भाकपा-माले का. विनोद मिश्र के सपनों के भारत के निर्माण हेतु संकल्पबद्ध है : का. जवाहरलाल सिंह
सांप्रदायिक फासीवादियों की झूठ, लूट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ माले का संघर्ष जारी रहेगा
इसके पहले उन्होंने का. विनोद मिश्र की ऐतिहासिक भूमिका को याद करते हुए कहा कि जब शासकवर्ग ने भीषण दमन के जरिए नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचल डाला था, जब पार्टी कई गुटों में बंट चुकी थी, तब विनोद मिश्र ने इंजीनियरिंग की अपनी कैरियर को छोड़कर भारतीय क्रांति की सुसंगत दिशा में जनता को संगठित करने की जिम्मेवारी स्वीकार की। पहले और दूसरे महासचिव का. चारु मजुमदार और का. जौहर तथा भोजपुर आंदोलन के संस्थापक का. जगदीश मास्टर की शहादत के बाद उन्होंने एक तरह से पार्टी को फिर से संगठित किया। उन्होंने अपने विचार और व्यवहार से हमें यह सिखाया कि एक सच्चा क्रांतिकारी जटिल से जटिल, कठिन से कठिन परिस्थितियों और दमन के अंधेरे दौर में भी रौशनी की उम्मीद नहीं छोड़ता। बगैर निराश और हताश हुए उन्होंने तमाम संभावनाओं की तलाश की और भाकपा-माले को पूरे देश में क्रांतिकारी वामपंथी पार्टी के तौर पर स्थापित कर दिया। उन्होंने जिस भारत का सपना देखा उस भारत को बनाने की लड़ाई लड़ने के लिए माले का हर सदस्य संकल्पबद्ध है।

उन्होंने लिखा कि भारत में वैज्ञानिक विचारों का पुनरूत्थान उनका सपना है। उनका सपना था कि भारत राष्ट्रों के रूप में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी को भी डर नहीं लगेगा और जिसे दुनिया का सबसे ताकतवर देश भी धमका नहीं पाएगा, जहां सरकारें और राज्य मशीनरी किसी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं में हस्तक्षेप किए बगैर वैज्ञानिक व तार्किक विश्व दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करेगी। जहां प्रतिनिधि सभाओं में महिलाओं के लिए पचास फीसदी जगह सुरक्षित होगी, प्रेम विवाह रिवाज बन जाएगा और तलाक देना सहज होगा। जहां बच्चों को तंगहाली नहीं झेलना पड़ेगा, उनके देखभाल की जिम्मेवारी माता-पिता से ज्यादा राज्य की होगी, जहां अछूतों को हरिजन कहकर गौरवान्वित करने का अंत हो जाएगा और दलित नाम की कोई श्रेणी न रहेगी, जातियां विघटित होकर वर्गाें का रूप ले लेंगी, जहां हर नागरिक की राजनीतिक मुक्ति को सबसे ज्यादा कीमती समझा जाएगा और जहां असहमति की वैधता होगी, जहां कला व साहित्य की किसी भी रचना पर राज्य की ओर से कोई सेंसर न लगेगा। अपने लेख के अंत में उन्होंने लिखा है- ‘मेरे सपनों का भारत भारतीय समाज में कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं पर आधारित है जिसे साकार करने के लिए मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने अपने खून की अंतिम बूंद तक बहाने की शपथ ले रखी है।’ जाहिर है उन सपनों को साकार करने के लिए के लिए लोग संकल्पबद्ध हैं, संघर्षों के बीच हैं। उनका सपना हम सबका सपना है, जिसकी प्रासंगिकता पहले से भी अधिक बढ़ गई है। का. जवाहरलाल सिंह ने ठीक ही कहा कि उन्हें याद करना हमारे लिए महज औपचारिकता नहीं है। 




























