Monday, September 21, 2015

आरा में ‘एजेंडा 2015 : बिहार में वामपंथी विकल्प’ कन्वेन्शन आयोजित हुआ


प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से 20 सितंबर रेडक्राॅस सभागार, आरा में आयोजित कन्वेंशन ‘एजेंडा 2015: बिहार में वामपंथी विकल्प’ में लेखक, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने भोजपुर जिले के तमाम सीटों से भाकपा-माले के उम्मीदवारों और पूरे शाहाबाद इलाके में वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन की घोषणा की।

कवि सुनील चौधरी ने कन्वेंशन के दृष्टि पत्र का पाठ किया। अध्यक्षता रामनिहाल गुंजन, डाॅ. नीरज सिंह, प्रो. रवींद्रनाथ राय और जितेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए जनवादी लेखक संघ, बिहार के अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य में जो सरकारें हैं, उन्होंने जनतंत्र के मायने बदल दिए हैं। जनाधिकारों पर ऐसी खुली चोट पहले कभी नहीं हो रही थी। नीतीश कुमार भी मोदी की तरह ही तानाशाह हैं। ये छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलर गठबंधन एक-दूसरे को मुकाबले में बता रहे हैं, पर ये दोनों देश को बेचने को तैयार बैठे हैं। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार पिछले पच्चीस साल से एक मकसद और लक्ष्य के साथ सांप्रदायिक आंधी, सामंती उत्पीड़न और कारपोरेटपरस्ती के खिलाफ सृजनरत रहे हैं। आज वामपंथी दल भी एकजुट हुए हैं, जो यथास्थितिवादी और पूंजीवादी रास्ते के खिलाफ संघर्ष के लिहाज से बेहद उम्मीद भरी स्थिति है। आशा की यह किरण जरूर मशाल बनेगी। 

प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अमनपसंद, इंसानियतपसंद लोगों को वामपंथी विकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने जनपक्षधर मीडिया के निर्माण पर भी जोर दिया।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने मुक्तिबोध के हवाले से कहा कि मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, अगर वो है तो सबके साथ ही। उन्होंने कहा कि आज वामपंथ ही एकमात्र विकल्प है। 

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि वामपंथ ही वह रास्ता है, जिससे इस देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान संभव है। इस चुनाव में वामपंथ के लिए बेहद अच्छी परिस्थिति है।

सीपीआई-एम के वरिष्ठ नेता रामप्रभाव मिश्र ने कहा कि विकल्प जनता के संघर्ष से ही निर्मित होगा।

हिरावल के संयोजक रंगकर्मी-गायक संतोष झा ने कहा कि कन्वेंशन का दृष्टिपत्र बताता है कि लड़ाई सिर्फ चुनाव तक महदूद नहीं है। लेकिन फिलहाल यह जरूरी है कि जिन ताकतों के खिलाफ लड़ना है, उनके खिलाफ प्रचार में उतरा जाए, वामपंथी विकल्प के पक्ष में पूरी ताकत से लगा जाए। महागठबंधन में शामिल दलों का भी शिक्षा और संस्कृति और जनता के बुनियादी मुद्दों के प्रति बहुत खराब रिकार्ड रहा है, भाजपा के रोकने के नाम पर महागठबंधन का पक्ष नहीं लिया जा सकता। इन दोनों गठबंधनों से मुक्ति के बगैर बिहार का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आरएसएस की गुंडावाहिनियों से आने वाले समय में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और इंसानी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तियों को और भी बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार रहना होगा। 

इंसाफ मंच के जाकिर हुसैन ने कहा कि जो आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, वे आज सांप्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं और ‘देशभक्ति’ का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। लालू बिहार में भाजपा को रोकने का दावा करते रहे, पर उन्होंने जिन सामाजिक शक्तियों को बढ़ावा दिया, उनके कंधे पर सवार होकर वह बिहार में आ गई, तो अब उसे भगाने का झांसा जनता को दे रहे हैं। अगर लालू और नीतीश एक नंबर के सेकुलर हैं तो उन्हें जवाब देना होगा कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं दिया। आतंकवाद के नाम पर साईकिल बनाने वाले से लेकर डाॅक्टरी की पढ़ाई करने वाले बेगुनाह नौजवानों को एनआईए ने उठाया, नीतीश ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं कहा कि बिहार में एनआईए की जरूरत नहीं है? 

बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोप गुट के नेता अखिलेश ने कहा कि समान शिक्षा प्रणाली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन सिर्फ वामपंथी दलों ने किया है, शिक्षकों के आंदोलनों को उनका साथ मिला है, इस कारण भी उनका खुलकर समर्थन किया जाना चाहिए। 

आइसा नेता रचना सिंह ने शिक्षा और संस्कृति के सांप्रदायीकरण और निजीकरण की चर्चा की। वीमेंस काॅलेज में लड़कियों से छेड़खानी के बाद भड़के आंदोलन पर बिहार सरकार की चुप्पी पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि बिहार में शिक्षा और स्त्रियों की आजादी और सुरक्षा की स्थिति बहुत ही खराब है और इसके लिए नीतीश कुमार की सरकार पूरी तरह जिम्मेवार है। मीडिया द्वारा मोदी और नीतीश के चेहरे को चुनाव के केंद्र बनाने की आलोचना करते हुए प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, स्त्रियों के सम्मान, आजादी और सुरक्षा के लिए उन्होंने वाम दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि पूंजीवाद चकाचौंध पैदा करता है। वह धोखा और तिलिस्म फैलाता है। कारपोरेट हमारे सामने राजनीतिक विकल्प भी फेंकता है। इन्हीं विकल्पों के बीच चुनाव के कारण सरकारों का चरित्र नहीं बदल रहा है। इनके खिलाफ जनता के सही विकल्प के निर्माण में लगी शक्तियों को वैकल्पिक प्रचार तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि अल्पसंख्यकों के नफ्सियात (मनोविज्ञान) को समझना जरूरी है। दक्षिणपंथी पार्टियां उनकी नफ्सियाती कमजोरियों से फायदा उठाती हैं। पिछले चुनाव में जो दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई और अब जो आवैसी सामने आए हैं, वे दोनों इसी के उदाहरण हैं। 

कथाकार अनंत कुमार सिंह ने महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के एक फरमान की चर्चा करते हुए कहा कि अब तो विधायक, मंत्री के खिलाफ बोलने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का भय दिखाया जा रहा है। ऐसे लोगों को जनता क्यों चुने? उन्होंने कहा कि वामपंथी विकल्प होने से अब मतदाताओं के सामने नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुनने की दुविधा नहीं रहेगी। उन्होंने इस कन्वेंशन के मकसद के प्रति कथाकार शीन हयात के समर्थन का संदेश भी पढ़ा।

प्रो. तुंगनाथ चौधरी ने कहा कि चुनाव के समय जातिवादी-सामंती शक्तियों के पक्ष में होने वाले धु्रवीकरण पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस चुनाव में एकजुटता से वामपंथी दलों में नई ऊर्जा का संचार होगा। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि सत्ताधारी पार्टियों के दो मोर्चों के विरुद्ध वाममोर्चा ही असली तीसरा मोर्चा है। 

कन्वेंशन में मौजूद आरा से भाकपा-माले उम्मीदवार क्यामुद्दीन ने कहा कि भाकपा-माले के नेता-कार्यकर्ता सांप्रदायिकता, अपराध, स्त्रियों के उत्पीड़न, व्यवसायियों की हत्या, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य आदि सवालों पर साल के तीन सौ पैसठों दिन संघर्ष करते रहते हैं। चुनाव में उनकी जीत से विधानसभा के भीतर भी जनता के सवालों पर संघर्ष हो सकेगा। 

जलेस के बालरूप शर्मा, सीपीआई-एम के आरा नगर कमेटी सदस्य वैद्यनाथ पांडेय, कवि केडी सिंह, राजेश राजमणि, कवि संतोष श्रेयांश, अरविंद अनुराग, सतीश कुमार राणा ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे। 

कन्वेंशन में जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने चुनावी जनगीतों और शायर कुर्बान आतिश ने अपनी गजल को सुनाया।

