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Wednesday, June 13, 2018

कॉ_अशोक सिंह व दीपिका जी के लिए : संतोष सहर



वे हम सबके साथी हैं - पुराने साथी। अगर आप कभी आरा के पूर्वी रेलवे गुमटी स्थित पार्टी (भाकपा-माले) जिला कार्यालय गये हों तो जरूर ही मुलाकात होगी। मंझोले कद के, पतली कद-काठी, घनी हल्की काली-सफेद बाल-दाढ़ी वाले। जबसे यह कार्यालय है उसी वक्त से उसके एक प्रमुख स्तम्भ। कॉ. रामनरेश राम 1995 से मृत्युपर्यन्त (अक्टूबर 2010) तक सहार क्षेत्र के विधायक रहे और अशोक जी उनके प्रतिनिधि।
इस ऑफिस में हमेशा ही चहल-पहल रहती है। कई-कई तरह की गतिविधि। कहते हैं न कि आदमी पगला जाये, वैसी। एक बार किसी गांव से एक फोन आया। अशोक जी उस वक्त कहीं व्यस्त थे। फोन मैंने उठाया, पूछा -कहिये साथी क्या बात है? वे कोई किसान थे। बोले - मेरी भैंस कल शाम से गायब हैँ। अभी तक कुछ पता नहीं चला। उन्हें खोजने में पार्टी की मदद चाहिए, सो, अशोक जी से बात करनी है। उनकी भैंस शाम तक मिल भी गयी जो भटक कर बगल के गांव में अपने ही रिश्तेदार के 'नाद' पर थी।

पिता की छांव से बुआ की गोद में

साल 1952 में चरपोखरी प्रखंड के कनई गांव में उनका जन्म हुआ। पिता रामनारायण राय जिन्हें 'कलक्टर राय' भी कहते थे और मां सोनझारी देवी की दूसरी संतान ठहरे। एक बहन बड़ी, दो भाई, दो बहनें छोटी। बचपन में ही 'अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन' का जादू चल गया सो पिता कांग्रेसी हो गये। कांग्रेसी पिता ने ही सबसे प्रेम का पाठ पढ़ाया। स्कूल की पढ़ाई बगल के हँसवाडीह गांव से की। फुआ रूपझारो देवी से कुछ ज्यादा लगाव था। उनके पति जो सप्लाई के इंस्पेक्टर थे, दूसरी शादी कर अलग रहने लगे थे। आरा के पश्चिम टोला में अपने घर में वे अकेली पड़ गयी थीं। उनकी देखरेख और आगे की पढ़ाई के लिये अशोक जी को आरा आना पड़ा। जिला स्कूल से मैट्रिक और महाराजा कॉलेज बीएससी तक की पढ़ाई पूरी हुई।

दूर देश की कथा

1952 में ही चरपोखरी के कनई गांव से सैकड़ो मील दूर अवस्थित बांग्लादेश के एक छोटे से गांव में रह रहा एक परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। मनोरंजन भट्टाचार्य जिन्होंने अभी-अभी अपना घर बसाया था और जिनके पूर्वज बरसों से उस गांव में रह रहे थे, आधी रात के अंधेरे में अपनी नवोढ़ा पत्नी के साथ गांव छोड़ने को विवश हुये। बांग्ला देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में धू-धू कर जल रहा था। बांग्लादेश की सीमा पार कर लेने के बाद भी, भय इस कदर हावी था कि वे मीलों दूर दंगारह रहे मनोरंजन भट्टाचार्य अपनी पत्नी के साथ 
डेहरी ऑन सोन में पिछले कुछ वर्षों से रह रहे और वहां के सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके 'सेन मेडिकल' के मालिक ने उन्हें शरण दी। मनोरंजन भट्टाचार्य ने एलएमपी की डिग्री हासिल की, मेडिकल प्रैक्टिशनर बन गये और आसपास के दर्जनों गांवों में घूम-घूम कर लोगों का ईलाज करने लगे। किसान लोगों के बीच बंगाली डॉक्टर बाबू 'ईश्वर का अवतार' साबित हुए। धनहरा गांव के लोगों ने पहले तो उन्हें गांव में ही डिस्पेंसरी खोलने को राजी किया और फिर एक बना-बनाया पुराना मकान खरीदवा कर वहीं पर बस जाने के लिये मना लिया।

दीपिका के उजाले से रौशन हुई दुनिया

सात बच्चों - छह बेटियां व एक बेटा - सात बच्चों के साथ परिवार इस नई जमीन पर भी मजबूती से जम गया। मनोरंजन भट्टाचार्य और रामनारायण राय के बीच पहले जान-पहचान बनी जो चलते-चलते गाढ़ी दोस्ती में बदल गयी। वे अपनी दो बड़ी बेटियों की शादी कर चुके थे। उनसे छोटी दो - दीपिका और नीलिमा ने भी हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी। अब आगे की पढ़ाई के लिये उन्हें आरा आना था। मित्र रामनारायण ने मनोरंजन की परेशानी दूर करने की खातिर आरा के डीन्स टैंक (नवादा मुहल्ला) के पास एक किराये का घर खोज दिया। बच्चियां को गांव-घर-परिवार से अलग, दूर आरा शहर में रहना था, सो मित्र रामनारायण ने बेटे अशोक को हिदायत दी कि वे उनकी देखरेख करें - पढ़ाई-लिखाई व खाने-रहने की जरूरतों का ख़याल रखते हुए रेगुलर वहां आया-जाया करें।
कॉ. अशोक बताते हैं - "मैं अक्सर घूमते-टहलते उनके यहां चला जाता। दीपिका तब महिला कॉलेज में इंटरमीडिएट की छात्र थीं। इसी आने-जाने के दौरान न जाने कब एक लगाव-सा पैदा हो गया। मैं अच्छे स्वभाव का मन जाता था। पढ़ने में भी रुचि रखता था और बीएससी कर रहा था। सभी बहनों, भाई और मां-पिता को भी मैं खूब भाता था। लेकिन, मेरे मन में एक नैतिक हिचक भी थी। यह परिवार अपने गांव-घर से विस्थापित होकर, हजार कष्टों को झेलते हुए, फिर से इस सामाजिक-आर्थिक हैसियत में पहुंचा था। मेरे जरिये आगे का कोई कदम उठाना फिर से उन्हें एक नई तबाही में न डाल दे। मेरा मन बीच मंझधार पड़ी नाव की तरह डांवाडोल था।"
"लेकिन, इस बीच दीपिका और मेरे बीच - एक दूसरे के प्रति - लगाव बढ़ता ही चला गया। हम प्रेम में पड़ गये। जी हाँ, अब हम एक दूसरे के बगैर नहीं रह नही सकते थे।"

दश्त मिलता है मियां इश्क़ में घर से पहले

"इन्हीं दिनों दीपिका के घर में उनकी शादी की बातें चलने लगीं। उनकी दो बड़ी बहनों की शादी कोलकाता में भद्र बंगाली परिवारों में हो चुकी थी। उनके लिए भी कई अच्छे परिवारों के सुयोग्य लड़के मिल रहे थे। मैं बीएससी की परीक्षा देने जा रहा था। एडमिट कार्ड आ चुका था। यह 1973 की बात है। मेरे पिता भी मेरी शादी तय करने वाले थे। अब देर करना संभव नहीं था। हम दोनों ने तय किया कि अब हमें शादी करके इसे जग जाहिर कर देना चाहिये। सो हम कोर्ट पहुंचे और एक-दूसरे का पति-पत्नी होने का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया।"
"दीपिका जी के पिता, माँ, बहन-भाई हमारी शादी के पक्ष में थे। लेकिन, मेरे पिता, चाचा और गांव-समाज इसके खिलाफ उबल उठा। मेरे पिता हम दोनों को तरह-तरह से डराने लगे, जिसमें दोनों को जान से मार-मरवा देने की बात भी शामिल थी। संपत्ति से बेदखली और घर-बदर तो आम बात थी।"
"जब प्यार किया तो डरना क्या? फ़िल्म मुगले आज़म का यह गाना अब भी सबकी जुबान पर रहता था। लेकिन हमारी कहानी कुछ और रही। 'अनारकली' अपने पिता के घर धनहरा चली गयी और 'सलीम' ने मायानगरी मुंबई की राह ली - बागी तेवर लिये हुए, रोजगार की तलाश में।"

बहना! ओ बहना!

"बम्बई (मुंबई) में मेरी बड़ी बहन रहती थी। उनके पति वहां सेल टैक्स अधिकारी थे। मैं उसका शरणागत हुआ। मैं किसी और जगह कहाँ जा सकता था? बहन और बहनोई ने मेरा पूरा साथ दिया, ताकत दी और अपने प्रभाव से मुझे फायरस्टोन टायर कम्पनी में अप्रेंटिशशिप की नौकरी भी दिलवा दी। उन्होंने पिता पर भी दबाव बनाया जब तक वे नाराज रहे , मैं वहां रहा। लेकिन, मन बेचैन ही रहा। हां, इस बीच कुछ कमाई हो गयी। पिता ने दीपिका को अपनी बहू मान लिया। नैहर में रह रही मेरी पत्नी के लिए दशहरा के मौके पर साड़ी-कपड़े व फल-मिठाई भेजे। उसके कुछ दिनों बाद ही मैं मुम्बई से गांव-घर लौटा।"

पिता! हे पिता!

