उत्साह से झूमे छात्र-नौजवान और संस्कृतिकर्मी, किसान-मजदूरों की आंखों में उम्मीद दिखी
एक दिन पहले ही पूरे जिले से माले कार्यकर्ता और समर्थक अपने प्रिय साथी और नेता बुधराम पासवान को अंतिम विदाई देने आए थे। शोक, दुख और गुस्से का माहौल था। माले प्रत्याशी राजू यादव के नामांकन की तय तिथि को एक दिन आगे बढ़ा दिया गया था। थोड़ी आशंका थी कि नामांकन के मौके पर जैसी संभावित जनजुटान की अपेक्षा थी, वैसा न हो। लेकिन माले कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने सचमुच शोक को शक्ति में बदल डाला। शोक और संघर्ष की चुनौतियों की इस घड़ी में समाज के एक बहुत बड़े हिस्से ने भी माले का साथ दिया। माले प्रत्याशी राजू यादव के नामांकन के अवसर पर जो जनसैलाब उमड़ा, वह अभूतपूर्व था।
25 मार्च की सुबह से ही माले कार्यकर्ताओं, समर्थकों और किसान-मजूदरों, छात्र-नौजवानों का हुजूम उमड़ने लगा था। नामांकन के तय समय की सूचना ज्यादातर कार्यकर्ताओं और समर्थकों को ही थी। लेकिन आज नामांकन होना है, यह जानकर ही अनेक लोग स्वतःस्फूर्त तरीके से माले कार्यालय पहुंच गए। छात्र-नौजवान उत्साह और उमंग से भरे थे, तो मजदूर-किसानों के चेहरे उम्मीद से लबरेज थे। किसी प्रत्याशी के पक्ष में ऐसा जबर्दस्त माहौल पिछले कई चुनावों में मुझे देखने को नहीं मिला।
पूर्वी गुमटी से निर्वाचन कार्यालय तक जनता का कारवां जिस उत्साह और अनुशासन के साथ पहुंचा, वह देखने लायक था। कुछ समर्थक अपने घोड़े भी लाए थे, तो कुछ बाजा-गाजा लेकर आए थे। हवा में लहराते लाल झंडे थे। माले प्रत्याशी राजू यादव, राज्य सचिव का. कुणाल, केंद्रीय कमेटी सदस्य कृष्णदेव यादव, जिला कमेटी सदस्य अशोक कुमार सिंह और अधिवक्ता अमित कुमार बंटी निर्वाचन कार्यालय के अंदर गए और पूरा जनसमूह सड़क के दोनों किनारे धैर्य के साथ खड़े होकर उनके बाहर आने का इंतजार करता रहा।
उत्साह का यह आलम था कि आइसा राज्य सचिव अजित कुशवाहा ने डफली थाम लिया था और उस पर थापें दे रहे थे। जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही और राजू रंजन ने आज के राजनैतिक माहौल पर रचित जनगीतों के अलावा भोजपुर के संघर्ष के इतिहास को अपना स्वर दिया। इन गीतों में सांप्रदायिक उन्माद और देश को लूटने वाली मौकापरस्त राजनीति को शिकस्त देने का मजबूत आह्वान था। इंकलाब जिंदाबाद, लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान, देश का नेता कैसा हो, राजू यादव जैसा हो आदि नारे गूंजे। का. बुधराम पासवान के साथ भोजपुर आंदोलन के तमाम शहीदों को बार-बार याद किया गया। मोदी के सपने को पूरा नहीं होने देंगे, आरा से माले के लाल निशान को संसद में भेजेंगे, गीतांे में इसका भी संकल्प था।
नामांकन कार्यालय से बाहर आते ही माले प्रत्याशी राजू यादव को माला पहनाने के लिए जनता में होड़ लग गई। माला पहनाने वाले ठेकेदार, अपराधी, थैलीशाह नहीं थे, जैसा कि आमतौर पर होता है, बल्कि वे बिल्कुल साधारण लोग थे, महिलाएं थीं, नौजवान थे, जिनके कपड़े और चेहरे उनके मेहनतकश होने की गवाही दे रहे थे। उनकी आंखों में एक उम्मीद था कि करोड़पतियों और समाज के वर्चस्वशाली लोगों के बजाए एक ऐसा जनप्रतिनिधि संसद मंे जाएगा, जो उनकी आकांक्षा और सपनों के लिए काम करेगा।


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