्रतिनिधि के रूप में चुने गए, तो यह दिखाया कि ईमानदारी से किस तरह विकास किया जाता है। 

नागरिक बंधुओ, देश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, केंद्र की मोदी सरकार जनता को विकास और अच्छे दिन का झांसा देकर देश के प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल, किसानों-आदिवासियों की जमीन को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को औने-पौने दामों में बेच रही है, आम जनता जिन खुदरा व्यवसायों या छोटे-मोटे धंधों के जरिए अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करती थी, उनको भी बड़ी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। इसके खिलाफ जनता में बढ़ रहा गुस्सा जबर्दस्त तूफान का रूप न ले ले, इसी मकसद से सरकार ने धर्म-संप्रदाय के नाम पर उन्माद और तनाव फैलाने वालों को खुली छूट दे दी है। बंधुओ, आज हमें सैकड़ो सुफियान की जरूरत है, जो लुटेरों-अपराधियों के चंगुल से अपने देश, शहर और समाज को बाहर निकाल सकें। आइए का. सुफियान के शहादत दिवस पर हम इस जंग को तेज करने और आम अवाम की बहुत बड़ी एकता कायम करने का संकल्प लें। 

निवेदक : भाकपा-माले, आरा नगर कमेटी

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी : चंद्रभूषण

13 जनवरी 2008 को का. सुफियान की शहादत के बाद पत्रकार साथी चंद्रभूषण ने अपने ब्लॉग पहलू पर एक पोस्ट लिखा था. उसके बाद उनके एक दूसरे पोस्ट में भी का. सुफियान का जिक्र आया था. कल उनका आठवां शहादत दिवस है. इस मौके पर चंद्रभूषण की यादों को हम यहाँ साझा कर रहे हैं. चंद्रभूषण ने आरा में भाकपा-माले के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के बतौर काम किया. समकालीन जनमत के संपादक मंडल में रहे.  फ़िलहाल डेढ़ दशक से हिंदी पत्रकारिकता के वे एक सुपरिचित नाम हैं. जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा के बाद आजकल वे नवभारत टाइम्स में कार्यरत हैं.

...एक अनजाने से नंबर से एसएमएस आया- 'अबरपुल के कॉमरेड सुफियान नहीं रहे। अपराधियों ने गोली मार दी।' पलटकर फोन किया तो लगातार इंगेज। ऐन स्कूटर स्टार्ट करते वक्त फोन बजा। उठाया तो पता चला सुनील (सुनील सरीन) हैं- नंबर कुछ और हो गया है। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि सुफियान अपनी दुकान के सामने कैरम खेल रहे थे, तभी नौशाद गैंग के लोगों ने आकर उन पर गोलियों की बारिश कर दी। स्पॉट डेथ हुई।...


मोहम्मद सुफियान भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा में लगभग अपने बचपन से ही सीपीआई-एमएल लिबरेशन के कार्यकर्ता थे। मेरे निजी मित्र तो वे थे ही। आरा में जब पार्टी का काम शुरू हुआ तो दर्जी यूनियन और बक्सा मजदूर यूनियन ही इसका आधार बनी। संयोगवश इन दोनों ही यूनियनों में बहुसंख्या मुस्लिम मजदूरों की थी। सुफियान के पिता खुद भी दर्जी थे, हालांकि उनके पास अपनी दुकान नहीं थे। वे और शहर में काम करने वाले ढेरों अन्य अनपढ़ बाल मजदूरों की तरह उनके अकेले बेटे सुफियान थोक में कपड़ा सिलने वाली एक दुकान पर काम करते थे। आंदोलन बढ़ा तो मजदूरों की कुछ मांगें मानी गईं, लेकिन इसका नेतृत्व कर रहे सारे लोगों को काम से हटा दिया गया।