"मुझसे छोटी मेरी दो बहनें थी। अब, जब उनकी शादी करने का मौका आया तो अड़चनें खड़ी हो गयीं। मेरे पिता ने हमारी शादी को मान लिया। उन्होंने 22 मई 1974 को समारोहपूर्वक हमारी शादी का भोज भी आयोजित किया, लेकिन वे चिंतित रहने लगे। मैं अपने परिवार से विलग दिखूँ और मेरी बहनों की शादी में मेरा विवाह मुद्दा न बने, इसलिए मुझे अपने पिता से किसी भी तरह से सम्पर्क न रखना एक शर्त्त बन गया। 22 मई 1974 को जो शादी समारोह हुआ, वह भी उनकी गैर मौजूदगी में ही हुआ। उनके जिगरी दोस्त रामसूरत राय (राय मोटर सर्विस के मालिक) ने 'समधी' का रोल निभाया। में अब भी घर की संपत्ति से वंचित था।"

"हम नया क़रीना सीख गये"

"मुंबई से जो कुछ भी कमाया था, वह खत्म होने लगा था। 1975 में मेरा पहला बच्चा भी इस दुनिया में आ चुका था। मेरी माली हालत डांवाडोल थी। एक दिन पता चला कि मेरे पास महज 500 रुपये बच रहे। घर में युवा पत्नी और एक मासूम नन्ही जान।"/
"मैंने इन्हीं 500 रुपयों से एक धंधा शुरू किया - कबाड़ी का काम। दो मजदूर भी रख लिये। हम तीनों घर-घर घूमते हुए कबाड़ जुटाने लगे। राजेंद्रनगर मुहल्ले में एक सस्ता-सा मकान - दो कमरे, एक छोटा-सा आंगन किराये पर मिल गया। पत्नी-बच्चा साथ रहने लगे। दीपिका टीचर की ट्रेनिंग करने लगीं। 1977 तक मैं 'कबाड़ीवाला' बना रहा। इस बीच मेरे दूसरे बेटे ने जन्म लिया।"
"रामसूरत राय मेरे साथ बड़े ही उदार थे। वे हर वक्त मुझ पर निगाह रखते थे। देर-सबेर जब उनको मेरी हालत की खबर मिली तो खबर भेज मिलने को बुलाया। अगले ही दिन सुबह मैं उनसे मिलने पहुंचा। उन्होंने पहले तो मुझे इतने दिनों तक दूर-दूर रहने के लिये फटकार लगायी। फिर आरा और सहार के बीच चल रही अपनी बस के मैनेजर की नौकरी दे दी। महीने में तीन सौ रुपये का वेतन और बाद में मेरी ईमानदारी व मेहनत देख हर रोज 5 रुपये और। इस नौकरी से जब तीन हजार रुपये मेरे पास जमा हो गये तो मैंने उनसे कहकर यह नौकरी छोड़ दी।"
"1980-88 के बीच मैंने कई तरह के काम किये। एक दोस्त के पिता जो नहर विभाग में कार्यपालक अभियंता बनकर आये के कहने पर कुछ दिनों ठेकेदारी भी की। कारीसाथ में आये एक बौद्ध भिक्षुक से प्रभावित होकर उनके मठ के सचिव के रूप में भी काम किया। 1988 में दीपिका जी को शिक्षिका की नौकरी लग गई। 1989 में पिता भी नहीं रहे। बहनें भी शादीशुदा हो अपने परिवार में रम गईं। दोनों भाई बड़े होकर नौकरी में चले गए। उनका परिवार भी बाहर रहने लगा। सो, मैंने आश्रम से छुट्टी ली और गाँव चला गया। आरा आना-जाना पड़ता ही था। मेरा परिवार जो यहीं था।"

गांव जिसके बगल से एक नदी बहती है

"74 के छात्र आंदोलन में मैं अपने दोस्तों के साथ शरीक था। नाथूराम, रमाकांत ठाकुर, पवन आदि सभी मेरे मित्र थे। मैंने आंदोलन की भरपूर मदद की थी। हालांकि कभी जेल नहीं गया। छात्र जीवन में अपने कॉलेज में भी मेरी एक पहचान थी जो एक जाति विशेष की एक निजी सेना के एक चर्चित दबंग को मेरे द्वारा सबक सिखाने की वजह से बनी थी।"
"मेरे गांव के बगल में एक नदी बहती थी। इस नदी पर सिंचाई के लिये लोग एक अस्थायी बांध बनाते थे। सरकार इसे बार-बार कटवा देती थी। गांव जाते ही उन्होंने मिट्टी ढो-ढोकर स्थायी बांध बनाना शुरू कर दिया। लोग भी इस काम में उतरे। भारी तादाद में पुलिस आयी और आते ही गोली चलाने लगी। दो किसान - संजय यादव और एक अन्य मारे गये। इस गोलीकांड की पूरे बिहार में चर्चा फैल गयी। इन किसानों के सवाल पर कोई संघर्ष खड़ा कर सके - वैसी पार्टी या संगठन की तलाश शुरू की। एक पत्रकार मित्र के जरिये आइपीएफ नेताओं से सम्पर्क हुआ। प्रखंड व जिला स्तर पर जोरदार आंदोलन चला। शहीदों का स्मारक भी बना और स्थायी बांध भी। अब बांध काटने कोई नहीं आता।"
इसके बाद कॉ. अशोक पर आइपीएफ व भाकपा-माले का लाल रंग कुछ यूं चढ़ा कि उसी के होकर रह गए।

न टूटे, न झुके : एक अनथक योद्धा

रणवीर सेना के खूनी हमलों के दौर में कॉ. अशोक जी की सक्रियता, दृढ़ता व तेजी की बदौलत हमने जिला प्रशासन व सरकार को कई बार बैकफुट पर धकेलने में कामयाबी पायी। बथानी जनसंहार के बाद डीएम गोरेलाल यादव को हटना पड़ा, एसपी एस के सिंघल को कठघरे में खड़ा होना पड़ा और एक अन्य एसपी आर के मल्लिक को घुटने टेकने पड़े। बौखलाये एएसपी संजय लाटकर (पीरो) ने उन्हें झूठे आरोपों के तहत चोरी-चुपके आरा से गिरफ्तार करने व जेल में डाल देने के जरिये झुका देना चाहा। लेकिन, उस पर किया मुकदमा वापस नहीं हुआ। यह मुकदमा जघन्य पसौर पुलिस गोलीकांड के बाद जिसमें मुसहर जाति के दर्जन भर लोगों की हत्या कर दी गयी थी, उन्होंने कोर्ट में जाकर दर्ज करवाया था।

होठों पे तबस्सुम है, आंखों में उदासी है

"अमित आनन्द 13 जून को पैदा हुआ था, 1975 में। जैन कॉलेज से जब इंटर पास कर गया तो कहने लगा कि अब आगे नहीं पढूंगा, बिजिनेस करूँगा । मुंबई में जो मेरी बहन रहती थी उसका बेटा (मेरा भांजा) भी इसी रे का था। मैंने घर का धान बेचा था। चौदह हजार रुपये लेकर वह गया। साठ हजार रुपये लोन लेकर वहां रेडीमेड कपड़ों का कारोबार शुरू किया। 20 मशीनें थीं और 25-30 लड़कों का पूरा स्टाफ। वर्कशॉप एक मुस्लिम परिवार के मकान में था। उनकी बच्ची भी सेल्स का काम देखती थी। उन दोनों में प्रेम हुआ। बच्ची बहुत ही नेकदिल और समझदार थी। रेहाना नाम था उसका। अपने घरवालों से बोली कि हम अमित से ही शादी करेंगे। घरवालों को राजी भी कर लिया। हमें भी भला क्या ऐतराज होता? बहन की एक बच्ची की शादी एक 'एक्सपर्ट डिजाइनर' से है जो मुस्लिम समुदाय से हैं। सो, हमने अमित और रेहाना की शादी कर दी। वही, मुंबई में। इस बीच उसे बहरीन से एक अच्छा ऑफर मिला था। एक महीने के लिये वहां गया भी।"

दबे पांव आयी दुख की झंझा

"20 जनवरी को अचानक हम पर वज्रपात-सा हुआ। खबर आयी कि अमित मुंबई में किसी लोकल ट्रेन से गिर पड़ा है। उसका सिर बुरीतरह कुचल गया है। हम भागे-भागे वहां पहुंचे। जिस अस्पताल में वह भर्ती था, उसके तमाम सहयोगी वहां जमा थे। सब के सब दुख में निढाल। लेकिन, वह इस दुनिया से जा चुका था।
उसके दोस्तों ने हमें अपनी ओर से कुछ भी नहीं करने दिया। सारा खर्च मिल-जुलकर उठाया। उन्होनें वर्कशॉप को बेच दिया। सारी मशीनों के दाम समेत बाजार में बकाया पैसे वसूल कर हमारे हाथ में रख दिये। लेकिन, अमित जो हमारे प्यार की पहली निशानी था, वहीं छूट गया था।"


"अभिषेक हमारा छोटा बेटा है। उसके दो बच्चे हैं अंतरा आनंद (10 वर्ष) और विश्वरुप (6 वर्ष)। दीपिका जी कुछ साल पहले रिटायर हो चुकी हैं। एक छोटा-सा घर यहां खरीद लिया है। अब उसी में रहना होता है।"
आज भी अगर आप आरा के माले कार्यालय जायें तो कॉ. अशोक जी आपको भेंट जाएंगे। नीम के पेड़ की छांव में कुर्सी पर बैठे। हल्की मुस्कान के साथ आपका स्वागत करते। लेकिन आज उनकी गहरी उदास आंखे किसी को खोज रही होंगी। आज 13 जून जो है। उस अमित आनंद के जन्म का दिन जिसने प्यार की खातिर जिंदगी दांव चढ़ा दी।
समय हर ज़ख्म को भर देता है। लेकिन ऐसे ज़ख्म शायद कभी नहीं भरते। कामरेड, यह लड़ाई जब हम सबकी साझी लड़ाई है तो यह उदासी भी हम सबकी साझी उदासी है। हम सब आपके साथ खड़े हैं।
-संतोष सहर 

