Wednesday, September 24, 2014

लसाड़ी में माले द्वारा शहीद मेला और संकल्प सभा का आयोजन


माले शहीदों के सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष चला रही है: अरुण सिंह


लसाड़ी शहीद स्मारक, भोजपुर 
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का भोजपुर में भी खासा असर था। आंदोलनकारी डाकघर, नहर आॅफिस, गेस्ट हाउस, तहसीलघर आदि में तोड़फोड़ कर रहे थे, टेलिफोन के तार काट रहे थे। 15 सितंबर 1942 इन आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के मकसद से 14 लारियों में ब्रिटिश सैनिक लसाड़ी गांव पहुंचे और मशीनगनों से हमला कर दिया। यहां के किसानों ने उनकी मशीनगनों का सामना अपने पंरपरागत अस्त्रों से किया और लड़ते हुए शहीद हुए। लसाड़ी और बगल के गांव चासी और ढकनी के गिरीवर सिंह, शीतल लोहार, रामधारी पांडेय, रामदेव साह, केश्वर सिंह, महादेव सिंह, वासुदेव सिंह, जगरनाथ सिंह, सभापति सिंह, शीतल प्रसाद सिंह, केशव प्रसाद सिंह के साथ एक महिला अकली देवी भी शहीद हुईं। 

1947 की आजादी के बाद यहां दो-दो बार शहीदों के नाम का शिलापट्ट लगाया गया, लेकिन उन शिलापट्टों पर धूल जमती गई। सिर्फ चंद पढ़े लिखे लोगों को ही उस इतिहास का पता था। लेकिन जब क्रांतिकारी किसान आंदोलन के नायक का. रामनरेश राम सहार से विधायक बने तो उन्होंने उन शहीदों के बारे में तथ्यों को जुटाया तथा उनके स्मारक का निर्माण करवाया। लसाड़ी और आसपास की जनता ने भी इसमें मदद की और सन् 2000 में भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने इसका उद्घाटन किया। उन्होंने यहां शहीद मेला लगाने की परपंरा की शुरुआत भी कराई।

का. रामनरेश राम ने लसाड़ी शहीद स्मारक के निर्माण में काफी दिलचस्पी ली थी और पटना में मौजूद शहीद स्मारक की तरह ही इसे बनाने का उनका सपना था। स्मारक निर्माण के दौरान भी वे लगातार मौजूद रहते थे। जब इस स्मारक का निर्माण कार्य चल रहा था, तब शासकवर्गीय पार्टियों के लोग दुष्प्रचार कर रहे थे कि वे गोइंठा में घी सुखा रहे हैं, लेकिन आज इसका श्रेय लेने के लिए उनके बीच होड़ लगी रहती है। अब हर साल यहां सरकारी आयोजन भी होने लगा है। 

हर साल की तरह इस साल 15 सितंबर को जब हम लसाड़ी पहुंचे, तब तक शहीद स्मारक पर मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और शासकवर्गीय पार्टियों के प्रतिनिधियों की गाडि़यों का काफिला जा चुका था। जिस क्रांतिकारी शख्सियत ने आजादी के आंदोलन के इन गुमनाम शहीदों के इतिहास के अंधेरे से बाहर लाकर उनका स्मारक बनाने की पहल की और हर साल वहां शहीद मेला और संकल्प सभा आयोजित करने की परंपरा शुरू की, उनकी चर्चा बिल्कुल न हो, इसकी शासकवर्गीय पार्टियों के नेताओं, मंत्रियों, सांसद, विधायकों, अफसरों और अखबारों द्वारा इस बार भी हरसंभव कोशिश की गई। उन्हें लगता है कि इसके जरिए वे जनता के प्रतिरोध के इतिहास पर अपनी इजारेदारी कायम रख सकते हैैं। लेकिन का. रामनरेश राम के लिए लसाड़ी के शहीद महज इतिहास के नायक नहीं थे, वे उनके लिए जीवित संदर्भ थे। वे भाकपा-माले के आंदोलन और अपने साथियों की शहादत की परंपरा को उससे जोड़ते थे। 
पहले माले के पूर्व विधायक अरुण सिंह ने झंडात्तोलन किया। उसके बाद सबने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। संकल्प सभा शुरू होने से पहले एक नौजवान आया जिसने ‘राजकीय शहीद स्मारक विकास समिति सह शोध संस्थान’ नाम की एक संस्था बना ली है। उसने दो पृष्ठों का एक पर्चा दिया, जिसमें प्रो. बलदेव नारायण की पुस्तक 1942 अगस्त क्रांति का अंश छपा था। लेकिन इस पर्चे में भी कहीं का. रामनरेश राम का नाम नहीं था। सभा में वक्ताओं ने यह भी बताया कि इसके निर्माण, उद्घाटन और सहयोगकर्ताओं के नाम की सूची वाले शिलापट्ट को जब इस बार लगाने लोग यहां पहुंचे तो स्थानीय पुलिस ने उसमें बाधा डाला। लोगों ने जब विरोध किया और उच्चाधिकारियों से शिकायत की, तब उन्हें इजाजत मिली। ऐसा लगता है कि राजकीय घोषित हो जाने के बाद शासकवर्ग और उसका प्रशासन इसे अपनी जागीर समझने लगा है। पिछले तीन-चार वर्षों में कुछ भ्रष्ट नेता और जनहत्यारे भी यहां आने लगे हैं और समझते हैं कि इस तरह वे शहीदों की विरासत को हड़प लेंगे। कुछ लोग अलग से शहीद अकली देवी पर आयोजन करने लगे हैं। 
अरुण सिंह 