तब से जीविका के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे धंधे सुफियान ने किए। उनका आखिरी काम एक सैलून खोलने का था, जिसका फीता न जाने क्या सोचकर उन्होंने मुझसे ही कटाया था। उनके सैलून में बाल कटाने वाला पहला व्यक्ति भी मैं ही था।(सैलून के बाद सुफियान ने छोटी सी एक बिस्कुट फैक्ट्री खोली थी.) 
सुनील ने बताया कि इस बार आरा में हुए नगर निगम चुनाव में सुफियान अबरपुल इलाके के वार्ड कमिश्नर चुने गए थे। शायद यह उनका पहला ही चुनाव रहा हो, क्योंकि जबतक मैं आरा में था, तब तक तो यह कल्पना भी करना कठिन था कि सुफियान कभी चुनाव लड़ेंगे। 

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी। वे साथ हों तो किसी से भी भिड़ा जा सकता था- चाहे वह कोई उन्मादी भीड़ हो या अपनी अफसरी के गुमान में फूला कोई पुलिस अफसर। आरा के झोपड़िया स्कूल के सामने गद्दार विधायक श्रीभगवान सिंह का विरोध करते हुए अपने बीस साथियों के साथ मैं और सुफियान भी साथ-साथ जेल गए थे। वहां किसी बात पर झड़प के दौरान जेलर ने सुफियान को घुटना मार दिया था। इसके विरोध में और व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए हम लोगों ने जेल में भूख हड़ताल की, जिसमें जेल के तीन चौथाई से ज्यादा लोग शरीक हुए।

एक बार चुनावी माहौल में अपनी पार्टी का टेंपो डाउन देख मैं दोनों हाथों में अपना सिर थामे बैठा था, तभी सुफियान आए और मुझपर बिल्कुल बरस पड़े। उन्होंने कहा कि ऐसा करके आप बिगड़ी हालत को और बिगाड़ रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हर हालत में भिड़ने, मुकाबला करने की उनकी उस जिद और मस्ती का हाल अभी कैसा था। आखिर अब वे कोई बाल मजदूर नहीं, एक सैलून के मालिक और वार्ड कमिश्नर थे। लेकिन ऐन लोहड़ी की ठंडी रात सुफियान अपनी दुकान के बाहर कैरम खेलते हुए मारे गए, इससे लगता यही है कि बीच के चौदह सालों ने उन्हें भीतर से बहुत ज्यादा नहीं बदला था।

सुफियान को इस तरह याद करना मेरे लिए बहुत अटपटा है। समय की एक चौदह साल मोटी धुंधली दीवार मुझे अपने उस होने से अलगाए हुए है, जिसमें सुफियान और बहुत सारे ऐसे लोग थे, जिनके बिना अपना होना तब नामुमकिन लगता था। यह ध्रुवीय इलाकों में सफर कर रहे अभियान दल के लोगों के बरताव जैसा है, जो अपने पैरों की मर चुकी उंगलियां हथौड़े से तोड़कर आगे बढ़ जाते थे। सुफियान जैसा अपना टूटा हुआ सुन्न अंगूठा हजार मील दूर से निहारते हुए कहीं पहुंचनेकोई मुकाम सर करने जैसी कोई बात अगर अपने जेहन में होती तो लिखना शायद इतना अटपटा नहीं लगता।

...जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि मुसलमानों में धर्म ही सबकुछ है, जाति कुछ नहीं है, उनके लिए एक सूचना कि मेरी जानकारी में सिर्फ अबरपुल मोहल्ले में मुसलमानों की कुल 32 जातियां मौजूद थीं। बीड़ी बनाने वाले अपने एक साथी नन्हक जी की बेटी से हम लोगों ने सुफियान की शादी कराने की कोशिश की थी तो इलाके की दर्जी बिरादरी से आक्रोश के स्वर उभरने लगे- अब दर्जियों के दिन इतने खराब हो गए कि साईं-फकीर की लड़की ब्याह के घर में लाएंगे। इसके कुछ महीने बाद अबरपुल की मस्जिद में सुफियान का निकाह पढ़ाया गया- दोनों तरफ से कबूल है, कबूल है के जैसा कोई फिल्मी मामला नहीं था। दुल्हन घर में ही रही और उसकी तरफ से उसका इकरारनामा उसके बाप ने दिया। इसके अगले साल सुफियान कुछ दिनों तक मेरे साथ जेल में रहे। उनके साथ मेरा अंतिम और परोक्ष संवाद 1995 का है, जब जनमत में लिखे एक जेल संस्मरण पर उन्होंने चिट्ठी भेजकर अपना तीखा एतराज जताया था। मैंने लिखा था कि जेलर ने एक आंदोलन के दौरान सुफियान को घुटना मार दिया था, जिसे पढ़कर इलाके में शायद उनका कुछ मजाक बन गया था। उनका कहना था कि कोई घुटना-वुटना नहीं मारा था, मैंने खामखा अपनी बहादुरी जताने के लिए यह सब लिखा है।...