आशुतोष कुमार पांडेय ने कन्वेंशन का तीन सूत्री प्रस्ताव पढ़ा। पहला प्रस्ताव वामपंथी उम्मीदवारों के समर्थन का था। दूसरा प्रस्ताव एफटीआईआई के छात्रों के आंदोलन के सौ दिन पूरा होने से संबंधित था। उनके आंदोलन के समर्थन में सभागार से बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया था, जिस पर लेखक-संस्कृतिकर्मियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए। तीसरे प्रस्ताव में आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा प्रगतिशील, विवेकवादी बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले का हर स्तर से प्रतिवाद तेज करने की अपील की गई थी। 

कन्वेंशन में कवि जर्नादन मिश्र, अरुण शीतांश, आदित्य नारायण, रविशंकर सिंह, हरिनाथ राम, मिथिलेश जी, दीनानाथ सिंह, श्रमिक नेता यदुनंदन चौधरी, छात्र नेता अजित कुशवाहा, पत्रकार प्रशांत, शमशाद, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, अमित मेहता, विजय मेहता, रामदास राही, बनवारी राम, रामकुमार नीरज, किशोर कुणाल, संजय कुमार, माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम, राजेंद्र यादव आदि भी मौजूद थे। 








Thursday, September 17, 2015

लसाढ़ी में शहीद मेला संपन्न



शहीदों ने जिस आजादी के लिए शहादत दी, उसके लिए आज भी लड़ाई जारी है


स्वाधीनता आंदोलन से गद्दारी करने वाले आज भारत की जनता और लोकतंत्र से गद्दारी कर रहे हैं

सत्ताधारी गठबंधनों को लसाढ़ी के शहीदों के मूल्यों और सपनों से कुछ लेना-देना नहीं



‘‘लसाढ़ी का शहीद स्मारक किसी पूंजीपति, अपराधी या माफिया के सहयोग से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग और का. रामनरेश राम के विधायक फंड से बना था। 1857 के जनविद्रोह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भोजपुर की सपूतों ने जनप्रतिरोध की जो मिसाल पेश की, रामनरेश राम उसी की कड़ी थे, इसीलिए लसाढ़ी, ढकनी, चासी के जो किसान अंग्रेजों के जुल्म और अन्याय के राज के खिलाफ लड़ते हुए 15 सितंबर 1942 को शहीद हुए थे, उनके इतिहास को सामने लाने का काम उन्होंने ही किया।’’ लसाढ़ी में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य अध्यक्ष राजू यादव ने यह कहा। हर वर्ष की तरह यहां लसाढ़ी के शहीदों की याद में भाकपा-माले द्वारा शहीद मेला का आयोजन किया गया था। 

जबसे यह स्मारक बना है, एकाध वर्ष ही ऐसा रहा होगा, जब इस रोज मैं भोजपुर से बाहर रहा होऊंगा। अक्सर लसाढ़ी के शहीद मेला में मैं पहुंच ही जाता हूं। इस बार आरा पहुंचा, तो सूचना मिली कि चुनाव आचार संहिता और जानबूझकर जटिलता पैदा करके भोजपुर जिला प्रशासन शहीद मेला के आयोजन की स्वीकृति न देने की साजिश रच रहा है। वैसे भी थानों की पुलिस को तो चुनावी आचार संहिता के नियम-कायदों और उसकी बारीकियों से भी कुछ लेना-देना नहीं होता। उनके हाथ तो एक ऐसा हथियार लग जाता है, जिससे वे ग्रामीण इलाके में सत्ताधारी वर्ग की राजनीति के इशारे पर राजनीतिक प्रचार में व्यवधान खड़ा करते हैं। लेकिन साथी अड़ गए थे कि आयोजन की प्रशासनिक स्वीकृति के लिए जो भी नियम कायदा है, उस पर अमल किया गया है, अगर प्रशासन इजाजत न देगा, तब भी शहीद मेला लगेगा, उसको आचार संहिता उल्लंघन का मामला बनाना है, तो बनाए। अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा। 

दरअसल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय भोजपुर में आंदोलनात्मक गतिविधियां बहुत तेज थीं, आंदोलन के दमन के लिए ही 15 सितंबर को ब्रिटिश सेना के बलूची रेजिमेंट के सैनिकों ने लसाढ़ी पहुंची थी। लसाढ़ी, चासी और ढकनी नामक गांवों के किसान परंपरागत हथियारों के साथ उनका मुकाबला करने चल निकल पड़े थे। इस लड़ाई में 11 किसान और 1 महिला अकली देवी शहीद हुए थे। आजादी के वर्षों बाद तक इन शहीदों की याद किसी को नहीं आई, तो इसलिए भी नहीं आई, क्योंकि आजाद भारत में सरकार पुलिस-फौज के बल पर ही शासन करने की आदी थी। परंपरागत हथियारों के साथ सुविधासंपन्न सत्ताधारी फौज को चुनौती देने वाले इन किसानों के इतिहास पर धूल जमने देना ही उनके हित में था। लेकिन भावना कभी मरती नहीं। 1942 में कुछ ही दूर एकवारी गांव के एक किशोर ने उस फायरिंग की आवाज सुनी थी, जिसमें बहादुर किसान मारे गए थे। वे थे रामनरेश राम। बड़े होकर एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट के बतौर उन्होंने समाज और सत्ता को बदलने के संघर्ष का नेतृत्व किया। सत्तर के सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष के दौरान लसाढ़ी के किसानों के प्रतिरोध की परंपरा को उन्होंने बुलंदियों पर पहुंचाया। जो जनप्रतिनिधि हो वह किसानों और मजदूरों के हित में काम करे, उसकी बर्बादी और दमन के लिए जिम्मेवार व्यवस्था का सहयोगी न बने, इसी सपने के साथ तो 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सहार विधानसभा के लिए चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन सामंती ताकतों को उनकी जीत मंजूर न थी। मुखिया के बतौर अपनी जनपक्षधर कार्यशैली की वजह से वे काफी लोकप्रिय थे। सामंतों ने हार के भय से उनके साथी जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला किया। इसके बाद ही उनके हथियारों का जवाब हथियार से देने के दौर की शुरुआत हुई। सामंती आधारों पर टिकी सरकारों और उनके पुलिस-फौज ने 1942 के किसानों की तरह ही जगदीश मास्टर, रामेश्वर अहीर, बूटन राम समेत कई नेतृत्वकारियों की हत्या करके सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की इस लड़ाई को कुचल देने का सपना देखा। लेकिन भूमिगत रामनरेश राम ने सामाजिक बदलाव और राजनीतिक दावेदारी की लड़ाई को जारी रखा। 28 वर्षों बाद गरीब-मेहनतकश जनता के प्रतिनिधि के रूप में वे बिहार विधानसभा में दाखिल हुए। विधायक के तौर पर उन्होंने 1942 में लसाढ़ी में शहीद हुए किसानों का स्मारक बनाने का निर्णय लिया। सत्ताधारी राजद के लोग कटाछ करते रहे कि रामनरेश राम ‘गोईंठा में घी सुखा रहे हैं’, लेकिन रामनरेश राम इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट थे कि वे वर्तमान और भविष्य की लड़ाइयों के लिए एक प्रेरणा स्थल का निर्माण कर रहे हैं। 

पिछले कुछ सालों से जिला प्रशासन भी भारी लाव-लश्कर के साथ इन शहीदों के स्मारक पर फूल माला चढ़ाने पहुंचता है। सरकार के मंत्री भी होते हैं और तमाम सत्ताधारी दलों के छोटे-बड़े नेता भी। लेकिन वे सिर्फ रस्म अदायगी के लिए पहुंचते हैं और प्रायः इस मौके पर ग्रामीणों द्वारा किसी मुद्दे से संबंधित मांग से बचने या हवाई वादे करके जल्दी खिसकने के चक्कर में रहते हैं। स्मारक निर्माण में का. रामनरेश राम की भूमिका को भूले से भी याद नहीं किया जाता, लेकिन का. रामनरेश राम ने शहीद मेला आयोजित करने की जिस परंपरा की शुरुआत की थी, वह जारी है और उसमें हर साल सामयिक राजनीतिक-सामाजिक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा होती है। इस साल भी शहीद मेला में भाकपा-माले ने संकल्प सभा का आयोजन किया। संचालक उपेंद्र यादव ने कहा कि यह आयोजन कोई औपचारिकता नहीं है। शहीदों ने जिस आजादी के लिए शहादत दी, उसके लिए आज भी लड़ाई जारी है। जब तक गरीबों का राज कायम नहीं होता, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। अखिल भारतीय किसान सभा नेता विमल यादव ने कहा कि आजादी के वर्षों बाद किसी को इन शहीदों की सुध नहीं आई थी। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी रामनरेश राम ने इन क्रांतिकारियों की सुध ली। 