इस बार लसाड़ी के शहीद स्मारक पर आयोजित शहीद मेला और संकल्प सभा को संबोधित करते हुए माले के बिहार राज्य स्थाई समिति सदस्य और पूर्व विधायक अरुण सिंह ने कहा कि का. रामनरेश राम ने लसाड़ी के गुमनाम शहीदों का स्मारक बनवाया था और यहां शहीद मेला की पंरपरा शुरू की थी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि अपने बहादुर पुरखों की तरह आज भी मजदूर-किसान साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की गुलाम शासकवर्गीय पार्टियों के खिलाफ एकजुट होकर प्रतिरोध करने की प्रेरणा लें। उन्होंने कहा कि शहीदों के वंशजों का कहना है कि भ्रष्टाचार का खात्मा और सुराज लाना उनका सपना था। अगर इस पैमाने पर देखा जाए तो इस देश की सरकारें उनके सपनों के विरोध में ही नजर आएंगी। आज काॅरपोरेट घराने धीरे-धीरे आर्थिक-राजनीतिक संस्थाओं पर कब्जा कर रही हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार के विरोध में मोदी की सरकार बनाने के लिए काॅरपोरेट पूंजी के बल पर जबर्दस्त प्रचार करके सत्ता हासिल की गई, पर न महंगाई कम हो रही है और न ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जरूरतों को पूरा करने के बजाए सरकार हर क्षेत्र को पूंजीपतियों के हाथ बेच रही है। रेल और सुरक्षा के मामलों में एफडीआई इसी की बानगी है। भाजपा का विकल्प होने का दावा करने वाली कांग्रेस, राजद, जद-यू जैसी पार्टियों के पास इस अर्थनीति और उसके सांप्रदायिक फासीवादी अभियान का कोई वैचारिक विकल्प नहीं है। आज हम पर और हमारी भावी पीढ़ी के ऊपर जो भीषण खतरे मंडरा रहे हैं, उसके खिलाफ लसाड़ी के शहीदों के रास्ते पर चलकर संघर्ष करना होगा, इसी के जरिए उनके सपनों को साकार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शासकवर्गीय पार्टियों ने स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों के सपनों के साथ विश्वासघात किया है। भाकपा-माले से ये पार्टियां इसलिए डरती हैं, क्योंकि माले आजादी के आंदोलन के सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष चला रही है। 

सुदामा प्रसाद 
अखिल भारतीय किसान सभा के प्रांतीय सचिव का. सुदामा प्रसाद ने विस्तार से किसानों के संकटों के बारे में बताते हुए कहा कि कृषि के क्षेत्र में लगातार सरकारी सब्सिडी खत्म की जा रही है और पूंजीपति घरानों को भारी छूट दी जा रही है। मोदी की सरकार ने धान खरीद पर मिलने वाले बोनस को खत्म कर दिया है। केंद्र और बिहार सरकार को सोन नहरों के आधुनिकीकरण की कोई चिंता नहीं है। ऐसी सरकारों से जुड़ी हुई पार्टियों के प्रतिनिधि लसाड़ी के शहीद किसानों के सपनों को साकार नहीं कर सकते। उन्होंने 12 अक्टूबर को ‘खेत, खेती, किसान बचाओ/तबाही लूट का राज मिटाओ’ नारे के साथ पीरो में होने वाले सम्मेलन के लिए भी किसानों को आमंत्रित किया। 

माले जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह ने कहा कि जनता के शोषण और लूट के मामले में तमाम शासकवर्गीय पार्टियां एक हैं। जिन काले अंगरेजों के कुशासन की आशंका भगतसिंह ने जाहिर की थी, वह आज ज्यादा स्पष्ट रूप से दिख रहा है। लसाड़ी के शहीदों की परंपरा को आगे बढ़ाना है तो मौजूदा कुशासन के खिलाफ लड़ना ही होगा। 

माले जिला कमेटी सदस्य मनोज मंजिल ने कहा कि आज भी जनता के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों के लिए शासन-प्रशासन के पास लाठी-गोली और जेल है। भोजपुर के बहादुर बेटों ने तो कुर्बानी देकर लसाड़ी के शहीदों की परंपरा को आगे बढ़ाया है। जबकि शासकवर्ग शहीदों के सपनों की ही हत्या करने में लगा हुआ है। 