Tuesday, November 29, 2016

काॅॅ. जौहर, काॅॅ. निर्मल और काॅ. रतन के शहादत दिवस पर


आज 29 नवंबर है। 1975 में आज ही के दिन भाकपा-माले के दूसरे राष्ट्रीय महासचिव काॅ. सुब्रत दत्त (काॅॅ. जौहर), काॅॅ. डॉ.निर्मल महतो और काॅ. राजेंद्र यादव (काॅ. रतन) भोजपुर में शहीद हुुए थे। आज भोजपुर के गड़हनी (निर्मल नगर) में इन तीनों शहीदों के स्मारक का शिलान्यास किया गया। शिलान्यास भाकपा-माले के वर्तमान महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने किया। इस मौके पर काॅ. रामजतन शर्मा, काॅ. नंदकिशोर प्रसाद, काॅ. अमर,  काॅ. सुदामा प्रसाद समेत कई वरिष्ठ माले नेता मौजूद थे। 
कामरेड सुब्रत दत्त (जौहर)


1946 में कलकत्ता के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे काॅॅ. सुब्रत दत्त का प्रारंभिक स्कूली जीवन दिल्ली में गुजरा था। उनके पिता हिंदुस्तान टाइम्स में कार्यरत थे। बाद में सुब्रत दत्त कलकत्ता वापस आ गए। वहीं साम्राज्यवाद विरोधी, कांग्रेस विरोधी कम्युनिस्ट आंदोलन से उनका जुड़ाव हुआ। भारत-चीन के युद्ध के दौरान शासकवर्ग द्वारा भड़काए गए अंधराष्ट्रवादी लहर का उन्होंने दृढ़तापूर्वक विरोध किया। सही क्रांतिकारी लाइन की तलाश में वे सीपीआई से सीपीआई (एम) में गए, फिर नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद सीपीआई (एम) से भी अलग हो गए। उसके बाद सीपीआई (एमएल) मेें शामिल हुए और अपनी नौकरी छोड़कर पेशेवर क्रांतिकारी बन गए। सर्वप्रथम उन्हें छोटानागपुर के बंगाल-बिहार सीमा क्षेत्र के किसानों को संगठित करने की जिम्मेवारी मिली। जल्द ही वे सीपीआई (एमएल) की बिहार राज्य कमेटी के सदस्य बना दिए गए। सीपीआई (एमएल) के पहले महासचिव काॅॅ. चारु मजुमदार की शहादत और बिहार राज्य कमेटी के लगभग सभी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने पार्टी को नवजीवन प्रदान करने का बीड़ा उठाया। पार्टी के पुनर्गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1974 में भाकपा (माले) की केंद्रीय कमेटी के पुनर्गठन के बाद उन्हें महासचिव चुना गया। काॅॅ. सुब्रत दत्त ने एक ओर जहां भाकपा (माले) को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का हरसंभव प्रयत्न किया, वहीं भोजपुर कें क्रांतिकारी किसान संघर्ष कर रहे साथियों और जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। भोजपुर की धरती पर ही बाबूबांध, सहार में सशस्त्र पुलिस दल के अचानक हमले में उन्होंने शहादत धारण की।

काॅॅ. राजेंद्र यादव (का. रतन) पार्टी के महासचिव काॅॅ. सुब्रत दत्त के संदेशवाहक थे और तत्कालीन भोजपुर आंचलिक कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने का. सुब्रत दत्त को बचाने की कोशिश करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। का. रतन का जन्म 1950 में तत्कालीन भोजपुर जिले के केसठ गांव के एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। केसठ भोजपुर जिले में सी.पी.आई का मास्को कहा जाता था। कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर मौजूद अंतविर्रोधों से संघर्ष के दौरान गांव के मेहनतकश, उत्पीड़ित गरीब लोगों की वास्तविक मुक्ति की आकांक्षा उन्हें नक्सलबाड़ी की राह पर ले गई। जनवरी 1972 में वे किसानों को संगठित करने के काम में लगे। अपने क्रांतिकारी जीवन की छोटी सी अवधि में ही उन्होंने अपने साथियों और जनता का अगाध विश्वास, प्यार और स्नेह हासिल कर लिया था।

(स्रोत- भाकपा-माले द्वारा प्रकाशित दस्तावेजी पुस्तक ‘बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान) 


काॅॅ. निर्मल महतो (काॅॅ. नरेंद्र) जो जुलाई 75 में बहुचर्चित बहुआरा (भोजपुर) की लड़ाई में पुलिस की घेरेबंदी तोड़कर बाहर निकल आए थे, वे भी का. सुब्रत के साथ 29 नवंबर को बाबू बांध, सहार में शहीद हुए थे। 

काॅॅ. निर्मल महतो बिहार के भोजपुर जिले के बड़उरा गांव के निवासी थे। 1948 में एक सामान्य मध्यमवर्गीय किसान परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी छात्र थे। पटना साईंस काॅलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थी। जिसके बाद डाॅक्टरी की पढ़ाई के लिए उनका दाखिला दरभंगा मेडिकल काॅलेज में हुआ था। उन दिनों उच्च अंकों के साथ पास करनेवाले छात्रों का नामांकन सीधे तौर पर मेडिकल काॅलेज में होता था। लेकिन उस जमाने में दरभंगा मेडिकल काॅलेज में दाखिला लेना तथा हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई करना पिछड़े, दलित एवं उपेक्षित वर्ग के छात्रों के लिए सामान्य बात नहीं थी।

काॅलेज प्रशासन से लेकर हाॅस्टल तक वर्णवादी-सामंती वर्चस्व कायम था। निर्मल महतो जैसे छात्रों के लिए ढंग से पढ़ाई की कौन कहें, हाॅस्टल में टिक पाना भी दूभर था। उन्होंने इस दमघोटू माहौल का विरोध करना शुरू किया। अपने मिलनसार स्वभाव के कारण कुछ ही दिनों में वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए तथा छात्रों को संगठित कर मेडिकल काॅलेज और छात्रावास में तत्कालीन व्याप्त वर्णगत भेदभाव और सामंती उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन का बिगूल फूंक दिया। आंदोलन के दरम्यान कई बार उनपर हमले किए गए। फरवरी, 1973 ई. में उन पर जानलेवा हमला किया गया। घायल अवस्था में अस्पताल में भी उनके साथ बदसलूकी की गई तथा सुनियोजित षड्यंत्र के तहत उन्हें जेल में डाल दिया गया। इन झंझावातों से जूझते हुए उन्होंने घोषणा की कि ‘‘पूंजीवादी न्यायालय मुझे न्याय देने में सक्षम नहीं है।’’ उन्होंने महसूस किया कि इस तरह के माहौल को बदलने के लिए पूरी सड़ी-गली सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करना जरूरी है। अपने कैरियर को त्यागकर वे सहार, भोजपुर लौट गए और भाकपा-माले के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन में शामिल हो गए। बहुत जल्द ही वे उस आंदोलन की अगली कतार के योद्धाओं में शुमार किये जाने लगे। 

(स्रोत- ‘समकालीन चुनौती’ पत्रिका)

Tuesday, October 27, 2015

सम्मान-अधिकार के वास्ते, कामरेड रामनरेश राम के रास्ते


गरीबों-मजदूरों-किसानों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारा ही कामरेड रामनरेश राम का संदेश 

कामरेड रामनरेश राम के रास्ते चलकर ही जनता को सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकार हासिल होगा: का. दीपंकर

आरा समेत भोजपुर के कई प्रखंडों और पंचायतों में रामनरेश राम की याद में जुलूस निकला 

सहार में कामरेड दीपंकर जनसभा को संबोधित करते हुए 
(कामरेड रामनरेश राम की पाँचवी बरसी पर भोजपुर में दो विशाल जनसभाएं हुईं। संयोग से यह भोजपुर में चुनाव प्रचार का आखिरी दिन था। परिसीमन के बाद  जदयू संरक्षित एक अपराधी इस इलाके से जीत गया था, पर इस बार वह अपराधी लोजपा में चला गया है। परिसीमन के बाद दो हिस्से में बंट गए सहार विधान सभा के दोनों हिस्सों यानी तरारी और अगिआँव विधान सभा में इस बार माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद और मनोज मंजिल के प्रति जबर्दस्त जनसमर्थन दिख रहा है। इन दोनों जनसभाओं तक किसी चैनल के कैमरे नहीं पहुंचे। खुद लालू जी की सभा इस जनसैलाब के आगे बेहद फीकी थी। अखबार अब भी यहाँ माले को तीसरे नंबर पर दिखा रहे हैं। जबकि सच यह है कि माले यहाँ एक नंबर पर है। पेश है इन दोनों सभाओं में दिये गए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य के भाषण का सार संक्षेप। साथ में अखबारों के कतरन और कुछ फोटो)
नारायणपुर/ सहार/ आरा/ अगिआंव बाजार : 26 अक्टूबर

भोजपुर में क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन के संस्थापक और सहार के पूर्व विधायक का. रामनरेश राम की पांचवी बरसी पर नारायणपुर और सहार में भाकपा-माले ने दो विशाल जनसभाएं की, जिनको संबोधित करते हुए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि भोजपुर में गरीबों और किसान-मजदूरों की राजनीतिक दावेदारी और सामाजिक बदलाव लाने का काम का. रामनरेश राम ने किया। उन्होंने इन ताकतों की एकता और सांप्रदायिक भाईचारे का जो संदेश दिया, उसी रास्ते से ही देश खुशहाली की ओर बढ़ेगा।