स्मारक बनने के बाद यहां हर साल जिले के प्रशासनिक अधिकारी आने लगे हैं, पर उन्हें इन शहीदों की लड़ाई में भला क्यों दिलचस्पी होगी। इस बार तो अधिकारी 15 सितंबर की जगह 15 अगस्त ही रटते रहे। क्या करें बेचारे, स्वाधीनता आंदोलन को इन लोगों के जेहन में 15 अगस्त और 26 जनवरी तक ही सीमित रख दिया गया है। 
अपने देश मे जिस तरह की पार्टियों की सरकारें बन रही हैं, उनकी बेइंसाफी और जनविरोधी रवैये के खिलाफ खड़े होने वाले रीढ़दार अधिकारी भी बहुत कम नजर आते हैं। शासकवर्गीय पार्टियां उन्हें अपने एजेंट के बतौर इस्तेमाल करने की कोशिश करती हैं। चुनावों में तो यह और भी स्पष्ट दिखने लगता है। 

बिहार विधानसभा चुनाव करीब है, जाहिर है इसका असर इस बार वक्ताओं के वक्तव्य में दिखना ही था। मुख्य वक्ता का. राजू यादव ने कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में इस उम्मीद पर जनता ने भाजपा को वोट दिया था कि वह काला धन वापस लाएगी, हर व्यक्ति को पंद्रह लाख रुपये मिलेंगे, महंगाई और भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन यह सब जुमलेबाजी साबित हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा नेताओं का गद्दारी का इतिहास पुराना है। इन लोगों ने स्वाधीनता आंदोलन के साथ गद्दारी किया और आज भारत की जनता और लोकतंत्र के साथ गद्दारी कर रहे हैं। लसाढ़ी, ढकनी, चासी के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत से मुकाबला करने का रिकार्ड है, जबकि भाजपा नेताओं का रिकार्ड अंग्रेजों से माफी मांगने का है। 

राजू यादव ने कहा कि लालू और नीतीश भाजपा के खिलाफ प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि बिहार की जमीन में भाजपा को जड़ जमाने का मौका इन्होंने ही दिया। भाजपा यहां कहीं बाहर से नहीं आई है, बल्कि 1990 के बाद राजद-जद-यू के शासनकाल में सामंती ताकतों के समर्थन से ही उसे जगह मिली। 

माले जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह ने कहा कि लालू-नीतीश ने सामंती ताकतों का मनोबल बढ़ाया, भूमि सुधार और बंटाईदारी से मुकरते रहे। बिहार में भाकपा-माले पिछले पच्चीस वर्षों में लोगों की बुनियादी सुविधाओं, किसान, मजदूरों, नौजवानों की समस्याओं के समाधान और सामाजिक न्याय, बराबरी और तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करती रही। लालू-नीतीश के शासन में आंदोलन के कारण माले नेताओं पर केस किया गया और सामंती ताकतों को तांडव मचाने की छूट दी जाती रही। लालू-नीतीश हमेशा सामंती ताकतों के पक्ष में खड़े रहे। ये भाजपा को जमीनी स्तर पर शिकस्त दे ही नहीं सकते। सच तो यह है कि भाजपा नेतृत्व वाला गठबंधन और महागठबंधन दोनों जनता का भरोसा खो चुके हैं। 

उन्होंने सवाल उठाया कि हाल में कोबरा पोस्ट के खुलासे में जब रणवीर सेना के कमांडरों ने जनसंहारों में अपनी संलिप्तता को कुबूल किया, तो लालू-नीतीश चुप क्यों रहे? जब किसानों के लिए धान की कीमत, सिंचाई, बिजली, शिक्षा, स्कूल आदि के आंदोलन करने वाले का. सतीश यादव की हत्या हुई तो लालू-नीतीश या राजद के किसी अधिकृत नेता ने गिरफ्तारी और सजा की मांग तो दूर, निंदा तक नहीं किया। उन्होंने कहा कि ये लोग भाजपा से कतई नहीं लड़ सकते। भाजपा जिस परिवर्तन की बात कर रही है, उसका मतलब है बर्बर सामंती वर्चस्व की वापसी, जिसका नमूना सैकड़ों गरीबों, महिलाओं और बच्चों की हत्या के दोषी ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद आरा से लेकर पटना तक मचे तांडव में लोग देख चुके हैं। 

आइसा के राज्य सचिव का. अजीत कुशवाहा ने कहा कि दोनों गठबंधन लोगों को एक दूसरे का डर दिखा रहे हैं, पर लसाढ़ी के शहीद जिन मूल्यों और सपनों के लिए शहीद हुए, उनसे इनका कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने छात्रों को इन शहीदों का इतिहास पढ़ाए जाने की मांग की। 

अखिल भारतीय ग्रामीण खेत मजदूर सभा के जिला सचिव का. सिद्धनाथ राम ने कहा कि अंग्रेजों ने सोचा था कि लसाढ़ी के किसानों का कत्ल करके वे आजादी और स्वराज के सपने के कुचल देंगे, लेकिन वे विफल हुए। इसलिए शासकवर्ग जितनी भी नृशंसता पर उतारू हो जाए, सामंती समाज और पूंजीवादी समाज को एक दिन खत्म होना ही होगा। 

निर्मोही 
सभा को आइसा नेता रचना सिंह, आरा नगर कमेटी के सचिव का. दिलराज प्रीतम, आइसा, भोजपुर के अध्यक्ष का. शिवप्रकाश रंजन, संदेश प्रखंड कमेटी सदस्य का. धर्मेंद्र सिंह, चरपोखरी प्रखंड कमेटी सदस्य का. कैलाश पाठक ने भी संबोधित किया। जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने इस मौके पर का. सतीश यादव की याद में रचित एक गीत तथा कुछ चुनावी जनगीतों का गायन किया। सभा की अध्यक्षता का. उपेंद्र यादव ने की। 

इस मौके पर का. रघुवर पासवान, का. जितेंद्र कुमार, शहीद सतीश यादव की पत्नी उषा कुंवर, सबीर कुमार, शिला कुमारी, उपेंद्र पासवान, जीतन चौधरी, नीलम कुंवर, दसईं जी आदि मौजूद थे। 

इस स्मारक पर तिरंगा झंडा ही फहराया जाता है। यह बड़ा दिलचस्प है कि भाकपा-माले के नेता, कार्यकर्ता और समर्थक लाल झंडा लेकर यहां पहुंचते हैं और कोई वरिष्ठ कामरेड तिरंगा झंडा फहराते हैं। शहीदों के प्रति कम्युनिस्टों के सम्मान का यह भी एक उदाहरण है। इस बार झण्डात्तोलन कामरेड सिद्धनाथ राम ने किया।चुनावी आचार संहिता के कारण इस बार लोगों के हाथ मेें लाल झंडे नहीं थे, पर शहीदों के प्रति गहरा सम्मान और आज के दौर में आजादी, इंसाफ और समानता की लड़ाइयों को आगे बढ़ाने का संकल्प सबके चेहरे पर फहर रहा था। इस पर भला किसी आचार संहिता की पाबंदी कैसे लग सकती है!