आइसा के राज्य अध्यक्ष राजू यादव ने कहा कि जिनका इतिहास देश के आजादी के आंदोलन में भागीदारी के बजाय गद्दारी का रहा, वे आज केंद्र में सत्ता में है। ऐसी सरकार के लिए लसाड़ी के किसानों ने शहादत नहीं दी थी। आइसा के राज्य सचिव अजित कुशवाहा ने विस्तार से केंद्र सरकार की वादाखिलाफी के बारे में बोलते हुए कहा कि ऐसी शक्तियों के खिलाफ ही रामनरेश राम जनता को संगठित करना चाहते थे। लसाड़ी का स्मारक हमें इस कार्यभार को पूरा करने की पे्ररणा देता है। अगिआंव प्रखंड के सचिव का. रघुवर पासवान ने कहा कि जो लोग खेती और मजदूरी करते हैं, लसाड़ी के शहीदों ने उस वर्ग के लिए शहादत दी थी। उसी वर्ग के नेता रामनरेश राम ने उन्हीं इतिहास के अंधेरे से बाहर निकाला, लेकिन अब शासकवर्ग और प्रशासन उनका नाम मिटा देना चाहता है, जिसे बिल्कुल बर्दास्त नहीं किया जाएगा। संकल्प सभा को खेमस के जिला अध्यक्ष सिद्धनाथ राम, विमल यादव ने भी संबोधित किया। संचालन उपेंद्र सिंह ने किया। जनकवि कृष्णकुमार निर्मोही ने जनगीत सुनाए। संकल्प सभा से पहले अरुण सिंह ने झंडातोलन किया।

Wednesday, April 23, 2014

कुंवर सिंह : रमाकांत द्विवेदी रमता

देश जागेला त दुनिया में हाला हो जाला/ कंपनी का? परलामेंट के देवाला हो जाला
एह विचार के सिखवले बेवहार कुंवर सिंह/ जगदीशपुर के माटी के सिंगार कुंवर सिंह. 
हर साल 23 अप्रैल को आरा में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के  महांयोद्धा कुंवर सिंह का विजयोत्सव मनाया जाता है. दानापुर के विद्रोही सिपाहियों ने कुंवर सिंह के नेतृत्व में आरा को आजाद कराया. 7 दिन तक यहाँ आज़ाद सरकार रही. फिर लड़ाई आगे बढ़ी. दो-दो अंग्रेज लेफ्टिनेंट को जान गंवानी पड़ी. एक युद्ध छोड़ कर भाग गया.कुंवर सिंह को अंग्रेजों ने जगदीशपुर से बेदखल कर दिया, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी. कानपुर, रीवा और आजमगढ़ में कंपनी की सेना से जबरदस्त लड़ाई लड़ते हुए, विजय हासिल करते हुए उन्होंने वापस जगदीशपुर पर अधिकार किया और उसके तीन दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई. अंग्रेजों की गोली जब उनके बांह में लगी तो उन्होंने तलवार से उसे काट दिया, इसकी चर्चा खूब होती है. 1857 को लेकर विद्वानों में बड़ी बहसें हैं. लेकिन जो लोग आज भी साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता की एकता, खासकर हिंदू-मुस्लिम एकता के हिमायती हैं. जो गांव नगर फैल रहे कंपनियों के जाल से देश को आजाद कराने की लड़ाई लड़ते रहे हैं,  जो कंपनियों का हित साधने वाली पार्लियामेंट के खिलाफ देश को जगाने के लिए संघर्ष चला रहे हैं, वे कुंवर सिंह के संघर्ष को किस तरह देखते हैं, इसे रमता जी की इस मशहूर रचना के जरिए समझा जा सकता है. सामंती-साम्प्रदायिक ताकतों  द्वारा कुंवर सिंह को अपना नायक बनाने की साजिशों का प्रतिवाद भी है यह गीत. कारपोरेटपरस्त-साम्राज्यपरस्त राजनीति के खिलाफ, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ जनता की आज की लड़ाइयों के सन्दर्भ में किसानों के फौजी बेटों द्वारा शुरू उस विद्रोह, जो शीघ्र ही जनविद्रोह बन गया, को आइए याद करें. कुंवर सिंह के संघर्ष ने क्रांतिकारी-वामपंथी-जनकवि रमता जी को व्यवहार के धरातल पर किन विचारों को सिखाया, आइए इस पर विचार करें.

कुंवर सिंह


झांझर भारत के नइया खेवनहार कुंवर सिंह
आजादी के सपना के सिरिजनहार कुंवर सिंह

इतिहास के होला सांपे लेखा टेढ़टाढ़ चाल
कभी सूतेला निहाल, कभी उठेला बेहाल
बढ़ल आपस के फूट, देश हो गइल पैमाल
गांवे-नगरे फएल गइल कंपनी के जाल

मने-मने करत रहन सब विचार कुंवर सिंह
अपना देश खातिर पोसत रहन प्यार कुंवर सिंह

देखत-देखत ढाका-काशी के उजार हो गइल
लंकाशायर-मैनचेस्टर के सुतार हो गइल
अने-धने  भरल-पुरल, से भिखार हो गइल
भूखड़ टापू इंगलैंड गुलजार हो गइल

चुपे चुपे होत रहन तइयार कुंवर सिंह
खीसी जरत रहन एंड़ी से कपार कुंवर सिंह

जब अनमोल कलाकार के अंगूठा कटाई
आ, बलाते जब सोहागिनी के जेवर छिनाई
दिने दूपहर सड़क पर जबकि इज्जत लुटाई
अइसन के होइ, करेजा जेकर फाट ना जाई

आंख फार के देखले लूट-मार कुंवर सिंह
कान पात के सुनले हाहाकार कुंवर सिंह

भारत माता के अचक्के में पुकार हो गइल
खीस दबल रहे भीतर से उघार हो गइल
बाढ़ आइल अइसन जोश के, दहार हो गइल
बात बढ़त-बढ़त आखिर में जूझार हो गइल