नारायणपुर की सभा में कामरेड दीपंकर 
का. दीपंकर ने कहा कि एक ओर भाजपा है खेती की जमीन हड़पने और खेती को चौपट करने की नीति पर अमल कर रही है और उनका कृषि मंत्री आत्महत्या करने वाले किसानों का अपमान करता है, तो दूसरी ओर भाकपा-माले है, जो किसानों के खेतों में पानी, फसल की खरीद, डीजल, बीज, खाद अनुदान के लिए संघर्ष कर रही है। एक ओर आरएसएस-भाजपा की ओर से आरक्षण खत्म करने की बात की जाती है और उनका एक मंत्री जलाकर मार दिए गए दलित बच्चों की तुलना कुत्ते से करता है, जैसा कि खुद मोदी ने गुजरात जनसंहार के मृतकों की तुलना दुर्घटना में मारे गए पिल्ले से की थी, वहीं दूसरी ओर भाकपा-माले है, जिसने का. रामनरेश राम के नेतृत्व में दलितों-अकलियतों, गरीबों, महिलाओं के मान-सम्मान और बराबरी के अधिकार की लंबी लड़ाई लड़ी है। 
का. दीपंकर ने कहा कि देश में एक बड़बोला नेता प्रधानमंत्री बन गया है, परिवर्तन के नाम पर उसने गरीबों, किसानों, नौजवानों- सबको धोखा दिया है। खाद्य सुरक्षा, मनरेगा, शिक्षा में कटौती कर दी गई और पूरा बजट पूंजीपतियों के लिए खोल दिया गया। सरकार बनने के बाद मोदी ने देशी-विदेशी कंपनियों के लिए किसानों की जमीन छीनने का फरमान जारी किया, जिसे पूरे देश में किसानों और वामपंथी ताकतों ने खारिज करने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा कि भाजपा-आरएसएस देश के सांप्रदायिक एकता को तोड़ रहे है। उन्होंने यही परिवर्तन लाया है कि वे गाय के नाम पर इंसान की हत्या कर रहे है। भाकपा-माले दंगा, लूट और नफरत की राजनीति करने वालों को कोई छूट नहीं दे सकती। मोदी सरकार कंपनियों और आरएसएस की कठपुतली है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असुरक्षा के लिए यह सरकार जिम्मेवार तो है ही, यह निरंतर दलितों-अकलियतों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की साजिश कर रही है। इन साजिशों और जनता के जीने के अधिकार पर हमले का मुंहतोड़ जवाब भाकपा-माले देगी। देश की खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों नीलामी और साम्राज्यवाद की दलाली के कारण भाजपा के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन का माहौल बन रहा है। किसान, मजदूर, श्रमिक, छात्र, लेखक-बुद्धिजीवी सब विरोध में खड़े हो रहे हैं। बिहार में भी इनका विरोध हो रहा है। भाकपा-माले किसी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देगी। 

का. दीपंकर ने महागठबंधन को निशाना बनाते हुए कहा कि पंद्रह साल तक लालू जी की सरकार रही और दस साल तक नीतीश कुमार की, इतने दिनों में इन लोगों ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। क्या ये इतने दिनों में सोन नहर का आधुनिकीकरण नहीं कर सकते थे, क्या बंद नलकूपों को चालू नहीं किया जा सकता था? इन लोगों ने भूमिहीनों को आवास और खेती की जमीन उपलब्ध नहीं कराई। जहां भी जमीन मिली, वह का. रामनरेश राम के संघर्ष के रास्ते के जरिए ही मिली। उन्होंने किसानों और बंटाईदारों के सवालों पर ही संघर्ष से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, जिस लड़ाई को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। वे चाहते थे कि किसान-मजदूर बड़ी एकता बनाकर सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदल दें। जब वे विधायक बने तो उन्होंने 1942 की लड़ाई में शहीद किसानों के लिए स्मारक बनाने का काम किया।

प्रभात खबर 
का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी कहते चलते हैं कि उन्होंने गरीबों को आवाज दी, यह गलत है। सच यह है कि गरीबों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। गरीबों को ताकत देने का काम तो का. रामनरेश राम, जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, बूटन मुसहर समेत भाकपा-माले के कामरेडों ने किया। का. दीपंकर ने कहा कि लालू जी ने आडवाणी का रथ रोककर भाजपा को रोकने का दावा किया, लेकिन दरअसल उन्होंने माले को रोकने के लिए नरक की ताकतों से हाथ मिलाने का ऐलान किया। वे गरीबों को ऊपर देखने को कहा, लेकिन नीचे जनसंहार होते रहे। उन्होंने देश में टाडा खत्म होने के बावजूद माले नेता शाह चांद को टाडा के तहत जेल में बंद रखा, जहां अंततः पिछले साल उनकी मौत हो गई। उन्होंने बात की सामाजिक न्याय की, लेकिन दलितों, अकलियतों, किसानों-मजदूरों के साथ अन्याय ही किया। नीतीश कुमार ने उसी सिलसिले को आगे बढ़ाया और अमीरदास आयोग को भंग करके भाजपाइयों को बचाने का काम किया। सारे जनसंहारी छोड़ दिए गए। 

का. दीपंकर ने कहा कि नीतीश के शासन में हाल यह है कि आरा कोर्ट में बम विस्फोट करवाने वाला जेल से बाहर आ जा रहा है और बिजली, शिक्षा, सिंचाई के सवाल पर संघर्ष करने वाले मनोज मंजिल को जेल में डाल दिया जाता है। किसानों की धान खरीद और सिंचाई के सवाल पर जुझारू संघर्ष चलाने वाले सतीश यादव की हत्या हो जाती है और लालू-नीतीश की पार्टियां निंदा का बयान तक नहीं देती। 

का. दीपंकर ने कहा कि का. रामनरेश की परंपरा यह है कि चुनाव भी जनता के बुनियादी सवालों से संघर्ष से अलग नहीं है। तरारी और जगदीशपुर से माले के उम्मीदवार किसान आंदोलनों के नेता हैं, संदेश और अगिआंव के माले प्रत्याशी नौजवान सभा के नेता रहे हैं, आरा के माले प्रत्याशी पूर्व छात्र नेता रहे हैं। ये सारे नेता विजयी होंगे तो विधानसभा में किसानों, नौजवानों और छात्रों की आवाज को बुलंद करेंगे। वे का. रामनरेश राम की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। इनकी जीत से बिहार में वास्तविक बदलाव के संघर्ष को मजबूती मिलेगी। बिहार बदलेगा तो देश भी बदलेगा। 
दैनिक जागरण 
इन दोनों सभाओं को संबोधित करते हुए माले प्रत्याशी सुदामा प्रसाद ने कहा कि माले ने जो जनघोषणापत्र जारी किया है, उसे लागू करने के लिए पूरी ताकत लगा दी जाएगी। 

अगिआंव में संकल्प सभा को का. रवि राय और सुदामा प्रसाद ने भी संबोधित किया। संचालन उपेंद्र यादव ने किया। मंच पर शहीद सतीश यादव की पत्नी उषा यादव, का. मनोज मंजिल की पत्नी शीला, मीरा जी, का. स्वदेश भट्टाचार्य, का. रामजी राय, का. कुणाल भी मौजूद थे। 

सहार में का. रामकिशोर राय ने संकल्प सभा का संचालन किया। सभा को सिद्धनाथ राम, कामता प्रसाद सिंह ने संबोधित किया।

राष्ट्रीय सहारा 
आज अगिआंव बाजार में एक संकल्प सभा हुई, जिसे अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव का. अरुण सिंह और माले प्रत्याशी चंद्रदीप सिंह ने संबोधित किया। आरा शहर समेत जिले के कई पंचायतों में का. रामनरेश राम को याद किया गया और उनकी तस्वीरों के साथ जुलूस निकाला गया। 


Sunday, October 25, 2015

भारतीय क्रांति के नायक का. रामनरेश राम

(जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने 2010 में कामरेड रामनरेश राम की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद यह श्रद्धांजलि लेख लिखा था। आज कामरेड रामनरेश जी यानी पारस जी की पाँचवी बरसी है। भोजपुर की क्रांतिकारी जनता उन्हें याद कर रही है। इस मौके पर पेश है यह श्रद्धांजलि लेख, जो भारतीय क्रांति में उनकी ऐतिहासिक भूमिका का भी आकलन करता है )


आरा से एकवारी के लिए मोटरसाइकिल, चौपहियों से हजारों साथी का. रामनरेश राम की अंतिम यात्रा का आरंभ कर चुके थे। हर एकाध कि.मि. पर सैकड़ों लोग, शोकार्त्त किन्तु गगनभेदी नारों के साथ काफिले को रोक लेते। आंख भर देखते उनका निश्चल शरीर, जैसे कभी पहले उन्हें नहीं देखा हो। उन्हें फूल चढाते, अच्छी खासी तादाद में लोग सायकिल से लेकर मोटरसाइकिलों तक पर लाल झण्डा बांधे काफिले के साथ हो लेते। बहुत से लोग दौड़ते हुए उस वाहन के नज़दीक पहुंचते जिसपर वे शांत लेटे थे, कि कहीं आखीरी बार देखने से चूक न जाएं- आबाल-वृद्ध, महिलाएं। काफिला चले तो भी कुछ दूर तक, अनेक लोग दौड़ते चलते सामर्थ्य भर। याद आने लगे ऐसे ही दृश्य जब कामरेड वी.एम. की अंतिम यात्रा लेकर साथी चले थे, बनारस से आरा। इसी तरह भभुआ से आरा तक हर कुछ कि.मी. पर रुकते, रुद्ध-कंठ से नारे लगते, काफिले के साथ सामर्थ्य भर दौड़ते लोग। आरा से एकवारी तक अनेक जगह लोगों ने यात्रा पहुंचने की तैयारी में जनसभाएं शुरू कर रखी थीं। 