 

Saturday, September 5, 2015

प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ आरा में प्रतिरोध मार्च



फासीवाद के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध संगठित करना होगा 

3 सितंबर को पटना में प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ प्रगतिशील-जनवादी संगठनों ने प्रतिरोध मार्च निकाला था। इसके अगले दिन देर शाम में हमने आरा में 5 सितंबर को प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, छात्र संगठन आइसा, नाट्य संस्था युवानीति और बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ- गोपगुट की ओर से प्रतिरोध मार्च करने का निर्णय लिया। तैयारी के लिए कम समय मिला। शनिवार, कार्यालयों और काॅलेजों में छुट्टी के बावजूद करीब चालीस साहित्यकार, शिक्षक, संस्कृतिकर्मी, छात्र और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल हुए।

आजकल हर तरह के आयोजन के लिए प्रशासन को सूचना देने का नियम बना दिया गया है। लेकिन हमारे पास इसके लिए समय बिल्कुल नहीं था। हम जनकवि भोलाजी के पान दूकान के पास जुटे। वे अब नहीं हैं, पर उनकी दूकान है, जहां बैठकर वे अक्सर मूर्तिपूजा करने वालों के समाजविरोधी आचरण की खबर लेते थे, किसी-किसी से जरूर उनकी बहस हुई, पर किसी ने उनको हत्या करने की कभी धमकी नहीं दी थी। वे होते तो जरूर मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच के खिलाफ वैचारिक संघर्ष करने वाले प्रो. कलबुर्गी की हत्या पर कुछ काव्यात्मक पंक्तियां जरूर सुनाते, जैसा कि उन्होंने अपने एक गीत में लिखा था- कवन हउवे देवी देवता कवन ह मलिकवा/ बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा...माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी/ दिहनी बहुते कुछुवो न पइनी/ इ लोरवा इ लहूवा से बूझल पियसवा/ बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा। प्रतिवाद मार्च का बैनर भोलाजी के छोटे लड़के मंगल माही ने ही लिखा था। उसमें मैं एकाध संशोधन करवा रहा था, तभी बगल के थाने के एक पुलिसवाले को साथियों से कुछ पूछते देखा, शायद ‘प्रतिरोध मार्च’ के विषय के बारे में जानकर वह वहां से चला गया। 
फासीवाद हो बर्बाद, इंकलाब जिंदाबाद के जोशीले नारे के साथ मार्च की शुरुआत हुई। लेखक-बुद्धिजीवियों की हत्या क्यों, मोदी सरकार जवाब दो के नारे भी गूंजे। प्रतिरोध मार्च रेलवे स्टेशन परिसर में पहुंचकर सभा में तब्दील हो गया। सभा को संबोधित करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि देश में हिटलरशाही चल रही है। प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे महान शख्सियतों की हत्या की जा रही है और हत्यारों को पकड़ा नहीं जा रहा है। इन हत्यारों को संरक्षण देने वाले इंसानियत, विज्ञान और विकास के विरोधी हैं। वे जितनी भी हत्याएं कर लें, पर उनके खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रहेगी। 

अस्वस्थता के कारण जलेस के राज्य अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह प्रतिवाद मार्च में शामिल नहीं हो पाए, पर सभा के लिए उन्होंने अपना संदेश भेेजा था, जिसे कवि सुनील श्रीवास्तव ने पढ़ा। नीरज सिंह का मानना है कि प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्याएं लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। इस देश में फासीवाद के तेज कदमों की आहट साफ तौर पर सुनाई पड़ने लगी है। सभी तरह के लोकतंत्रवादियों, समाजकर्मियों, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों को इस खतरे को समझते हुए एक स्वर से इसके विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध संगठित करना चाहिए। 

शाम हो रही थी, युवा कवि हरेराम सिंह विक्रमगंज से आए थे, उनकी ट्रेन का समय हो चुका था, पर अपने गुस्से का इजहार उन्हें ज्यादा जरूरी लग रहा था। उन्होंने धर्म की आड़ में चलने वाले शोषण-उत्पीड़न और भेदभाव के अतीत और वर्तमान का जिक्र किया। आज के बाबाओं-महात्माओं के पास मौजूद अकूत संपदा पर सवाल उठाया और कहा कि किसान-मजदूरों को इनके और इनको संरक्षण देने वाली राजनीति के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार होना होगा। 

आइसा, बिहार की राज्य कार्यकारिणी सदस्य रचना ने कहा कि बुद्धिजीवियों की हत्या दरअसल उनकी सोच की हत्या की कोशिश है। आरएसएस राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता और जातिभेद को बढ़ावा दे रही है। इसी मकसद से वह पाठ्यक्रम में भी तब्दीली कर रही है। लेकिन उसके करतूत देश को ऐसे मुहाने पर ले जा रहे हैं, जहां उसके खिलाफ भारतीय जनता का एकताबद्ध प्रतिरोध होना अवश्यंभावी है। व्यक्ति की हत्या करके वे प्रगतिशील और विवेकवादी सोच की हत्या नहीं कर सकते।

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि धार्मिक-सामाजिक शोषण-उत्पीडन का विरोध किसी भी सच्चे लेखक का कर्तव्य है। अमेरिका तक में लेखक सरकारों की आलोचना करते हैं, पर उनकी हत्या इस तरह नहीं होती। लेकिन हमारे देश में सत्ता में ऐसी शक्तियां आई हैं, जो कहती हैं कि जो धार्मिक अंधविश्वास और मूर्तिपूजा का विरोध करेगा, उसकी हत्या करेंगी। प्रो. कलबुर्गी, का. पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्याएं एक पैटर्न पर की गई हैं। यही वे जनविरोधी ताकतें हैं, जो स्त्रियों की बराबरी और आजादी के विचार को बर्दाश्त नहीं करतीं। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद सुनील चौधरी ने कहा कि कारपोरेट और सांप्रदायिक शक्तियों के साथ गठजोड़ के बल पर मोदी की तानाशाही चल रही है। सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी ही नहीं, बल्कि आज जनता के सारे लोकतांत्रिक अधिकार भी खतरे में हैं। इसलिए इनके खिलाफ जनता की व्यापक एकजुटता जरूरी है। साहित्यकार, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को इसी प्रयास में लगना चाहिए। 



संचालन करते हुए मैंने इस ओर ध्यान दिलाया कि इस देश में धार्मिक सुधार, जातिगत समानता और सर्वधर्म सम्भाव की जो वैचारिक परंपरा रही है, आरएसएस उस पर सुनियोजित तरीके से हमले कर रही है। इसके साथ ही सामाजिक-सांप्रदायिक भेदभाव, उत्पीड़न, धार्मिक रूढ़िवाद और कट्टरता के खिलाफ भारत में आलोचना और प्रतिरोध की अपनी जो तर्कशील और विवेकवादी परंपरा रही है, वह उसे बर्दास्त नहीं है। एक ओर देश में निरंतर सांप्रदायिक विभाजन, विद्वेष और कत्लेआम को प्रोत्साहित करने वाले आरएसएस प्रमुख को जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराना और दूसरी ओर प्रो. कलबुर्गी, का. गोविंद पंसारे और डाॅ. नरेंद्र दाभोलकर के हत्यारों को खुला छोड़ देना, भारत के लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सभा में महाराष्ट्र सरकार द्वारा जनप्रतिनिधियों- मेयर, विधायक, सांसद की आलोचना या विरोध करने वालों को देशद्रोही करार देने वाले फरमान की भी भर्त्सना की गई। 

सभा में मैंने प्रो. कलबुर्गी पर जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण के लेख के अंश भी पढ़े। उन्होंने लिखा है कि प्रो. कलबुर्गी कन्नड़ के ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने उस क्षेत्र के इतिहास को इतिहास के आधिकारिक विद्वानों से भी ज्यादा वैज्ञानिक ढंग से उद्घाटित किया। वे 12 वीं सदी के क्रांतिकारी संत बसवेश्वर के जीवन और दर्शन के श्रेष्ठ व्याख्याकार थे। बसवन्ना की ही तरह वे अपने विचारों के लिए ही जिए और मरे। लेकिन अपने तार्किक और वस्तुवादी दृष्टिकोण के कारण खुद लिंगायत धर्म-प्रतिष्ठान से भी उनका टकराव होता रहा। उन्होंने कन्नड़ साहित्य, इतिहास और संस्कृति से संबंधित शोधपरक निबंध लिखे जो मार्ग शृंखला की पुस्तकों में संकलित हैं। उसी शृंखला के पहले खंड से उन्हें दो अध्याय लिंगायत मठाधीशों के दबाव में वापस लेने पड़े थे। इसी शृंखला की पुस्तक ‘मार्ग 4’ पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड 2006 में मिला। सन 2012 में कर्नाटक सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने प्रो. कलबुर्गी को उस समिति का प्रमुख बनाया जिसे आदिलशाही वंश के अधीन रचे गए समस्त साहित्य को कन्नड़ में लाने का कार्यभार सौंपा गया। श्री कलबुर्गी आदिलशाही वंश को दक्कन के पठार में सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अलमबरदार मानते थे। 

प्रणय कृष्ण के अनुसार प्रो. कलबुर्गी वचन साहित्य के महान अध्येता थे। उनके संपादन में ही 450 से भी ज्यादा संतों की वाणियों को 15 खण्डों में ‘समग्र वचन सम्पुट’ नाम से संकलित करने की शुरुआत हुई थी। वे सवाल उठाते हैं कि क्या इन संतों ( शरण और शरणियों) ने वेदों पर व्यंग्य नहीं किया, कर्मकांडों का उपहास नहीं किया? क्या देवी-देवताओं की उपासना का तिरस्कार नहीं किया? उनकी ह्त्या के बाद भी जिस तरह विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधि टी.वी. चैनल पर श्री कलबुर्गी पर देवी-देवताओं के तिरस्कार का आरोप लगा रहे थे और प्रकारांतर से लोगों के विक्षोभ के बहाने उनकी हत्या के औचित्य का संकेत कर रहे थे, क्या वे बसवन्ना, अक्क महादेवी, अल्लम प्रभू, चेन्न बसवन्ना, दोहर काकय्या, चेन्नैया, सिद्धरमा, गणचार और सैकड़ों शरणों और शरणियों से अतीत में जाकर बदला लेंगे? 