देशी फउज के बनले सरदार कुंवर सिंह
अपना देश के भइले रखवार कुंवर सिंह

रहे मोछ ना, उ बरछी के नोक रहे रे
तरूआरे अइसन तेगा अइसन चोख रहे रे
कसल सोटा अइसन देह, मन शोख रहे रे
अइसन वीर जनमावल, धनी कोख रहे रे

ओह बुढ़ारी में जवानी के उभार कुंवर सिंह
अलबेला रे बछेड़ा असवार कुंवर सिंह
गइल जिनिगी अनेर, जब निशानी ना रहल
सवंसार के जवान प’ कहानी ना रहल
जिअल-मुअल दूनों एक, जब बदानी ना रहल
छिया-छिया रे जवानी, जबकि पानी ना रहल

हुंहुंकार के सुनवले ललकार कुंवर सिंह
रने वन मचवले धुआंधार कुंवर सिंह

होश बड़े-बड़े वीर के ठेकाने ना रहल
तोप, गोला के, बनूक के कवनो माने ना रहल
केकरो हाथ, गोड़, नाक, केकरो काने ना रहल
लागल एको झापड़, ओकरा तराने ना रहल

छपाछप फेरसु चारो ओर दुधार कुंवर सिंह
नीचे खून के बहवले पवनार कुंवर सिंह

होला ईंट के उत्तर पत्थर से देवे के जबाना
कस के दुशमन से बदला लेवे के जबाना
कभी छिप के, कभी परगट लड़े के जबाना
कभी हटे के, आ, कबहीं बढ़े के जबाना

रहन अइसन फन में खूबे हुंसियार कुंवर सिंह
राते रात करस अस्सी कोश ले पार कुंवर सिंह
अधिकार पा के मुरुख मतवाला हो जाला
रउआ कतनो मनाई, सुर्तवाला हो जाला
देश जागेला त दुनिया में हाला हो जाला
कंपनी का? परलामेंट के देवाला हो जाला

एह विचार के सिखवले बेवहार कुंवर सिंह
जगदीशपुर के माटी के सिंगार कुंवर सिंह

खांव गेहूं चाहे रहे एहूं दूनों सांझे पेट
दान मुटठी खोल के होय, चाहे खाली रहे टेंट
बांह देश के उधारे, चाहे गंगाजी के भेंट
मान कायम रहे, जीवन लीला ले समेट

अस्सी बरिस के भोजपुरी चमत्कार कुंवर सिंह
लक्ष्मीबाई-तंतिया-नाना के इयार कुंवर सिंह
                       23. 4. 55

Tuesday, April 22, 2014

शायर और साक्षरताकर्मी फराज नजर ‘चांद’ को जसम की श्रद्धांजलि


जन संस्कृति मंच 

20 अप्रैल 2014

दैनिक आज 
दैनिक हिंदुस्तान 
शायर फराज नजर ‘चांद’ का निधन भोजपुर की प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है। फराज नजर चांद अपने कम्युनिस्ट पिता का. रफीक के जीवन मूल्यों के प्रति आजीवन प्रतिबद्ध रहे। आम अवाम की तरह ही अभाव, मुश्किलों और संघर्षों में उनका जीवन गुजरा। एक बेहतर दुनिया और व्यवस्था के निर्माण के सपनों के प्रति उनकी आस्था कभी खत्म नहीं हुई। उसी के तसव्वुर के साथ वे अपनी गजलें लिखते रहे। भोजपुर के साक्षरता अभियान में उन्होंने बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई। फराज नजर ‘चांद’ हमारी गंगा जमुनी तहजीब के नुमाइंदे थे। उनका निधन आरा शहर में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति समर्पित तमाम लोगों के लिए भी एक बड़ी क्षति है।
फराज नजर ‘चांद’ की शायरी तो उनकी याद दिलाएगी ही, अपनी सरलता और सादगी के लिए भी वे हमेशा याद आएंगे। उनकी शख्सियत साधारण जनता की तरह ही सहज, सरल और जीवटता से भरपूर थी। साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारिता को वे  सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का बहुत ताकतवर जरिया समझते थे और वामपंथी आंदोलन से यह उम्मीद करते थे कि वह इसे ज्यादा मजबूत बनाए। उन्हें जब भी मौका मिला, तो नियमित रूप से अखबारों के लिए भी लेखन कार्य किया। हाल के दिनों में उन पर फालिज का आघात हुआ था और वे कोमा में चले गए थे। 
फराज नजर ‘चांद’ भाकपा और प्रलेस से जुड़े हुए थे। उनको जन संस्कृति मंच अपने एक ऐसे दोस्त लेखक के रूप में याद करता है, जिन्होंने अपनी रचनात्मक ऊर्जा के साथ ही साथ हमेशा अपने बहुमूल्य सुझावों से भी संगठन को समृद्ध किया। जनकवि भोला, जब तक जीवित थे, तब तक उनकी पान की दूकान पर अक्सर शाम में फराज साहब मिल जाते थे। आंखों में एक आत्मीय चमक और होठों पर प्यारी मुस्कान वाले फराज नजर ‘चांद’ बहुत याद आएंगे। खासकर जनकवि गोरख पांडेय की स्मृति में आरा हर साल आयोजित होने वाले नुक्कड़ काव्य गोष्ठी ‘कउड़ा’ में उनकी कमी बहुत खलेगी। वे हर आयोजन में शामिल होते थे, लेकिन ‘कउड़ा’ में खास तौर पर अपनी गजल के साथ मौजूद रहते थे। 
फराज नजर ‘चांद’ के परिजनों के प्रति गहरी संवेदना जाहिर करते हुए हम जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि देते है। वे हमेशा हमारी स्मृतियों में रहेंगे। 
श्रद्धांजलि देने वालों  में जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुुंजन, कथाकार मधुकर सिंह, जनपथ के संपादक अनंत कुमार सिंह, कवि-आलोचक जितेद्र कुमार, कथाकार सुरेश कांटक, रंगकर्मी डाॅ. विंद्येश्वरी, सुधीर सुमन, कवि ओमप्रकाश मिश्र, कवि सुनील श्रीवास्तव, कवि सुमन कुमार सिंह, संस्कृतिकर्मी शमशाद प्रेम, चित्रकार राकेश दिवाकर, कवि सुनील चैधरी, आशुतोष पांडेय, रंगकर्मी अरुण प्रसाद, गायक राजू रंजन, रंगकर्मी अमित मेहता आदि प्रमुख हैं। 