वे पार्टी के औपचारिक सदस्य न थे, पर हमारे कामरेड थे



जनार्दन प्रसाद जी की स्मृति में शोक सभा 



10 जनवरी 2015 को आरा में जनार्दन प्रसाद जी की स्मृति में भाकपा-माले की ओर से शोक सभा की गई। उनकी स्मृति में एक मिनट का मौन रखकर शोकसभा की शुरुआत की गई। डाॅ. बिजेंद्र बायोलाॅजी क्लासेज, नवादा, आरा में आयोजित इस शोक सभा का संचालन करते हुए का. कृष्णरंजन गुप्ता ने कहा कि जब भाकपा-माले भूमिगत थी, तब जनार्दन चाचा, सत्यप्रकाश चाचा और देवानंद चाचा ने अभिभावक की तरह हम सबको आगे बढ़ाया। जब पुलिस कार्यकर्ताओं को खोजती चलती थी, उस दौर में जर्नादन प्रसाद ने अपने लड़कों को आंदोलन और संघर्ष के रास्ते की ओर जाने दिया। 

सत्यप्रकाश जी का कई वर्ष पहले निधन हुआ। इस 8 जनवरी को जनार्दन प्रसाद भी नहीं रहे। उन्हें याद करते हुए का. देवानंद प्रसाद ने बताया कि अभी एक माह पहले जब वे आरा आये थे तो पार्टी ऑफिस में उनसे मुलाकात हुई थी। उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका गहरा वैचारिक सामंजस्य था। हर सुख-दुख में वे एक साथ रहे। देवघर के अनुकूलचंद्र महाराज से जर्नादन जी का जुड़़ाव था। फिर हम लोग गायित्री परिवार से जुड़े। लेकिन पार्टी से जुड़ने के बाद वह सब छूट गया। वह दौर अभाव और गरीबी का था। पुलिस ने पूरे मुहल्ले को नक्सलियों के मुहल्ले के तौर पर चिह्नित कर रखा था। उन्होंने उनके पुत्र श्रीकांत और अजय के युवानीति के नाटकों में सक्रियता को भी याद किया। 