प्रणय कृष्ण ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि प्रो. कलबुर्गी ने 103 पुस्तकें लिखीं और यह साबित किया कि आज के समय में भी मातृभाषाओं में चिंतन और शोध के उच्चतम शिखर छुए जा सकते हैं। वे मातृभाषाओं में शिक्षा देने के प्रबल हिमायती थे और हाल ही में उन्होंने कर्नाटक सरकार से मांग की थी कि वह केंद्र सरकार से अपनी भाषा नीति स्पष्ट करने को कहे।

प्रो.कुलबर्गी, कामरेड गोविंद पंसारे और डा. दाभोलकर की हत्याएं तथा पाकिस्तान और बांग्लादेश में परिपाटी से हट कर मुक्त विचार रखनेवालों की हत्याएं यह बताती हैं कि धर्मसत्ता, राजसत्ता, पितृसत्ता, पूंजी की सत्ता और वर्ण-व्यवस्था की सत्ता के व्यापक गठजोड़ के बावजूद सही और सच्चे विचारों से कानून, राजनीति और विचारधारा के स्तर पर निपट पाना इन ताकतों के लिए मुश्किल पड़ रहा है। इसीलिए व्यक्तिगत हत्याओं का सहारा लिया जा रहा है। नए भारत की खोज के लिए शहीद हुए इन अग्रजों के उसूलों और विचारों को आम जनता के बीच रचनात्मक प्रयासों से लोकप्रिय बनाना ही वह कार्यभार है जो उस लोकजागरण के लिए जरूरी है जिस के लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे और जो भारत के भविष्य की एकमात्र आशा है। 

इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, जनपथ संपादक अनंत कुमार सिंह, शिक्षक नेता अखिलेश, धर्म कुमार, रामकुमार नीरज, शायर इम्तयाज दानिश, कवि अरुण शीतांश, सुमन कुमार सिंह, ओमप्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, संतोष श्रेयांस, कवि-चित्रकार रविशंकर सिंह, रंगकर्मी राजू रंजन, आशुतोष पांडेय, विजय मेहता, रंगकर्मी सूर्यप्रकाश, पत्रकार प्रशांत, वार्ड पार्षद गोपाल प्रसाद, दीनानाथ सिंह, बालमुकुंद चौधरी, दिलराज प्रीतम, आइसा के संदीप, राकेश कुमार, श्याम सुंदर, रंजन, राजू राम, विक्की, अनिल, सुशील यादव आदि मौजूद थे। 

Wednesday, June 17, 2015

परम्परा में जो कुछ सुंदर है हम उसे जिएंगे

(साथी सुनील सरीन के कन्धों पर युवानीति की जिम्मेवारी थी. उनका घर संस्कृतिकर्मियों और भोजपुर के वामपंथी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं का एक अड्डा था. उस वक्त नाटकों में काम करना शुरू नहीं किया था. लेकिन आरा शहर के जिस मुहल्ले में उनका घर है वहीँ मेरा ननिहाल है, लिहाजा बचपन से ही उनके घर आना जाना था. उनकी शादी उस वक्त पूरे मुहल्ले में चर्चा का विषय थी. शादी के बाद अनुपमा भाभी ने नुक्कड़ नाटकों में अभिनय किया, नाटक टीम के साथ गांव दौरे में भी गयीं. परम्परागत रीति रिवाज  से अलग हट कर जो उनकी शादी हुई थी वह तो महत्वपूर्ण था ही, हमारे लिए उससे भी आगे बढ़ा हुआ कदम था अनुपमा भाभी का नाटकों में अभिनय. उस वक्त युवानीति से कई लड़कियां जुडी थीं. सुनील भइया और अनुपमा भाभी रोजी-रोटी के चक्कर में आरा से दूर चले गए. अब भी आरा शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत में स्त्रियों की मौजूदगी बहुत ही कम है. जब भी मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मुझे आरा के सांस्कृतिक जगत की इस जोड़ी की याद आती है. इन्होंने वैवाहिक जीवन के 25 साल पूरे कर लिए हैं. उन्हें हार्दिक बधाई. आइए उस शादी को याद करें, खुद सुनील सरीन की जुबानी- सुधीर सुमन) 



शपथग्रहण 
माँ पिताजी के साथ 
25 साल पहले। 17 जून को पटना जिले के मोरियावां गांव में हम जीवन-साथी बने थे। भीषण गर्मी थी। छत पर खुले में दरियां व बेडशीट बिछा दिए गए थे। अनु के रिश्तेदार, संगी-साथी और मेरे साथियों-रिश्तेदारों को मिलाकर 150 से अधिक लोग जुटे थे। एक नये किस्म का विवाह हो रहा है– यह देखने के लिए अगल-बगल की छतों पर भी गांव भर के लोग आ जुटे थे। पड़ोसी भी अपने अपने तरीके से इस शादी में हिस्सेदार हो रहे थे। बगल की छत पर बैठी कुछ महिलाएं बारातियों के स्वागत में गीत मतलब गारी गा रही थीं।

न बैंड बाजा न माड़ो, न डंडा न चौका। कोई फिजुलखर्ची नहीं। एक पेट्रोमेक्स जला हुआ था रोशनी के लिए। झावेंदार ईटों से बने पड़ोस की दीवार से सटा कर लकड़ी की दो कुर्सियां लगा दी गई थीं। कुर्सियों को चादर से ढक दिया गया था। मुझे याद रहा है– मेरी कुर्सी की एक बांह हिल रही थी।

अनु शादी के जोड़े में सजी थी। मेरे लिए भी साथी एश्तियाक ने भाड़े पर एक शेरवानी जुटा दिया था 25 रु. के किराए पर। मेरी बहनों ने पगड़ी और लखनवी जूते खरीद दिए थे।

शपथपत्र पर हस्ताक्षर 
बारात हाईस्कूल के हाते में ठहरी थी। हमारे पड़ोसी पंडित रामसुभग मिश्र 'रासू' साथ गए थे। एक मुल्ला दोस्त भी थे। मेरे कैथोलिक विद्यालय का एक सहपाठी भी था जो पादरी बनने वाला था। अनु के पिताजी आरपी वर्मा ने इस शादी के लिए अपने एक परिचित भंते (बौद्ध भिक्षुक) को आमंत्रित किया था। अर्जक संघ के लोग भी थे। जन संस्कृति मंच के हमारे
कई साथी थे। शादी किस तरह से हो इसकी चर्चा जनवासे में चल रही थी। लगभग सबने ही यह बताया कि विवाह के मुख्य रूप से चार चरण हैं। पहले वर-वधु का परिचय होता है, फिर शादी की कुछ विधियां होती हैं। शपथ-ग्रहण कराया जाता है और अंत में सभी आशीर्वाद देते हैं। हमारी शादी में इस कार्य का बीड़ा उठाया था पत्रकार-कथाकार रामेश्वर उपाध्याय ने।