Wednesday, April 16, 2014

प्रचार के अंतिम दिन माले ने अनेक गांवों में प्रचार जुलूस निकाला











दैनिक आज 
आरा में नौजवानों ने निकाला जुलूस
आरा के प्रबुद्ध नागरिकों ने की राजू यादव को विजयी बनाने की अपील 
आरा: 15 अप्रैल 2014
चुनाव प्रचार के आखिरी दिन आज भाकपा-माले कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने आरा संसदीय क्षेत्र के सैकड़ों गांवों और पंचायतों में अपने प्रत्याशी राजू यादव के समर्थन में झंडा-बैनर के साथ जुलूस निकाला और लोगों से भारी संख्या में निर्भीकता के साथ मतदान करने की अपील की। माले ने भाजपा के उम्मीदवार आरके सिंह द्वारा खुफिया विभाग और प्रशासन के साथ रिश्ते का गरीब व कमजोर वर्ग के मतदाताओं के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने की आशंकाओं से भी अपने आधार को सचेत किया है और उन तक संदेश पहुंचाया है कि वे भाजपाई साजिश के खिलाफ भारी पैमाने पर मतदान करें और अपनी राजनैतिक दावेदारी को सुनिश्चित करें। 
आज माले प्रत्याशी राजू यादव ने आरा कोर्ट में अधिवक्ताओं के बीच प्रचार अभियान चलाया। उनके साथ प्रोग्रेसिव एडवोकेट एसोसिएशन के अमित कुमार बंटी के अलावा दर्जनों अधिवक्ता प्रचार में शामिल थे। 
आरा शहर के मुख्य मार्गों पर आइसा महासचिव अभ्युदय, इनौस के उपाध्यक्ष असलम, माले नगर सचिव दिलराज प्रीतम, आइसा राज्य सचिव अजित कुशवाहा, सत्यदेव, रचना आदि के नेतृत्व में सैकड़ों युवाओं ने लाल झंडों और राजू यादव के समर्थन में बनाए गए बैनरों के साथ जोशीला जुलूस निकाला। छात्र-नौजवानों, किसान-मजदूरों, महिलाओं ने ललकारा है, आरा सीट हमारा है, आरा का सांसद कैसा हो
राष्ट्रीय सहारा 
यह भाजपा का मुखपत्र चुका अखबार जागरण है, जिसमें एक वाक्य की खबर है 
, राजू यादव जैसा हो आदि नारे लगे। माले के सारे कार्यकर्ता गांवों-मुहल्लों में जनता के बीच पैठ गए हैं। मतदाताओं को प्रलोभन देने वाले और उन पर दबाव बनाने वालों पर भी उनकी नजर रहेगी। गरीब-मेहनतकश-कमजोर वर्ग के लोग आजादी से अपना मतदान कर सकें, यह माले की कोशिश है।
आरा के 71 प्रबुद्ध नागरिकों ने भी राजू यादव को वोट देने की अपील की है। अपील करने वालों में कथाकार मधुकर सिंह, डाॅ. सुनीति प्रसाद, डाॅ. यूके चैधरी, प्रो. रामतवक्या सिंह, प्रो. वीरेंद्र कुमार सिंह,  प्रो. तुंगनाथ चैधरी, प्रो. अनुज रजक, प्रो. नजीर अख्तर,आलोचक रामनिहाल गुंजन, कथाकार अनंत कुमार सिंह, सुरेश कांटक, कवि जितेंद्र कुमार, बलभद्र, पत्रकार राजू नीरा, कवि सुनील श्रीवास्तव, सुनील चैधरी, आशुतोष पांडेय, जनमत के संपादक सुधीर सुमन, कवि सुमन कुमार सिंह, रंगकर्मी संजय कुमार पाल, राजू रंजन, अधिवक्ता सुरेंद्र प्रसाद भट्ट, कामेश्वर यादव, बबन यादव, राजेंद्र यादव, सुशील कुमार पंडित, ज्योति कलश, अमित कुमार बंटी, निर्मल राम, विमल यादव, ललन यादव, कामता यादव, आनंद वात्सयायन, संजय कुशवाहा, जनकवि कृष्ण कुमार निर्माेही, रंगकर्मी धनंजय, चित्रकार कमलेश कुंदन, राकेश दिवाकर, संजीव सिन्हा और मूर्तिकार ओमप्रकाश शामिल हैं। इस अपील के दस हजार पर्चे जनता के बीच वितरित किए गए हैं। 