पारस जी ने गोरेे अंग्रेजों से लडते हुए अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। बाद को काले अंग्रेजों से अनथक संघर्ष करते उनका जीवन जारी रहा अंत तक। लगता है जैसे उन्हें लंबा जीवन मिला ही इसलिए कि किसी एक व्यक्ति के जीवन में हमारी क्रांतिकारी धारा की पूरी आनुवांशिकी, उसका प्रचण्ड शौर्य और अपार धैर्य, धक्कों के गहन शोक और बार-बार पुनर्नवा शक्ति की अविराम साधना, प्रतिरोध का सौंदर्य और उत्सर्ग का संगीत खुद को झलका सकें। बेशक, यह लंबा जीवन उन्होंने मौत से आंखें मिलाकर, उससे पंजा लडाकर जनता के लिए हासिल किया था. वह उन्हें सेंत में नहीं मिला था।

1857 के राष्ट्रीय विद्रोह से लेकर नक्सलबाड़ी की विरासत की जन-चेतना के अखंड प्रवाह का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है शाहाबाद की धरती और उसका प्रतिनिधि आख्यान है रामनरेश राम का जीवन-चरित्र। पारस जी का जीवन जनता के क्रांतिकारी आंदोलन की व्यापकता और गहराई, दोनों को प्रतीकित करता है। व्यापकता सिर्फ वर्तमान के भौगोलिक विस्तार में ही नहीं होती, वह विरासत के ऐतिहासिक काल-विस्तार में भी होती है. जो लोग महज पहले अर्थ में व्यापकता को देखते हैं, वे चाहते हैं कि हम अपने इतिहास को, अपनी पहचान को भूल जाएं। वे गहराई से काटकर व्यापकता को देखते हैं, इसलिए अधूरा और असंगत देखते हैं। सिर्फ पत्तियां गिनते हैं, जड की गहराई और तने की मुटाई नहीं देखते जहां से पत्तियों को भी जीवन-द्रव्य आता है। पारस जी का जीवन अपना इतिहास और अपनी पहचान भूलने के विरुद्ध, उससे विश्वासघात के विरुद्ध, एक विराट संदेश है। देश के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में भोजपुर इस बात की भी मिसाल रहा कि कैसे जातिगत-वर्णगत शोषण का अंत भी वर्ग-संघर्ष के रास्ते ही संभव है, जब तक कृषि-क्रांति की धुरी पर आधारित भारत की जनवादी क्रांति का रास्ता न अपनाया जाएगा, भूमि-संबंध आमूलचूल नही बदले जाएंगे, तब तक छुआछूत और भयानक जातिगत और लैंगिक असमानता के खात्मे, वर्ण-व्यवस्था के खात्मे की लडाई भी नहीं हो पाएगी। आज से चार दशक पहले ही कामरेड रामनरेश राम और उनके साथियों के नेतृत्व में भोजपुर की जनता ने इस रास्ते को अंगीकार किया था। सामंती, जातिगत शोषण से निचली समझी जानेवाली जातियों की मुक्ति उन जातियों से आनेवाले मुट्ठी भर नवधनिक और दबंग प्रतिनिधियों द्वारा ज़मींदार-पूंजीपति राजसत्ता का हिस्सा बन जाने से नहीं हो सकेगी। कामरेड रामनरेश राम के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने यह बारंबार साबित किया कि ज़मीन, मज़दूरी और सामाजिक मान-सम्मान एक ही समेकित लडाई है, अलग-अलग नहीं। का. रामनरेश राम का राजनीतिक जीवन इस बात की भी मिसाल है कि क्रांतिकारी विपक्ष का निर्माण संसदीय और कानूनी निकायों में भी जन-आंदोलनों और वर्ग-संघर्ष के बूते ही होता है, अलग से नहीं, कि क्रांतिकारी विपक्ष मात्रा संसदीय दायरे की चीज नही है। 

जब सोन किनारे की अंतिम संकल्प सभा में महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने मंच से कहा कि, ‘सत्तर के दशक में जिन नेताओं को हमने खोया, उन्हें इस तरह से विदाई नहीं दे पाए थे', तो वहां हजारों की तादाद में जुटे लोगों में बहुतों की ही आंखें बरबस ही भर आई थीं। धीरे-धीरे सूर्य भी आकाश से विदा ले रहा था, सोन की रेती पर हजारों मेहनतकश पांव अपने निशान बना रहे थे, कंधें पर सैकड़ों गमछे कल, आज और कल के आंसुओं और पसीने का सोख्ता बने लहरा रहे थे, सैकड़ों लाल झंडे बल्लियों और लाठियों पर गर्व से सर उठाए आगे की चुनौतियों से निबटने की तैयारी का उद्घोष कर रहे थे। न जाने कितनी मां-बहनें भी परंपरा को धता बताते हुए रेती में उतर पडी थीं। आखिर ये और किसी की नहीं उनके नायक, भारतीय क्रांति के नायक का. रामनरेश राम की अंतिम विदा की घड़ी थी।

Monday, September 21, 2015

आरा में ‘एजेंडा 2015 : बिहार में वामपंथी विकल्प’ कन्वेन्शन आयोजित हुआ


प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से 20 सितंबर रेडक्राॅस सभागार, आरा में आयोजित कन्वेंशन ‘एजेंडा 2015: बिहार में वामपंथी विकल्प’ में लेखक, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने भोजपुर जिले के तमाम सीटों से भाकपा-माले के उम्मीदवारों और पूरे शाहाबाद इलाके में वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की।

कवि सुनील चौधरी ने कन्वेंशन के दृष्टि पत्र का पाठ किया। अध्यक्षता रामनिहाल गुंजन, डाॅ. नीरज सिंह, प्रो. रवींद्रनाथ राय और जितेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए जनवादी लेखक संघ, बिहार के अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य में जो सरकारें हैं, उन्होंने जनतंत्र के मायने बदल दिए हैं। जनाधिकारों पर ऐसी खुली चोट पहले कभी नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार भी मोदी की तरह ही तानाशाह हैं। ये छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलर गठबंधन एक-दूसरे को मुकाबले में बता रहे हैं, पर ये दोनों देश को बेचने को तैयार बैठे हैं। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार पिछले पच्चीस साल से एक मकसद और लक्ष्य के साथ सांप्रदायिक आंधी, सामंती उत्पीड़न और कारपोरेटपरस्ती के खिलाफ सृजनरत रहे हैं। आज वामपंथी दल भी एकजुट हुए हैं, जो यथास्थितिवादी और पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्ष के लिहाज से बेहद उम्मीद भरी स्थिति है। आशा की यह किरण जरूर मशाल बनेगी। 

प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अमनपसंद, इंसानियतपसंद लोगों को वामपंथी विकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने जनपक्षधर मीडिया के निर्माण पर भी जोर दिया।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, अगर वो है तो सबके साथ ही। उन्होंने कहा कि आज वामपंथ ही एकमात्र विकल्प है। 

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि वामपंथ ही वह रास्ता है, जिससे इस देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान संभव है। इस चुनाव में वामपंथ के लिए बेहद अच्छी परिस्थिति है।

सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता रामप्रभाव मिश्र ने कहा कि विकल्प जनता के संघर्ष से ही निर्मित होगा।

हिरावल के संयोजक रंगकर्मी-गायक संतोष झा ने कहा कि कन्वेंशन का दृष्टिपत्र बताता है कि लड़ाई सिर्फ चुनाव तक महदूद नहीं है। लेकिन फिलहाल यह जरूरी है कि जिन ताकतों के खिलाफ लड़ना है, उनके खिलाफ प्रचार में उतरा जाए, वामपंथी विकल्प के पक्ष में पूरी ताकत से लगा जाए। महागठबंधन में शामिल दलों का भी शिक्षा और संस्कृति और जनता के बुनियादी मुद्दों के प्रति बहुत खराब रिकार्ड रहा है, भाजपा के रोकने के नाम पर महागठबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सकता। इन दोनों गठबंधनों से मुक्ति के बगैर बिहार का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आरएसएस की गुंडावाहिनियों से आने वाले समय में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और इंसानी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तियों को और भी बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार रहना होगा। 

इंसाफ मंच के जाकिर हुसैन ने कहा कि जो आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, वे आज सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं और ‘देशभक्ति’ का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। लालू बिहार में भाजपा को रोकने का दावा करते रहे, पर उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को बढ़ावा दिया, उनके कंधे पर सवार होकर वह बिहार में आ गई, तो अब उसे भगाने का झांसा जनता को दे रहे हैं। अगर लालू और नीतीश एक नंबर के सेकुलर हैं तो उन्हें जवाब देना होगा कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं दिया। आतंकवाद के नाम पर साईकिल बनाने वाले से लेकर डाॅक्टरी की पढ़ाई करने वाले बेगुनाह नौजवानों को एनआईए ने उठाया, नीतीश ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं कहा कि बिहार में एनआईए की जरूरत नहीं है? 

बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोप गुट के नेता अखिलेश ने कहा कि समान शिक्षा प्रणाली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन सिर्फ वामपंथी दलों ने किया है, शिक्षकों के आंदोलनों को उनका साथ मिला है, इस कारण भी उनका खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। 

आइसा नेता रचना सिंह ने शिक्षा और संस्कृति के सांप्रदायीकरण और निजीकरण की चर्चा की। वीमेंस काॅलेज में लड़कियों से छेड़खानी के बाद भड़के आंदोलन पर बिहार सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि बिहार में शिक्षा और स्त्रियों की आजादी और सुरक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है और इसके लिए नीतीश कुमार की सरकार पूरी तरह जिम्मेवार है। मीडिया द्वारा मोदी और नीतीश के चेहरे को चुनाव के केंद्र बनाने की आलोचना करते हुए प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, स्त्रियों के सम्मान, आजादी और सुरक्षा के लिए उन्होंने वाम दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि पूंजीवाद चकाचौंध पैदा करता है। वह धोखा और तिलिस्म फैलाता है। कारपोरेट हमारे सामने राजनीतिक विकल्प भी फेंकता है। इन्हीं विकल्पों के बीच चुनाव के कारण सरकारों का चरित्र नहीं बदल रहा है। इनके खिलाफ जनता के सही विकल्प के निर्माण में लगी शक्तियों को वैकल्पिक प्रचार तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि अल्पसंख्यकों के नफ्सियात (मनोविज्ञान) को समझना जरूरी है। दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी नफ्सियाती कमजोरियों से फायदा उठाती हैं। पिछले चुनाव में जो दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई और अब जो आवैसी सामने आए हैं, वे दोनों इसी के उदाहरण हैं। 

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के एक फरमान की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो विधायक, मंत्री के खिलाफ बोलने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे लोगों को जनता क्यों चुने? उन्होंने कहा कि वामपंथी विकल्प होने से अब मतदाताओं के सामने नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनने की दुविधा नहीं रहेगी। उन्होंने इस कन्वेंशन के मकसद के प्रति कथाकार शीन हयात के समर्थन का संदेश भी पढ़ा।

प्रो. तुंगनाथ चौधरी ने कहा कि चुनाव के समय जातिवादी-सामंती शक्तियों के पक्ष में होने वाले धु्रवीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस चुनाव में एकजुटता से वामपंथी दलों में नई ऊर्जा का संचार होगा। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि सत्ताधारी पार्टियों के दो मोर्चों के विरुद्ध वाममोर्चा ही असली तीसरा मोर्चा है। 

कन्वेंशन में मौजूद आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार क्यामुद्दीन ने कहा कि भाकपा-माले के नेता-कार्यकर्ता सांप्रदायिकता, अपराध, स्त्रियों के उत्पीड़न, व्यवसायियों की हत्या, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य आदि सवालों पर साल के तीन सौ पैसठों दिन संघर्ष करते रहते हैं। चुनाव में उनकी जीत से विधानसभा के भीतर भी जनता के सवालों पर संघर्ष हो सकेगा। 

जलेस के बालरूप शर्मा, सीपीआई-एम के आरा नगर कमेटी सदस्य वैद्यनाथ पांडेय, कवि केडी सिंह, राजेश राजमणि, कवि संतोष श्रेयांश, अरविंद अनुराग, सतीश कुमार राणा ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। 

कन्वेंशन में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने चुनावी जनगीतों और शायर कुर्बान आतिश ने अपनी गजल को सुनाया।

आशुतोष कुमार पांडेय ने कन्वेंशन का तीन सूत्री प्रस्ताव पढ़ा। पहला प्रस्ताव वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन का था। दूसरा प्रस्ताव एफटीआईआई के छात्रों के आंदोलन के सौ दिन पूरा होने से संबंधित था। उनके आंदोलन के समर्थन में सभागार से बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया था, जिस पर लेखक-संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए। तीसरे प्रस्ताव में आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रगतिशील, विवेकवादी बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले का हर स्तर से प्रतिवाद तेज करने की अपील की गई थी। 

कन्वेंशन में कवि जर्नादन मिश्र, अरुण शीतांश, आदित्य नारायण, रविशंकर सिंह, हरिनाथ राम, मिथिलेश जी, दीनानाथ सिंह, श्रमिक नेता यदुनंदन चौधरी, छात्र नेता अजित कुशवाहा, पत्रकार प्रशांत, शमशाद, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, अमित मेहता, विजय मेहता, रामदास राही, बनवारी राम, रामकुमार नीरज, किशोर कुणाल, संजय कुमार, माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम, राजेंद्र यादव आदि भी मौजूद थे। 








Thursday, September 17, 2015

लसाढ़ी में शहीद मेला संपन्न



शहीदों ने जिस आजादी के लिए शहादत दी, उसके लिए आज भी लड़ाई जारी है


स्वाधीनता आंदोलन से गद्दारी करने वाले आज भारत की जनता और लोकतंत्र से गद्दारी कर रहे हैं

सत्ताधारी गठबंधनों को लसाढ़ी के शहीदों के मूल्यों और सपनों से कुछ लेना-देना नहीं



‘‘लसाढ़ी का शहीद स्मारक किसी पूंजीपति, अपराधी या माफिया के सहयोग से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग और का. रामनरेश राम के विधायक फंड से बना था। 1857 के जनविद्रोह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भोजपुर की सपूतों ने जनप्रतिरोध की जो मिसाल पेश की, रामनरेश राम उसी की कड़ी थे, इसीलिए लसाढ़ी, ढकनी, चासी के जो किसान अंग्रेजों के जुल्म और अन्याय के राज के खिलाफ लड़ते हुए 15 सितंबर 1942 को शहीद हुए थे, उनके इतिहास को सामने लाने का काम उन्होंने ही किया।’’ लसाढ़ी में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य अध्यक्ष राजू यादव ने यह कहा। हर वर्ष की तरह यहां लसाढ़ी के शहीदों की याद में भाकपा-माले द्वारा शहीद मेला का आयोजन किया गया था। 

जबसे यह स्मारक बना है, एकाध वर्ष ही ऐसा रहा होगा, जब इस रोज मैं भोजपुर से बाहर रहा होऊंगा। अक्सर लसाढ़ी के शहीद मेला में मैं पहुंच ही जाता हूं। इस बार आरा पहुंचा, तो सूचना मिली कि चुनाव आचार संहिता और जानबूझकर जटिलता पैदा करके भोजपुर जिला प्रशासन शहीद मेला के आयोजन की स्वीकृति न देने की साजिश रच रहा है। वैसे भी थानों की पुलिस को तो चुनावी आचार संहिता के नियम-कायदों और उसकी बारीकियों से भी कुछ लेना-देना नहीं होता। उनके हाथ तो एक ऐसा हथियार लग जाता है, जिससे वे ग्रामीण इलाके में सत्ताधारी वर्ग की राजनीति के इशारे पर राजनीतिक प्रचार में व्यवधान खड़ा करते हैं। लेकिन साथी अड़ गए थे कि आयोजन की प्रशासनिक स्वीकृति के लिए जो भी नियम कायदा है, उस पर अमल किया गया है, अगर प्रशासन इजाजत न देगा, तब भी शहीद मेला लगेगा, उसको आचार संहिता उल्लंघन का मामला बनाना है, तो बनाए। अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा। 

दरअसल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय भोजपुर में आंदोलनात्मक गतिविधियां बहुत तेज थीं, आंदोलन के दमन के लिए ही 15 सितंबर को ब्रिटिश सेना के बलूची रेजिमेंट के सैनिकों ने लसाढ़ी पहुंची थी। लसाढ़ी, चासी और ढकनी नामक गांवों के किसान परंपरागत हथियारों के साथ उनका मुकाबला करने चल निकल पड़े थे। इस लड़ाई में 11 किसान और 1 महिला अकली देवी शहीद हुए थे। आजादी के वर्षों बाद तक इन शहीदों की याद किसी को नहीं आई, तो इसलिए भी नहीं आई, क्योंकि आजाद भारत में सरकार पुलिस-फौज के बल पर ही शासन करने की आदी थी। परंपरागत हथियारों के साथ सुविधासंपन्न सत्ताधारी फौज को चुनौती देने वाले इन किसानों के इतिहास पर धूल जमने देना ही उनके हित में था। लेकिन भावना कभी मरती नहीं। 1942 में कुछ ही दूर एकवारी गांव के एक किशोर ने उस फायरिंग की आवाज सुनी थी, जिसमें बहादुर किसान मारे गए थे। वे थे रामनरेश राम। बड़े होकर एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट के बतौर उन्होंने समाज और सत्ता को बदलने के संघर्ष का नेतृत्व किया। सत्तर के सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष के दौरान लसाढ़ी के किसानों के प्रतिरोध की परंपरा को उन्होंने बुलंदियों पर पहुंचाया। जो जनप्रतिनिधि हो वह किसानों और मजदूरों के हित में काम करे, उसकी बर्बादी और दमन के लिए जिम्मेवार व्यवस्था का सहयोगी न बने, इसी सपने के साथ तो 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सहार विधानसभा के लिए चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन सामंती ताकतों को उनकी जीत मंजूर न थी। मुखिया के बतौर अपनी जनपक्षधर कार्यशैली की वजह से वे काफी लोकप्रिय थे। सामंतों ने हार के भय से उनके साथी जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला किया। इसके बाद ही उनके हथियारों का जवाब हथियार से देने के दौर की शुरुआत हुई। सामंती आधारों पर टिकी सरकारों और उनके पुलिस-फौज ने 1942 के किसानों की तरह ही जगदीश मास्टर, रामेश्वर अहीर, बूटन राम समेत कई नेतृत्वकारियों की हत्या करके सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की इस लड़ाई को कुचल देने का सपना देखा। लेकिन भूमिगत रामनरेश राम ने सामाजिक बदलाव और राजनीतिक दावेदारी की लड़ाई को जारी रखा। 28 वर्षों बाद गरीब-मेहनतकश जनता के प्रतिनिधि के रूप में वे बिहार विधानसभा में दाखिल हुए। विधायक के तौर पर उन्होंने 1942 में लसाढ़ी में शहीद हुए किसानों का स्मारक बनाने का निर्णय लिया। सत्ताधारी राजद के लोग कटाछ करते रहे कि रामनरेश राम ‘गोईंठा में घी सुखा रहे हैं’, लेकिन रामनरेश राम इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट थे कि वे वर्तमान और भविष्य की लड़ाइयों के लिए एक प्रेरणा स्थल का निर्माण कर रहे हैं। 