नैनीताल में 
पच्चीस  वर्षों बाद 
शादी के दिन की कुछ तसवीरें हमने सम्भाल रखी हैं। इन 25 वर्षो में हमने साथ-साथ कई मुकाम तय किए। आरा, बोकारो, वेरावल(गुजरात), दमण, मुम्बई और अब दिल्ली में। हमने बहुत कुछ हासिल किया। कई खुशियां बटोरीं। दुख के पल भी आये। अभी बहुत कुछ रह गया है जिसे साथ मिलकर पाना है। कई सपने देखे हैं हमने। एक बेहतर समाज, एक बेहतर दुनिया का सपना...। नई दुनिया बनाने की जंग के हम भी राही हैं। चलते रहेंगे ... और जिंदगी के गीत गाते रहेंगे।

Wednesday, January 14, 2015

का. सूफियान के आठवें शहादत दिवस पर माले ने संकल्प सभा आयोजित की


फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति को शिकस्त देने का आह्वान
इंसाफ, अमन और सामाजिक-आर्थिक बराबरी के लिए एकताबद्ध संघर्ष का आह्वान


आरा: 13 जनवरी 2015 
स्थानीय अबरपुल मुहल्ले में भाकपा-माले, आरा नगर कमेटी की ओर से शहीद का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर ‘सकल्प सभा’ का आयोजन किया गया। सभा की अध्यक्षता करते हुए अबरपुल के वरिष्ठ कामरेड क्यामुद्दीन उर्फ साधू जी ने कहा कि हिंदुस्तान में गरीबों की कोई सरकार नहीं है। केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद पूंजीपतियों और दौलतवालों के अच्छे दिन आए हैं। लालू-नीतीश ने भी गरीबों के लिए कुछ नहीं किया। ये सरकारें ऐसा माहौल बना रही हैं कि गरीब आपस में लड़कर खत्म हो जाएं। गरीबों के हक-अधिकार के लिए संघर्ष के जिस रास्ते पर का. सूफियान चले थे, उन्हीं के रास्ते पर चलकर उनकी समस्याओं का समाधान संभव है। 
इंसाफ मंच के मो. शहाबुद्दीन ने अबरपुल इलाके में जनता के हक-अधिकार के लिए का. सुफियान के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि उनकी हत्या करके अपराधियों ने जनता की ताकत और विकास के ख्वाब की हत्या करने की कोशिश की थी। आज इस इलाके की जो दुर्दशा है, वही सुफियान बनने की जरूरत को सामने ला रही है। 
निर्माण मजदूर यूनियन के का. बालमुकुंद चौधरी ने का. सुफियान के काम को आगे बढ़ाने के लिए मेहनतकशों की एकता और हिंदुस्तान पर उसकी दावेदारी को कायम करने की जरूरत पर जोर दिया। का. गोपाल प्रसाद ने याद किया कि का. सुफियान की हत्या के बाद आरा शहर के नागरिक आक्रोश में जिस भारी तादाद में जुटे थे, उस तरह किसी नेता या कार्यकर्ता की हत्या पर नहीं जुटते। यही इस बात का संकेत है कि का. सुफियान जनता की किस जरूरी लड़ाई को लड़ रहे थे। उन्होंने कहा कि तमाम शासकवर्गीय पार्टियां अपराध के खिलाफ बोलती हैं, पर अपराध बढ़ता ही जा रहा है। विधानसभाओं और संसद में अपराधी भरे पड़े हैं। 
मो. राजन ने कहा कि का. सुफियान एक अपराधमुक्त-शोषणमुक्त समाज के लिए लड़ रहे थे। वे चाहते थे कि विकास योजनाओं की लूट न हो, बल्कि उससे जनता का विकास हो। यही बात अपराधियों और उनके संरक्षक राजनीतिक ठेकेदारों को पसंद नहीं आई। 
एक्टू के नेता का. यदुनंदन चौधरी ने कहा कि आज जब गरीबों, श्रमिकों के अधिकारों को छिनने वाली केंद्र सरकार पूरे हिंदुस्तान में उन्माद पैदा करके ‘साझी विरासत’ की हत्या कर रही है, तब कुंवर सिंह-पीर अली और बिस्मिल-अशफाकउल्ला की साम्राज्यवादविरोधी संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शहीद होने वाले का. सुफियान के सपनों को साकार करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 
राष्ट्रीय सहारा 
संकल्प सभा को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि का. सूफियान ने जमीनी स्तर पर सांप्रदायिकता और अपराध के खिलाफ जुझारू जंग लड़ी। तीन-तीन बार आरा शहर में दंगे भड़काने की साजिश की गई, लेकिन का. सूफियान ने हर बार हिंदू-मुस्लिम अवाम की एकजुटता को संभव किया और सड़कों पर उतरकर उन साजिशों को नाकाम किया। उनके भीतर गरीब-मेहनतकश जनता का स्वाभिमान था। जनता के ऐसे ही स्वाभिमान के बल पर किसी राष्ट्र की संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रहती है। फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति को मेहनतकश जनता ही शिकस्त दे सकती है।
दैनिक हिंदुस्तान 
दैनिक जागरण जिसमें
साप्रदायिकता विरोध के
सारे संदर्भो को गायब
कर दिया गया.
का. सुधीर सुमन ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार जनता को विकास और अच्छे दिन का झांसा देकर देश के प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल, किसानों-आदिवासियों की जमीन को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को औने-पौने दामों में बेच रही है, आम जनता जिन खुदरा व्यवसायों या छोटे-मोटे धंधों के जरिए अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करती थी, उनको भी बड़ी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। इसके खिलाफ जनता का गुस्सा संगठित न हो, इसके लिए ही सरकार धर्म-संप्रदाय के नाम पर उन्माद और तनाव फैलाने वालों को खुली छूट दे रही है। आज के माहौल में हमें सैकड़ों सूफियान की जरूरत है, जो लुटेरों-अपराधियों और सांप्रदायिक गिरोहों के चंगुल से अपने देश, शहर और समाज को बाहर निकाल सकें।
                                                                           
संकल्प सभा का संचालन भाकपा-माले आरा नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम ने किया। 
   
का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर आयोजित ‘संकल्प सभा’ में पारित प्रस्ताव