मतदान का समय घटाना एक राजनीतिक साजिश है: का. कुणाल, राज्य सचिव, भाकपा-माले



मतदान का समय घटाने का निर्णय वापस लेने की मांग की माले ने
भाजपा के इशारे पर जिला प्रशासन ने गरीबों को मतदान से वंचित करने की साजिश की है: का. कुणाल

आरा: 15 अप्रैल 2014
जिला प्रशासन की अनुशंसा पर आरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन यहां के दो विधानसभाओं- अगिआंव विधानसभा और तरारी विधानसभा क्षेत्र में मतदान का समय दो घंटा कम किए जाने को भाकपा-माले के राज्य सचिव का. कुणाल ने गरीब मतदाताओं को मतदान से वंचित करने की भाजपाई साजिश करार दिया है। का. कुणाल ने कहा है कि यह निर्णय घोर आश्चर्यजनक और लोकतंत्रविरोधी है। तरारी और अगिआंव की जनता भारी संख्या में मतदान करके इस साजिश का करारा जवाब देगी। 
का. कुणाल ने कहा है कि माले प्रत्याशी के चुनाव अभिकर्ता ने यहां के जिला निर्वाचन पदाधिकारी सह जिलाधिकारी से इसके संदर्भ में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें क्षेत्र के बारे में जानकारी नहीं है, उन्हें किसी ने बताया कि ये क्षेत्र उग्रवाद प्रभावित हैं, इसलिए यहां मतदान का समय दो घंटा कम करने की अनुशंसा की गई। सवाल यह है कि अगर उन्हें इस क्षेत्र की जानकारी नहीं थी, तो उन्होंने पार्टियों के साथ इसके संदर्भ में बैठक क्यों नहीं की? यह बड़ी आबादी को मतदान से वंचित करने की राजनैतिक साजिश है। भोजपुर जिला प्रशासन ने चुनाव आयोग को भी गुमराह करने का काम किया है।
दैनिक हिंदुस्तान १६ अप्रैल 
का. कुणाल ने बताया है कि इस मामले में केन्द्रीय चुनाव आयोग और बिहार के मुख्य चुनाव पदाधिकारी के पास विरोध पत्र भेजा गया है और आरा आरा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के मुख्य चुनाव पर्यवेक्षक को भी इससे अवगत कराया गया है कि अगिआंव और तरारी विधानसभा क्षेत्र में कभी मतदान प्रक्रिया को बाधित करने की कोई घटना नहीं घटी है, कभी भी यहां मतदान कराने गए अधिकारियों या कर्मचारियों पर कोई हमला नहीं हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में अगिआंव विधानसभा से भाजपा तथा तरारी विधानसभा से जद-यू के विधायक चुने गए हैं। फिर किस आधार पर इन विधानसभाओं को उग्रवाद प्रभावित बताकर मतदान का समय कम किया गया? क्या इन दोनों विधानसभाओं में प्रशासन सभी लोगों का मतदान सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त पोलिंग बूथों की व्यवस्था करेगा?
का. कुणाल ने कहा कि इन दोनों  विधानसभाओं में सामंती ताकतें गरीबों को वोट देने नहीं देती थीं। गरीबों ने लड़कर और शहादतें देकर यह अधिकार हासिल किया। अब सामंती ताकतें उन्हें वोट देने से रोक नहीं पा रही हैं, तो प्रशासन के जरिए रोकने की कोशिश कर रही हैं। जैसा कि सबको पता है कि भाजपा उम्मीदवार आर.के सिंह केंद्रीय गृह सचिव थे। लिहाजा नौकरशाही और खुफिया तंत्र से इनके गहरे रिश्ते हैं। उन्होंने इसी प्रभाव का इस्तेमाल करके गरीबों को वोट से वंचित करने की साजिश रची है।  
का. कुणाल ने कहा है कि एक ओर निर्वाचन आयोग के जरिए अधिक से अधिक लोगों के मतदान के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर दो विधानसभाओं में मतदान का समय कम करके अनेक मतदाताओं को मतदान से वंचित करने की कोशिश की जा रही है। यह तो निष्पक्ष चुनाव कराए जाने की चुनाव आयोग की भावना का ही मजाक उड़ाने के समान है। यह पूरे भोजपुर के लिए भी भेदभावपूर्ण कार्रवाई है। 
का. कुणाल ने बताया कि माले ने केद्रीय निर्वाचन आयोग से अगिआंव और तरारी में मतदान का समय दो घंटा कम करने के निर्देश को वापस लेने की मांग की है। 

देश पर तानाशाही थोपने की साजिशों के खिलाफ भोजपुर लड़ाई का रास्ता दिखाएगा : का. दीपंकर

आरा में का. दीपंकर 
उम्र नहीं, बल्कि अपने समय के संकटों से लड़ने की हिम्मत और इच्छाशक्ति असल चीज़ है : का. दीपंकर भट्टाचार्य 
माले प्रत्याशी राजू यादव के समर्थन में का. दीपंकर की सभाएं 