दैनिक प्रभात खबर 
शोकसभा को संबोधित करते हुए भाकपा-माले के राज्य स्थाई समिति के सदस्य संतोष सहर ने कहा कि जनार्दन चाचा पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं थे, पर आज श्रद्धांजलि हम कामरेड जनार्दन प्रसाद को दे रहे हैं। दरअसल हमारी पार्टी नेताओं की नहीं, नेताओं के पीछे जो लोग, जो जनता है, उनकी पार्टी है, उसी ने पार्टी को बनाया है। बहुत दिनों से वे पटना में श्रीकांत जी के पास रह रहे रहे थे. अभी कलकत्ता में अपने बेटे विनय के पास थे, जहाँ उनका निधन हुआ. अखबारों में छपा कि पत्रकार श्रीकांत और अजय कुमार के पिता जी नहीं रहे। मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी तक ने शोक संदेश दिया। लेकिन जर्नादन चाचा का महत्व कई मायने में श्रीकांत और अजय जी से भी अधिक है। वे कभी अर्जक संघ, अनुकूलचंद्र और गायित्री परिवार से भले ही जुड़े हुए थे, लेकिन उनके सामने जो नए मनुष्य पैदा हो रहे थे, उन्हें वे समझ रहे थे। उनके बेटे पार्टी सदस्य बने। उनका घर हमारे पूर्व राष्ट्रीय महासचिव का. विनोद मिश्र, उस समय के जिला सचिव का. दीना, मेरा और अन्य नेताओं का शेल्टर रहा। 1989 में जब पहली बार एम.पी. के चुनाव में रामेश्वर प्रसाद जीते थे और का. विनोद मिश्र वहां आए थे, तो उस घर में जश्न का माहौल था। 
का. संतोष सहर ने याद किया कि नवादा मुहल्ले के ज्यादातर लोग ऐसे थे, जिन्होंने किसी न किसी रूप में सामाजिक उत्पीड़न का सामना किया था। उसी उत्पीड़न के खिलाफ जगदीश मास्टर, रामनरेश राम और उनके साथियों ने संघर्ष किया था। इस नाते भी उनसे इस मुहल्ले के निवासियों का जुड़ाव स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि रामनरेश राम जब वर्षों बाद चुनाव के जरिए विधानसभा पहुंचे तो वे जनता की ताकत के बतौर ही वहां पहुंचे। मांझी की तरह समझौते उन्होंने नहीं किए। जनता की यह ताकत जरूरी है। आज जबकि सबसे बड़ी खरीद-फरोख्त वाली पार्टी भाजपा की चुनौती हमारे सामने है, तब जनता की उस ताकत को जोड़े रखना ही जर्नादन चाचा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ऐसे लोगों को याद करना हमारे लिए कोई रिचुअल नहीं है। पार्टी ऐसे लोगों को कभी नहीं भूलती है। 

मैंने भी याद किया कि जब जसम की जिम्मेवारी मुझे दी गई थी, तब पहली रचना गोष्ठी हमने उन्हीं के घर की छत पर की थी। बाद में एकाध बार वहां हमने प्रेस कांफ्रेस भी की। देवानंद जी के ही दूकान में शाम में उनसे अक्सर मुलाकात होती थी। उन्हें कभी किसी बात को लेकर उत्तेजित होते मैंने नहीं देखा। जब भी वहां किसी घटना या विचार को लेकर तीखी बहस हो जाती, तो उनकी प्रतिक्रिया काफी संतुलित होती थी। राजनीति के मोर्चे पर काम करने वाले हों या संस्कृति के मोर्चे पर, वे हम सबके अभिभावक की तरह थे। 

दैनिक हिदुस्तान 
कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि पत्रकार श्रीकांत और अजय कुमार से परिचय के बाद अक्सर वे सोचते थे कि उन्हें जरूर कोई आधार मिला होगा, जिसके बल पर वे यहां तक पहुंचे। आज उनके पिता के बारे में सुनते हुए उस आधार के बारे में पता चला। उनके पिता भले ही पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं थे, पर पार्टी के प्रचार-प्रसार में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी। उन्होंने अपने तईं इस समाज को अच्छा बनाने का प्रयत्न किया। जितेंद्र कुमार ने कहा कि आज भाजपा जिस तरह पूंजीपतियों का हित साधने में लगी है उससे गरीबी मिटने वाली नहीं है। इनकी आर्थिक नीतियों का मुकाबला करना ही होगा। जिस लड़ाई के साथ जनार्दन जी थे, उस लड़ाई के साथ और भी बड़े दायरे की जनता का जुड़ना जरूरी है। शोकसभा में माले नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम, वार्ड पार्षद का. गोपाल प्रसाद, का. बालमुकुंद चौधरी, का. राजनाथ राम, एक्टू के का. यदुनंदन चौधरी, का. सुरेश पासवान, का. सत्यदेव, का. दीनानाथ सिंह, का. प्रमोद रजक, का. टुनटुन, अरुण प्रसाद, प्रशांत समेत कई लोग मौजूद थे।