प्रभात खबर की छोटी सी खबर जिसमें
मुख्य वक्ता का वक्तव्य ही गायब है.
1. आरा शहर में सांप्रदायिक सौहार्द, आम नागरिकों की सुरक्षा, दबे-कुचले-दलित-अकलियत अवाम के लोकतांत्रिक हक-अधिकार और विकास के लिए संघर्ष चलाने वाले का. सुफियान के हत्यारों को राजनीतिक संरक्षण देने वाली ताकतों  के खिलाफ संघर्ष का यह संकल्प सभा प्रस्ताव लेती है। यह पूरे नागरिक समाज का भी कर्तव्य बनता है कि वह जनता के हित में हमेशा संघर्ष के लिए तत्पर रहने वाले का. सुफियान के हत्यारों को सजा दिलवाने के लिए प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाए। यह ‘संकल्प सभा’ चाहती है कि हत्यारों को सख्त सजा मिले, ताकि भविष्य में कोई अपराधी गिरोह किसी जनआंदोलनकारी शख्सियत की हत्या करने का दुस्साहस न करें। 
2. धर्मांतरण और लव जेहाद के राजनैतिक दुष्प्रचार तथा आतंकवाद के फर्जी मामलों में अल्पसंख्यक नौजवानों की गिरफ्तारी नकली-दाढ़ी मूंछ लगाकर आतंकी कार्रवाई करके मुसलमानों पर इल्जाम मढ़ने के जिम्मेवार हिंदुत्ववादी संगठनों और पुलिस-खुफिया अधिकारियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर कठोर सजाएं दी जाएं। 
3. गुजरात में आतंकवाद से मुकाबले के लिए किए गए माॅक ड्रील के दौरान आतंकवादी की भूमिका निभाने वालों मुस्लिम वेशभूषा धारण कराने वाले अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए और गुजरात सरकार व केंद्र सरकार इस कुकृत्य पर माफी मांगे। 
4. आतंकवाद की किसी भी घटना की निष्पक्षता से जांच की जाए और असली दोषियों को सजा दी जाए। आतंकवाद के आड़ में किसी एक संप्रदाय को बदनाम करने की तमाम राजनीतिक साजिशें बंद की जाएं। गुजरात के अक्षरधाम से लेकर देश के कई हिस्सों में आतंकवाद की घटनाओं में फंसाए गए नौजवानों की दस-दस वर्षों बाद रिहाई हो चुकी है। लिहाजा उन पर आरोप लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। 
5. मीडिया के जरिए मुस्लिम समाज की आतंकवादी की छवि बनाने के सिलसिले को बंद किया जाए। आतंकवाद के मामलों में फर्जी तौर से फंसाए गए नौजवानों के बारे में फर्जी कहानियां गढ़ने वाली मीडिया को भी जवाबदेह बनाया जाए। क्योंकि जिस सामूहिक अंतःकरण का हवाला देकर अफजल को फांसी दी गई, उसके निर्माण में मीडिया की अहम भूमिका होती है। 
6. अमेरिका ने अपने आर्थिक-राजनीतिक हित के लिए दुनिया भर में आतंकवादी संगठनों को जन्म दिया है और उन्हें पाला पोसा है। दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधनों की लूट, लोकतांत्रिक सरकारों को हटाकर अपनी कठपुतली सरकार बनाने और अनेक जनंसहार के लिए जिम्मेवार अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत के गणतंत्र दिवस पर अतिथि बनाने की यह संकल्प सभा निंदा करती है और इसे आत्मघाती कृत्य मानती है। राष्ट्र की संप्रभुता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए इसे खतरनाक मानते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद के समक्ष मोदी सरकार के इस आत्मसमर्पण का पुरजोर शब्दों विरोध करती है। 
9. यह ‘संकल्प सभा’ रामप्रसाद विस्मिल और अशफाकउल्ला की साझी शहादत और साझी विरासत तथा शहीदे-आजम भगतसिंह के तमाम साथियों की इंकलाबी विरासत को याद करते हुए देश की संपदा को देशी-विदेशी कंपनियों के हाथों बेचने वाली तमाम राजनैतिक ताकतों के खिलाफ एकताबद्ध संघर्ष का प्रस्ताव लेती है।
10. यह संकल्प सभा सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए संघर्ष का प्रस्ताव लेती है। 
11. खुदरा व्यवसाय में एफडीआई, भूमि अधिग्रहण व श्रम कानूनों में संशोधनों का यह ‘संकल्प सभा’ तीव्र विरोध करती है और बेरोजगारी, महंगाई तथा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम बुनियादी सेवाओं की बदतर स्थिति के खिलाफ व्यापक जनांदोलन छेड़ने का प्रस्ताव लेती है। 
12. दलित-अल्पसंख्यक-पिछड़े समुदायों के गरीबों और खेत मजदूरांे की हत्या के लिए जिम्मेवार रणवीर सेना के राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए यह ‘संकल्प सभा’ अमीरदास आयोग की पुनर्बहाली की मांग करती है। 
13. सीलिंग से फाजिल और गैरमजरुआ तथा पर्चे की जमीन पर गरीब भूमिहीनों के हक-अधिकार के लिए 20 जनवरी को आरा में होने वाले प्रर्दशन में व्यापक जनभागीदारी की अपील यह ‘संकल्प सभा’ करती है। 
14. देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाली पार्टियों के खिलाफ जमीनी स्तर पर सांप्रदायिक सौहार्द और कौमी एकजुटता को कायम करने वाली जनराजनैतिक गोलबंदी को तेज करने की अपील यह ‘संकल्प सभा’ करती है। 

Sunday, January 11, 2015

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर 'संकल्प सभा' का पर्चा


फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति को शिकस्त दो
बेहतर व्यवस्था के लिए संघर्षशील अवाम की एकता कायम करो
इंसाफ, अमन और सामाजिक-आर्थिक बराबरी की जंग तेज करो

का. सुफियान के आठवें शहादत दिवस पर
संकल्प सभा

13 जनवरी 2015, समय- 12 बजे दिन, स्थान- अबरपुल, आरा


नागरिक बंधुओ,

आज से सात वर्ष पहले अपराधियों ने का. सुफियान की हत्या कर दी थी। अपराधियों और हत्यारों को उन शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियों का संरक्षण मिलता रहा, जो सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का सिर्फ पाखंड करती हैं,, लेकिन जिन्होंने अपनी जनविरोधी कारगुजारियों के कारण आरा और बिहार ही नहीं, पूरे देश में फिरकापरस्त-फासीवादी राजनीति के लिए आगे बढ़ने की जमीन तैयार की। इसके विपरीत का. सुफियान जमीनी स्तर पर सांप्रदायिकता और अपराध के खिलाफ जुझारू जंग लड़ते रहे। वे ऐसे इंसान थे, जिन्हें हिंदू-मुस्लिम भाईचारा और आम नागरिकों की सुरक्षा की फिक्र थी। तीन-तीन बार आरा शहर में दंगे भड़काने की साजिश की गई, लेकिन का. सुफियान ने हर बार हिंदू-मुस्लिम अवाम की एकजुटता को संभव किया और सड़कों पर उतरकर उन साजिशों को नाकाम किया। 

देश की आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदू-मुस्लिम अवाम ने एक होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उनकी दमनकारी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था, अपने समय में का. सुफियान उसी परंपरा को जीवित रखने वाली इंकलाबी धारा के नुमाइंदे थे। यह बेवजह नहीं था कि रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला की ‘साझी शहादत साझी विरासत’ की चेतना से लोगों को उन्होंने लैस करने की कोशिश की। जिन्होंने इस देश में कभी बुश को बुलाया था और जो अब गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के स्वागत की तैयारियां कर रहे हैं, का. सुफियान उन जैसों के विरोधी थे। उनके भीतर गरीब-मेहनतकश जनता का स्वाभिमान था। जनता के ऐसे ही स्वाभिमान के बल पर किसी राष्ट्र की संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रहती है। का. सुफियान शहीद-ए-आजम भगतसिंह के अनुयायी थे, जिन्होंने जनता की वर्गीय एकजुटता को सांप्रदायिकता और साम्राज्यवादविरोध के लिए जरूरी बताया था। 

का. सुफियान हमेशा आरा में दबे-कुचले-पिछड़े-दलित समुदायों और अकलियतों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों में शामिल रहे। विडंबना यह है कि अकलियतों की खराब जीवन दशा के बारे में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद भी उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के बजाए उनके खिलाफ नफरत की सियासत को तरह-तरह की साजिशों, अफवाहों के जरिए लगातार हवा दी जाती रही है। अमेरिकन साम्राज्यवाद की रणनीति की तर्ज पर अपने देश में भी मुसलमानों की पहचान आतंकवादी के बतौर कायम करने की हरसंभव कोशिश की गई है। बेगुनाह नौजवानों को आतंकवाद के फर्जी मुकदमों में कई-कई वर्षों तक जेल में बंद रखा जाता है, कोर्ट के कैंपस में उनकी हत्याएं की जाती हैं, आरएसएस से जुड़े सांप्रदायिक लोगों द्वारा नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। अभी हाल में गुजरात में आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर जो माॅक ड्रील की गई, उसमें आतंकवादियों की भूमिका करने वालों को मुस्लिम वेशभूषा धारण करवाया गया था। मुसलमानों को बदनाम करने की ऐसी तमाम साजिशों का एक मुकम्मल जवाब हैं का. सुफियान। गरीब-मेहनतकश आम अवाम की इंकलाबी ताकत की पहचान हैं का. सुफियान।

बहुत ही कम उम्र में दर्जी यूनियन के जरिए का. सुफियान ने गरीब-मेहनतकशों के हक-अधिकार की लड़ाई की शुरुआत की थी। जीवनयापन के लिए कई छोटे-मोटे काम करते हुए उन्होंने ताउम्र भाकपा-माले के परचम को थामे रखा। हिंदू राष्ट्र का सपना दिखाकर पूंजीपतियों और कालेधंधे वालों का हित साधने वाले हों या सामाजिक न्याय, सेकुलरिज्म और सुशासन का पाखंड करने वाले, का. सुफियान  ने इन सबका विरोध किया। उन्होंने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की साठगांठ से होने वाली लूट का विरोध किया और जब वार्ड के चुनाव में वे जनप्रतिनिधि के रूप में चुने गए, तो यह दिखाया कि ईमानदारी से किस तरह विकास किया जाता है। 