पिछले कुछ सालों से जिला प्रशासन भी भारी लाव-लश्कर के साथ इन शहीदों के स्मारक पर फूल माला चढ़ाने पहुंचता है। सरकार के मंत्री भी होते हैं और तमाम सत्ताधारी दलों के छोटे-बड़े नेता भी। लेकिन वे सिर्फ रस्म अदायगी के लिए पहुंचते हैं और प्रायः इस मौके पर ग्रामीणों द्वारा किसी मुद्दे से संबंधित मांग से बचने या हवाई वादे करके जल्दी खिसकने के चक्कर में रहते हैं। स्मारक निर्माण में का. रामनरेश राम की भूमिका को भूले से भी याद नहीं किया जाता, लेकिन का. रामनरेश राम ने शहीद मेला आयोजित करने की जिस परंपरा की शुरुआत की थी, वह जारी है और उसमें हर साल सामयिक राजनीतिक-सामाजिक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा होती है। इस साल भी शहीद मेला में भाकपा-माले ने संकल्प सभा का आयोजन किया। संचालक उपेंद्र यादव ने कहा कि यह आयोजन कोई औपचारिकता नहीं है। शहीदों ने जिस आजादी के लिए शहादत दी, उसके लिए आज भी लड़ाई जारी है। जब तक गरीबों का राज कायम नहीं होता, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। अखिल भारतीय किसान सभा नेता विमल यादव ने कहा कि आजादी के वर्षों बाद किसी को इन शहीदों की सुध नहीं आई थी। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी रामनरेश राम ने इन क्रांतिकारियों की सुध ली। 

स्मारक बनने के बाद यहां हर साल जिले के प्रशासनिक अधिकारी आने लगे हैं, पर उन्हें इन शहीदों की लड़ाई में भला क्यों दिलचस्पी होगी। इस बार तो अधिकारी 15 सितंबर की जगह 15 अगस्त ही रटते रहे। क्या करें बेचारे, स्वाधीनता आंदोलन को इन लोगों के जेहन में 15 अगस्त और 26 जनवरी तक ही सीमित रख दिया गया है। 
अपने देश मे जिस तरह की पार्टियों की सरकारें बन रही हैं, उनकी बेइंसाफी और जनविरोधी रवैये के खिलाफ खड़े होने वाले रीढ़दार अधिकारी भी बहुत कम नजर आते हैं। शासकवर्गीय पार्टियां उन्हें अपने एजेंट के बतौर इस्तेमाल करने की कोशिश करती हैं। चुनावों में तो यह और भी स्पष्ट दिखने लगता है। 

बिहार विधानसभा चुनाव करीब है, जाहिर है इसका असर इस बार वक्ताओं के वक्तव्य में दिखना ही था। मुख्य वक्ता का. राजू यादव ने कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में इस उम्मीद पर जनता ने भाजपा को वोट दिया था कि वह काला धन वापस लाएगी, हर व्यक्ति को पंद्रह लाख रुपये मिलेंगे, महंगाई और भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन यह सब जुमलेबाजी साबित हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा नेताओं का गद्दारी का इतिहास पुराना है। इन लोगों ने स्वाधीनता आंदोलन के साथ गद्दारी किया और आज भारत की जनता और लोकतंत्र के साथ गद्दारी कर रहे हैं। लसाढ़ी, ढकनी, चासी के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत से मुकाबला करने का रिकार्ड है, जबकि भाजपा नेताओं का रिकार्ड अंग्रेजों से माफी मांगने का है। 

राजू यादव ने कहा कि लालू और नीतीश भाजपा के खिलाफ प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि बिहार की जमीन में भाजपा को जड़ जमाने का मौका इन्होंने ही दिया। भाजपा यहां कहीं बाहर से नहीं आई है, बल्कि 1990 के बाद राजद-जद-यू के शासनकाल में सामंती ताकतों के समर्थन से ही उसे जगह मिली। 

माले जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह ने कहा कि लालू-नीतीश ने सामंती ताकतों का मनोबल बढ़ाया, भूमि सुधार और बंटाईदारी से मुकरते रहे। बिहार में भाकपा-माले पिछले पच्चीस वर्षों में लोगों की बुनियादी सुविधाओं, किसान, मजदूरों, नौजवानों की समस्याओं के समाधान और सामाजिक न्याय, बराबरी और तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करती रही। लालू-नीतीश के शासन में आंदोलन के कारण माले नेताओं पर केस किया गया और सामंती ताकतों को तांडव मचाने की छूट दी जाती रही। लालू-नीतीश हमेशा सामंती ताकतों के पक्ष में खड़े रहे। ये भाजपा को जमीनी स्तर पर शिकस्त दे ही नहीं सकते। सच तो यह है कि भाजपा नेतृत्व वाला गठबंधन और महागठबंधन दोनों जनता का भरोसा खो चुके हैं। 

उन्होंने सवाल उठाया कि हाल में कोबरा पोस्ट के खुलासे में जब रणवीर सेना के कमांडरों ने जनसंहारों में अपनी संलिप्तता को कुबूल किया, तो लालू-नीतीश चुप क्यों रहे? जब किसानों के लिए धान की कीमत, सिंचाई, बिजली, शिक्षा, स्कूल आदि के आंदोलन करने वाले का. सतीश यादव की हत्या हुई तो लालू-नीतीश या राजद के किसी अधिकृत नेता ने गिरफ्तारी और सजा की मांग तो दूर, निंदा तक नहीं किया। उन्होंने कहा कि ये लोग भाजपा से कतई नहीं लड़ सकते। भाजपा जिस परिवर्तन की बात कर रही है, उसका मतलब है बर्बर सामंती वर्चस्व की वापसी, जिसका नमूना सैकड़ों गरीबों, महिलाओं और बच्चों की हत्या के दोषी ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद आरा से लेकर पटना तक मचे तांडव में लोग देख चुके हैं। 

आइसा के राज्य सचिव का. अजीत कुशवाहा ने कहा कि दोनों गठबंधन लोगों को एक दूसरे का डर दिखा रहे हैं, पर लसाढ़ी के शहीद जिन मूल्यों और सपनों के लिए शहीद हुए, उनसे इनका कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने छात्रों को इन शहीदों का इतिहास पढ़ाए जाने की मांग की। 

अखिल भारतीय ग्रामीण खेत मजदूर सभा के जिला सचिव का. सिद्धनाथ राम ने कहा कि अंग्रेजों ने सोचा था कि लसाढ़ी के किसानों का कत्ल करके वे आजादी और स्वराज के सपने के कुचल देंगे, लेकिन वे विफल हुए। इसलिए शासकवर्ग जितनी भी नृशंसता पर उतारू हो जाए, सामंती समाज और पूंजीवादी समाज को एक दिन खत्म होना ही होगा। 

निर्मोही 
सभा को आइसा नेता रचना सिंह, आरा नगर कमेटी के सचिव का. दिलराज प्रीतम, आइसा, भोजपुर के अध्यक्ष का. शिवप्रकाश रंजन, संदेश प्रखंड कमेटी सदस्य का. धर्मेंद्र सिंह, चरपोखरी प्रखंड कमेटी सदस्य का. कैलाश पाठक ने भी संबोधित किया। जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने इस मौके पर का. सतीश यादव की याद में रचित एक गीत तथा कुछ चुनावी जनगीतों का गायन किया। सभा की अध्यक्षता का. उपेंद्र यादव ने की। 

इस मौके पर का. रघुवर पासवान, का. जितेंद्र कुमार, शहीद सतीश यादव की पत्नी उषा कुंवर, सबीर कुमार, शिला कुमारी, उपेंद्र पासवान, जीतन चौधरी, नीलम कुंवर, दसईं जी आदि मौजूद थे। 

इस स्मारक पर तिरंगा झंडा ही फहराया जाता है। यह बड़ा दिलचस्प है कि भाकपा-माले के नेता, कार्यकर्ता और समर्थक लाल झंडा लेकर यहां पहुंचते हैं और कोई वरिष्ठ कामरेड तिरंगा झंडा फहराते हैं। शहीदों के प्रति कम्युनिस्टों के सम्मान का यह भी एक उदाहरण है। इस बार झण्डात्तोलन कामरेड सिद्धनाथ राम ने किया।चुनावी आचार संहिता के कारण इस बार लोगों के हाथ मेें लाल झंडे नहीं थे, पर शहीदों के प्रति गहरा सम्मान और आज के दौर में आजादी, इंसाफ और समानता की लड़ाइयों को आगे बढ़ाने का संकल्प सबके चेहरे पर फहर रहा था। इस पर भला किसी आचार संहिता की पाबंदी कैसे लग सकती है!





 

Wednesday, September 24, 2014

लसाड़ी में माले द्वारा शहीद मेला और संकल्प सभा का आयोजन


माले शहीदों के सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष चला रही है: अरुण सिंह


लसाड़ी शहीद स्मारक, भोजपुर 
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का भोजपुर में भी खासा असर था। आंदोलनकारी डाकघर, नहर आॅफिस, गेस्ट हाउस, तहसीलघर आदि में तोड़फोड़ कर रहे थे, टेलिफोन के तार काट रहे थे। 15 सितंबर 1942 इन आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के मकसद से 14 लारियों में ब्रिटिश सैनिक लसाड़ी गांव पहुंचे और मशीनगनों से हमला कर दिया। यहां के किसानों ने उनकी मशीनगनों का सामना अपने पंरपरागत अस्त्रों से किया और लड़ते हुए शहीद हुए। लसाड़ी और बगल के गांव चासी और ढकनी के गिरीवर सिंह, शीतल लोहार, रामधारी पांडेय, रामदेव साह, केश्वर सिंह, महादेव सिंह, वासुदेव सिंह, जगरनाथ सिंह, सभापति सिंह, शीतल प्रसाद सिंह, केशव प्रसाद सिंह के साथ एक महिला अकली देवी भी शहीद हुईं। 