आरा/गड़हनी/ अगिआंव बाजार/ तरारी
14 अप्रैल 2014
‘भोजपुर ने इतिहास के हर मोड़ पर रास्ता दिखाया है, इस वक्त मोदी के नेतृत्व में सामंती-सांप्रदायिक उन्माद और कारपोरेट लूट की ताकतें देश पर तानाशाही थोपने की जो साजिशें रच रही हैं, उसके खिलाफ भोजपुर ही फिर रास्ता दिखाएगा।’ भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने आज तरारी, अगिआंव बाजार, गड़हनी और आरा में माले प्रत्याशी राजू यादव के समर्थन में आयोजित चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए यह कहा। 
सहारा 
यह दैनिक हिंदुस्तान की कतरन है,
जो अपने को बिहार का नंबर-1
अखबार कहता है. 14 अप्रैल को चार जगह सभाएं हुईं,
जिसकी यह छोटी सी खबर है. फोटो नहीं छापा गया
का. दीपंकर ने कहा कि भाजपा-कांग्रेस की नीतियां इस देश के किसान-मजदूरों, छोटे दूकानदारों, आदिवासियों, महिलाओं, छात्र-नौजवानों सबके खिलाफ हैं। ये विकास के नाम पर विनाश में लगे हुए हैं। इस देश में जिंदा रहने के लिए नीतियों को बदलने की मजबूत लड़ाई लड़नी होगी, विकास की दिशा को गरीबों की ओर मोड़ना होगा। उन्होंने नीतीश कुमार पर भी कटाक्ष करते हुए कहा कि वे जनता से मेहनताना मांगते फिर रहे हैं, लेकिन उन्हें तो सड़क में गड्डों, फर्जी बिजली बिल, राशन-किरासन, मनरेगा घोटाला आदि के लिए जुर्माना भरना चाहिए। 
आरा सभा में माले प्रत्याशी राजू यादव 
का. दीपंकर ने विरोधी उम्मीदवारों के अनुभवी होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोग बताते हैं कि अस्सी के दशक में भाजपा उम्मीदवार जब पटना के डीएम थे, तो उन्होंने आंदोलनकारी छात्रों पर जबर्दस्त लाठीचार्ज करवाया था। जब वे गृहसचिव रहे, तो जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानून व्यवस्था को सुधारने के बजाए राजनीतिक साजिश के तहत निर्दोष नौजवानों को फर्जी मुकदमों में फंसाया गया। यहां तक कि जब अफजल को फांसी दी गई, तो इन्होंने अफजल के परिवार वालों को सूचना तक नहीं दी, जबकि अंग्रजों के शासन में भी इस हद तक संवेदनहीनता नहीं बरती जाती थी। 
जद-यू की उम्मीदवार बारे में उन्होंने कहा कि पिछले पांच साल में वे क्षेत्र में गई ही नहीं, यही उनका अनुभव है। राजद उम्मीदवार के बारे में कहा कि लाल झंडा और जनता के आंदोलनों से गद्दारी करके वे राजद में गए, जब राजद को गर्दिश में देखा, तो वहां से जद-यू में चले गए, अब फिर राजद में लौटे हैं, लोगों का यही कहना है कि अब एक पार्टी भाजपा उनके लिए बची है, इनका कोई भरोसा नहीं है। कुर्सी के दलबदल का यह अनुभव भोजपुर की जनता के किस काम आएगा? 
आरा में चुनावी सभा 
का. दीपंकर ने कहा कि उम्र कोई मायने नहीं रखता, असल चीज है कि अपने समय के संकट से लड़ने की हिम्मत, ताकत और इच्छा शक्ति है या नहीं। यह भगत सिंह का मुल्क है, जिन्होंने इस देश की आजादी और जनता के राष्ट्र-निर्माण का सही रास्ता दिखाया और जो मात्र 23 साल में शहीद हो गए, जो हमारे राष्ट्रनायक हैं। जरूरत पड़ी तो इसी भोजपुर के कुंवर सिंह ने 80 साल की उम्र में भी अंगरेजों के खिलाफ आजादी की जंग छेड़ दी थी। यहीं 1942 मेें लसाढ़ी के किसानों ने आजादी के लिए लड़ते हुए शहादत दी थी, जिस गौरवशाली इतिहास को याद रखने के लिए का. रामनरेश राम ने विधायक बनने के बाद उन शहीदों का स्मारक बनवाया। आजादी के बाद भी जब दलितों-पिछड़ो, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीबों का उनका संवैधानिक अधिकार नहीं मिला, तब का. जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव और रामनरेश राम ने सामंती धाक के खिलाफ लड़ाई शुरू की। फिर अस्सी के दशक में गरीबों के वोट के अधिकार के लिए जबर्दस्त लड़ाई भी इसी भोजपुर में हुई, जिसे रोकने के लिए सामंती ताकतों ने जनसंहार किए, पर लोगों ने वोट देने के अधिकार को हासिल किया। 90 के दशक में जब गरीबों की राजनीतिक दावेदारी को रोकने के लिए जनसंहारों का सिलसिला शुरू कर दिया गया, तब भी भोजपुर की संघर्षशील चेतना को कुचलना संभव नहीं हुआ। माले प्रत्याशी राजू यादव भोजपुर की इसी संघर्षशील चेतना और परंपरा के नुमाइंदे हैं। 
आरा सभा में वक्तागण
अंबेडकर जयंती के मौके पर आज उनको याद करते हुए का. दीपंकर ने कहा कि उन्होंने जो संविधान बनाया, वह संविधान और लोकतंत्र खतरे में है। भाजपा एक ओर अडानी, अंबानी, जिंदल, मित्तल, पोस्को जैसी देशी-विदेशी पूंजीपतियों और कंपनियों को  किसानों की खेती की जमीन, खनिज, तेल, गैस, जल, जंगल लूटने की छूट के लिए सरकार बनाना चाहती है, तो दूसरी ओर ये दंगाई ताकतें देश को बांटने में लगी हुई हैं। भाजपा ऐसी सरकार बनाना चाहती हैं, जहां किसान-मजदूरों के बजाए पूंजीपतियों की बात सुनी जाएगी। इस देश में आरएसएस, अंबानी-अडानी, अमेरिका का मोर्चा बना है। माले ने इस मोर्चे के खिलाफ किसान-मजदूरों, नौजवानों, मां-बहनों, गरीबों, तरक्कीपसंद, लोकतंत्र पसंद और इंसाफ में आस्था रखने वाले लोगों का मोर्चा बनाया है, आरा में यह मोर्चा भाजपा के खूनी मोर्चे पर भारी पड़ेगा। 
उन्होंने कहा कि भाजपा पूरे देश में साजिशें रच रही है। 23 मार्च की सुबह भगतसिंह की शहादत दिवस पर का. बुधराम पासवान का शव मिलने से पूरे भोजपुर में सन्नाटा था, उस रोज माले को अपने उम्मीदवार का नामांकन स्थगित करना पड़ा, लेकिन उसी रोज भाजपा का नामांकन हुआ। उन्होंने कहा कि साजिश सिर्फ माले के साथ ही नहीं हो रही, बल्कि एक दिन पहले पीरो में नौजवान कोचिंग संचालक अकबर खां की भी हत्या हुई। एक ओर गरीबों के मान-सम्मान व हक-अधिकार के लिए लड़ने वाले बुधराम पासवान थे, तो दूसरी ओर गरीब छात्रों को निःशुल्क शिक्षा देने और लड़कियों के साथ होने वाले छेड़छाड़ का विरोध करने वाले लोकप्रिय शिक्षक अकबर खान। दोनों राजनीतिक साजिशों के शिकार हुए। ऐसी ही अनेक साजिशों का नाम भाजपा और मोदी है। 
सभाओं को पूर्व सांसद रामअवधेश सिंह, माले केंद्रीय कमेटी सदस्य कृष्णदेव यादव, अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव राजाराम सिंह, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, माले प्रत्याशी राजू यादव ने भी संबोधित किया। तरारी में सभा की अध्यक्षता खेमस के जिला सचिव का. कामताप्रसाद सिंह और अगिआंव बाजार मे अध्यक्षता अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला सचिव का. चंद्रदीप सिंह ने की। गड़हनी में का. रघुवर पासवान और आरा में दिलराज प्रीतम ने सभा का संचालन किया। 