नागरिक बंधुओ, देश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, केंद्र की मोदी सरकार जनता को विकास और अच्छे दिन का झांसा देकर देश के प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल, किसानों-आदिवासियों की जमीन को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को औने-पौने दामों में बेच रही है, आम जनता जिन खुदरा व्यवसायों या छोटे-मोटे धंधों के जरिए अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करती थी, उनको भी बड़ी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। इसके खिलाफ जनता में बढ़ रहा गुस्सा जबर्दस्त तूफान का रूप न ले ले, इसी मकसद से सरकार ने धर्म-संप्रदाय के नाम पर उन्माद और तनाव फैलाने वालों को खुली छूट दे दी है। बंधुओ, आज हमें सैकड़ो सुफियान की जरूरत है, जो लुटेरों-अपराधियों के चंगुल से अपने देश, शहर और समाज को बाहर निकाल सकें। आइए का. सुफियान के शहादत दिवस पर हम इस जंग को तेज करने और आम अवाम की बहुत बड़ी एकता कायम करने का संकल्प लें। 

निवेदक : भाकपा-माले, आरा नगर कमेटी

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी : चंद्रभूषण

13 जनवरी 2008 को का. सुफियान की शहादत के बाद पत्रकार साथी चंद्रभूषण ने अपने ब्लॉग पहलू पर एक पोस्ट लिखा था. उसके बाद उनके एक दूसरे पोस्ट में भी का. सुफियान का जिक्र आया था. कल उनका आठवां शहादत दिवस है. इस मौके पर चंद्रभूषण की यादों को हम यहाँ साझा कर रहे हैं. चंद्रभूषण ने आरा में भाकपा-माले के पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के बतौर काम किया. समकालीन जनमत के संपादक मंडल में रहे.  फ़िलहाल डेढ़ दशक से हिंदी पत्रकारिकता के वे एक सुपरिचित नाम हैं. जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा के बाद आजकल वे नवभारत टाइम्स में कार्यरत हैं.

...एक अनजाने से नंबर से एसएमएस आया- 'अबरपुल के कॉमरेड सुफियान नहीं रहे। अपराधियों ने गोली मार दी।' पलटकर फोन किया तो लगातार इंगेज। ऐन स्कूटर स्टार्ट करते वक्त फोन बजा। उठाया तो पता चला सुनील (सुनील सरीन) हैं- नंबर कुछ और हो गया है। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि सुफियान अपनी दुकान के सामने कैरम खेल रहे थे, तभी नौशाद गैंग के लोगों ने आकर उन पर गोलियों की बारिश कर दी। स्पॉट डेथ हुई।...


मोहम्मद सुफियान भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा में लगभग अपने बचपन से ही सीपीआई-एमएल लिबरेशन के कार्यकर्ता थे। मेरे निजी मित्र तो वे थे ही। आरा में जब पार्टी का काम शुरू हुआ तो दर्जी यूनियन और बक्सा मजदूर यूनियन ही इसका आधार बनी। संयोगवश इन दोनों ही यूनियनों में बहुसंख्या मुस्लिम मजदूरों की थी। सुफियान के पिता खुद भी दर्जी थे, हालांकि उनके पास अपनी दुकान नहीं थे। वे और शहर में काम करने वाले ढेरों अन्य अनपढ़ बाल मजदूरों की तरह उनके अकेले बेटे सुफियान थोक में कपड़ा सिलने वाली एक दुकान पर काम करते थे। आंदोलन बढ़ा तो मजदूरों की कुछ मांगें मानी गईं, लेकिन इसका नेतृत्व कर रहे सारे लोगों को काम से हटा दिया गया।

तब से जीविका के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे धंधे सुफियान ने किए। उनका आखिरी काम एक सैलून खोलने का था, जिसका फीता न जाने क्या सोचकर उन्होंने मुझसे ही कटाया था। उनके सैलून में बाल कटाने वाला पहला व्यक्ति भी मैं ही था।(सैलून के बाद सुफियान ने छोटी सी एक बिस्कुट फैक्ट्री खोली थी.) 
सुनील ने बताया कि इस बार आरा में हुए नगर निगम चुनाव में सुफियान अबरपुल इलाके के वार्ड कमिश्नर चुने गए थे। शायद यह उनका पहला ही चुनाव रहा हो, क्योंकि जबतक मैं आरा में था, तब तक तो यह कल्पना भी करना कठिन था कि सुफियान कभी चुनाव लड़ेंगे। 

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी। वे साथ हों तो किसी से भी भिड़ा जा सकता था- चाहे वह कोई उन्मादी भीड़ हो या अपनी अफसरी के गुमान में फूला कोई पुलिस अफसर। आरा के झोपड़िया स्कूल के सामने गद्दार विधायक श्रीभगवान सिंह का विरोध करते हुए अपने बीस साथियों के साथ मैं और सुफियान भी साथ-साथ जेल गए थे। वहां किसी बात पर झड़प के दौरान जेलर ने सुफियान को घुटना मार दिया था। इसके विरोध में और व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए हम लोगों ने जेल में भूख हड़ताल की, जिसमें जेल के तीन चौथाई से ज्यादा लोग शरीक हुए।

एक बार चुनावी माहौल में अपनी पार्टी का टेंपो डाउन देख मैं दोनों हाथों में अपना सिर थामे बैठा था, तभी सुफियान आए और मुझपर बिल्कुल बरस पड़े। उन्होंने कहा कि ऐसा करके आप बिगड़ी हालत को और बिगाड़ रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हर हालत में भिड़ने, मुकाबला करने की उनकी उस जिद और मस्ती का हाल अभी कैसा था। आखिर अब वे कोई बाल मजदूर नहीं, एक सैलून के मालिक और वार्ड कमिश्नर थे। लेकिन ऐन लोहड़ी की ठंडी रात सुफियान अपनी दुकान के बाहर कैरम खेलते हुए मारे गए, इससे लगता यही है कि बीच के चौदह सालों ने उन्हें भीतर से बहुत ज्यादा नहीं बदला था।

सुफियान को इस तरह याद करना मेरे लिए बहुत अटपटा है। समय की एक चौदह साल मोटी धुंधली दीवार मुझे अपने उस होने से अलगाए हुए है, जिसमें सुफियान और बहुत सारे ऐसे लोग थे, जिनके बिना अपना होना तब नामुमकिन लगता था। यह ध्रुवीय इलाकों में सफर कर रहे अभियान दल के लोगों के बरताव जैसा है, जो अपने पैरों की मर चुकी उंगलियां हथौड़े से तोड़कर आगे बढ़ जाते थे। सुफियान जैसा अपना टूटा हुआ सुन्न अंगूठा हजार मील दूर से निहारते हुए कहीं पहुंचनेकोई मुकाम सर करने जैसी कोई बात अगर अपने जेहन में होती तो लिखना शायद इतना अटपटा नहीं लगता।

...जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि मुसलमानों में धर्म ही सबकुछ है, जाति कुछ नहीं है, उनके लिए एक सूचना कि मेरी जानकारी में सिर्फ अबरपुल मोहल्ले में मुसलमानों की कुल 32 जातियां मौजूद थीं। बीड़ी बनाने वाले अपने एक साथी नन्हक जी की बेटी से हम लोगों ने सुफियान की शादी कराने की कोशिश की थी तो इलाके की दर्जी बिरादरी से आक्रोश के स्वर उभरने लगे- अब दर्जियों के दिन इतने खराब हो गए कि साईं-फकीर की लड़की ब्याह के घर में लाएंगे। इसके कुछ महीने बाद अबरपुल की मस्जिद में सुफियान का निकाह पढ़ाया गया- दोनों तरफ से कबूल है, कबूल है के जैसा कोई फिल्मी मामला नहीं था। दुल्हन घर में ही रही और उसकी तरफ से उसका इकरारनामा उसके बाप ने दिया। इसके अगले साल सुफियान कुछ दिनों तक मेरे साथ जेल में रहे। उनके साथ मेरा अंतिम और परोक्ष संवाद 1995 का है, जब जनमत में लिखे एक जेल संस्मरण पर उन्होंने चिट्ठी भेजकर अपना तीखा एतराज जताया था। मैंने लिखा था कि जेलर ने एक आंदोलन के दौरान सुफियान को घुटना मार दिया था, जिसे पढ़कर इलाके में शायद उनका कुछ मजाक बन गया था। उनका कहना था कि कोई घुटना-वुटना नहीं मारा था, मैंने खामखा अपनी बहादुरी जताने के लिए यह सब लिखा है।...