1947 की आजादी के बाद यहां दो-दो बार शहीदों के नाम का शिलापट्ट लगाया गया, लेकिन उन शिलापट्टों पर धूल जमती गई। सिर्फ चंद पढ़े लिखे लोगों को ही उस इतिहास का पता था। लेकिन जब क्रांतिकारी किसान आंदोलन के नायक का. रामनरेश राम सहार से विधायक बने तो उन्होंने उन शहीदों के बारे में तथ्यों को जुटाया तथा उनके स्मारक का निर्माण करवाया। लसाड़ी और आसपास की जनता ने भी इसमें मदद की और सन् 2000 में भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने इसका उद्घाटन किया। उन्होंने यहां शहीद मेला लगाने की परपंरा की शुरुआत भी कराई।

का. रामनरेश राम ने लसाड़ी शहीद स्मारक के निर्माण में काफी दिलचस्पी ली थी और पटना में मौजूद शहीद स्मारक की तरह ही इसे बनाने का उनका सपना था। स्मारक निर्माण के दौरान भी वे लगातार मौजूद रहते थे। जब इस स्मारक का निर्माण कार्य चल रहा था, तब शासकवर्गीय पार्टियों के लोग दुष्प्रचार कर रहे थे कि वे गोइंठा में घी सुखा रहे हैं, लेकिन आज इसका श्रेय लेने के लिए उनके बीच होड़ लगी रहती है। अब हर साल यहां सरकारी आयोजन भी होने लगा है। 

हर साल की तरह इस साल 15 सितंबर को जब हम लसाड़ी पहुंचे, तब तक शहीद स्मारक पर मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और शासकवर्गीय पार्टियों के प्रतिनिधियों की गाडि़यों का काफिला जा चुका था। जिस क्रांतिकारी शख्सियत ने आजादी के आंदोलन के इन गुमनाम शहीदों के इतिहास के अंधेरे से बाहर लाकर उनका स्मारक बनाने की पहल की और हर साल वहां शहीद मेला और संकल्प सभा आयोजित करने की परंपरा शुरू की, उनकी चर्चा बिल्कुल न हो, इसकी शासकवर्गीय पार्टियों के नेताओं, मंत्रियों, सांसद, विधायकों, अफसरों और अखबारों द्वारा इस बार भी हरसंभव कोशिश की गई। उन्हें लगता है कि इसके जरिए वे जनता के प्रतिरोध के इतिहास पर अपनी इजारेदारी कायम रख सकते हैैं। लेकिन का. रामनरेश राम के लिए लसाड़ी के शहीद महज इतिहास के नायक नहीं थे, वे उनके लिए जीवित संदर्भ थे। वे भाकपा-माले के आंदोलन और अपने साथियों की शहादत की परंपरा को उससे जोड़ते थे। 
पहले माले के पूर्व विधायक अरुण सिंह ने झंडात्तोलन किया। उसके बाद सबने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। संकल्प सभा शुरू होने से पहले एक नौजवान आया जिसने ‘राजकीय शहीद स्मारक विकास समिति सह शोध संस्थान’ नाम की एक संस्था बना ली है। उसने दो पृष्ठों का एक पर्चा दिया, जिसमें प्रो. बलदेव नारायण की पुस्तक 1942 अगस्त क्रांति का अंश छपा था। लेकिन इस पर्चे में भी कहीं का. रामनरेश राम का नाम नहीं था। सभा में वक्ताओं ने यह भी बताया कि इसके निर्माण, उद्घाटन और सहयोगकर्ताओं के नाम की सूची वाले शिलापट्ट को जब इस बार लगाने लोग यहां पहुंचे तो स्थानीय पुलिस ने उसमें बाधा डाला। लोगों ने जब विरोध किया और उच्चाधिकारियों से शिकायत की, तब उन्हें इजाजत मिली। ऐसा लगता है कि राजकीय घोषित हो जाने के बाद शासकवर्ग और उसका प्रशासन इसे अपनी जागीर समझने लगा है। पिछले तीन-चार वर्षों में कुछ भ्रष्ट नेता और जनहत्यारे भी यहां आने लगे हैं और समझते हैं कि इस तरह वे शहीदों की विरासत को हड़प लेंगे। कुछ लोग अलग से शहीद अकली देवी पर आयोजन करने लगे हैं। 
अरुण सिंह 

इस बार लसाड़ी के शहीद स्मारक पर आयोजित शहीद मेला और संकल्प सभा को संबोधित करते हुए माले के बिहार राज्य स्थाई समिति सदस्य और पूर्व विधायक अरुण सिंह ने कहा कि का. रामनरेश राम ने लसाड़ी के गुमनाम शहीदों का स्मारक बनवाया था और यहां शहीद मेला की पंरपरा शुरू की थी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि अपने बहादुर पुरखों की तरह आज भी मजदूर-किसान साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की गुलाम शासकवर्गीय पार्टियों के खिलाफ एकजुट होकर प्रतिरोध करने की प्रेरणा लें। उन्होंने कहा कि शहीदों के वंशजों का कहना है कि भ्रष्टाचार का खात्मा और सुराज लाना उनका सपना था। अगर इस पैमाने पर देखा जाए तो इस देश की सरकारें उनके सपनों के विरोध में ही नजर आएंगी। आज काॅरपोरेट घराने धीरे-धीरे आर्थिक-राजनीतिक संस्थाओं पर कब्जा कर रही हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार के विरोध में मोदी की सरकार बनाने के लिए काॅरपोरेट पूंजी के बल पर जबर्दस्त प्रचार करके सत्ता हासिल की गई, पर न महंगाई कम हो रही है और न ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जरूरतों को पूरा करने के बजाए सरकार हर क्षेत्र को पूंजीपतियों के हाथ बेच रही है। रेल और सुरक्षा के मामलों में एफडीआई इसी की बानगी है। भाजपा का विकल्प होने का दावा करने वाली कांग्रेस, राजद, जद-यू जैसी पार्टियों के पास इस अर्थनीति और उसके सांप्रदायिक फासीवादी अभियान का कोई वैचारिक विकल्प नहीं है। आज हम पर और हमारी भावी पीढ़ी के ऊपर जो भीषण खतरे मंडरा रहे हैं, उसके खिलाफ लसाड़ी के शहीदों के रास्ते पर चलकर संघर्ष करना होगा, इसी के जरिए उनके सपनों को साकार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शासकवर्गीय पार्टियों ने स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों के सपनों के साथ विश्वासघात किया है। भाकपा-माले से ये पार्टियां इसलिए डरती हैं, क्योंकि माले आजादी के आंदोलन के सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष चला रही है। 

सुदामा प्रसाद 
अखिल भारतीय किसान सभा के प्रांतीय सचिव का. सुदामा प्रसाद ने विस्तार से किसानों के संकटों के बारे में बताते हुए कहा कि कृषि के क्षेत्र में लगातार सरकारी सब्सिडी खत्म की जा रही है और पूंजीपति घरानों को भारी छूट दी जा रही है। मोदी की सरकार ने धान खरीद पर मिलने वाले बोनस को खत्म कर दिया है। केंद्र और बिहार सरकार को सोन नहरों के आधुनिकीकरण की कोई चिंता नहीं है। ऐसी सरकारों से जुड़ी हुई पार्टियों के प्रतिनिधि लसाड़ी के शहीद किसानों के सपनों को साकार नहीं कर सकते। उन्होंने 12 अक्टूबर को ‘खेत, खेती, किसान बचाओ/तबाही लूट का राज मिटाओ’ नारे के साथ पीरो में होने वाले सम्मेलन के लिए भी किसानों को आमंत्रित किया। 

माले जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह ने कहा कि जनता के शोषण और लूट के मामले में तमाम शासकवर्गीय पार्टियां एक हैं। जिन काले अंगरेजों के कुशासन की आशंका भगतसिंह ने जाहिर की थी, वह आज ज्यादा स्पष्ट रूप से दिख रहा है। लसाड़ी के शहीदों की परंपरा को आगे बढ़ाना है तो मौजूदा कुशासन के खिलाफ लड़ना ही होगा। 

माले जिला कमेटी सदस्य मनोज मंजिल ने कहा कि आज भी जनता के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों के लिए शासन-प्रशासन के पास लाठी-गोली और जेल है। भोजपुर के बहादुर बेटों ने तो कुर्बानी देकर लसाड़ी के शहीदों की परंपरा को आगे बढ़ाया है। जबकि शासकवर्ग शहीदों के सपनों की ही हत्या करने में लगा हुआ है। 

आइसा के राज्य अध्यक्ष राजू यादव ने कहा कि जिनका इतिहास देश के आजादी के आंदोलन में भागीदारी के बजाय गद्दारी का रहा, वे आज केंद्र में सत्ता में है। ऐसी सरकार के लिए लसाड़ी के किसानों ने शहादत नहीं दी थी। आइसा के राज्य सचिव अजित कुशवाहा ने विस्तार से केंद्र सरकार की वादाखिलाफी के बारे में बोलते हुए कहा कि ऐसी शक्तियों के खिलाफ ही रामनरेश राम जनता को संगठित करना चाहते थे। लसाड़ी का स्मारक हमें इस कार्यभार को पूरा करने की पे्ररणा देता है। अगिआंव प्रखंड के सचिव का. रघुवर पासवान ने कहा कि जो लोग खेती और मजदूरी करते हैं, लसाड़ी के शहीदों ने उस वर्ग के लिए शहादत दी थी। उसी वर्ग के नेता रामनरेश राम ने उन्हीं इतिहास के अंधेरे से बाहर निकाला, लेकिन अब शासकवर्ग और प्रशासन उनका नाम मिटा देना चाहता है, जिसे बिल्कुल बर्दास्त नहीं किया जाएगा। संकल्प सभा को खेमस के जिला अध्यक्ष सिद्धनाथ राम, विमल यादव ने भी संबोधित किया। संचालन उपेंद्र सिंह ने किया। जनकवि कृष्णकुमार निर्मोही ने जनगीत सुनाए। संकल्प सभा से पहले अरुण सिंह ने झंडातोलन किया।