जेल में हत्या की योजना बनना प्रशासनिक विफलता है: माले

यह बयान सिर्फ दैनिक आज में छप पाया.
एसपी के बयान से जनता की असुरक्षा बढ़ेगी: का. कुणाल 
अगर एसपी के पास सुराग है, तो वे असली हत्यारे को पकड़ें: का. कुणाल

आरा: 14 अप्रैल 2014 
भाकपा-माले के राज्य सचिव का. कुणाल ने का. बुधराम पासवान की हत्या के मामले में भोजपुर एसपी के खुलासे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अगर जेल के भीतर भी हत्या की योजना बनाने की गुंजाइश होती है, तो यह बड़ी प्रशासनिक विफलता है। जैसा कि भाकपा-माले ने पहले ही कहा था कि का. बुधराम पासवान की हत्या एक राजनैतिक साजिश के तहत की गई है और इसमंे सांमती-सांप्रदायिक-अपराधी ताकतों का हाथ है, तो जहां से अपराधियों के पकड़े जाने की बात की जा रही है, उसी भैरोडिह गांव मेें बुधराम पासवान की हत्या के बाद रात मेें और सुबह में फायरिंग की गई थी। बयानबाजी के बजाए अगर प्रशासन के पास हत्या के मामले में कोई सुराग है, तो असली हत्यारे को पकड़े। जो अपराधी पकड़े गए हैं, उनके रणवीर सेना के साथ भी रिश्ते रहे हैं। इसके पहले रामनाथ राम की हत्या के मामले में इनके साथ मुन्ना राय नाम का रणवीर सेना का एक अपराधी भी नामजद है। 
का. कुणाल ने कहा है कि अभी तक पीरो के नौजवान कोचिंग संचालक अकबर खां के हत्यारे भी पकड़े नहीं गए हैं। एसपी ने जो बयान दिया है, उससे जनता में असुरक्षा बढ़ेगी। लोग यही समझेंगे कि अपराधियों के पकड़े और न पकड़े जाने का कोई मतलब ही नहीं है, वे जेल में बैठकर भी अपराध को अंजाम दे सकते हैं। खासकर चुनाव के समय तो इस तरह की बयानबाजी बिल्कुल उचित नहीं है, क्योंकि इससे लोगों में असुरक्षा और भय बढ़ेगा।